बहुत कम हमें कहते हैं
हिंदी चिट्ठाकार ।
जबकि चिट्ठी लेखन से ही
आदिकाल में हुई
लेखन की शुरूआत ।
यह ब्लॉग
वह ब्लॉग
यह अबला
वह बावला
मैं सबला
आंवला हितकारी है
नहीं व्यापारी है।
इसे सब जानते हैं
आंवले को पहचानते हैं
आंवला सर्वउपयोगी है
आंवले का पुरस्कार
सामने वाला का
सम्मान है ।
कड़वा करेला भी
उपयोगिता की
सर्वमान्य पहचान है।
जो नहीं समझ पाया
यह सत्य
क्या वह नादान है
जी नहीं,
उसने भी आपत्ति
प्रकट करके
सामने वाले की
अभिव्यक्ति को
निखारा है ।
निखारना और तराशना
अभिव्यक्ति और आपत्ति
का सुफल है
फल जरूरी नहीं
मीठा ही हो ।
करेला चाहे सब्जी है
पर हितकारी फल देती है
कड़वी होती है
पर ग्रहण सबको नहीं होती है ।
कड़वाहट बुराई नहीं है
मीठापन सदैव अच्छाई नहीं है
जो मीठा है उसमें दुश्मन भी है
जो कड़वा है वह हितचिंतक है ।
कड़वा, मीठा, खट्टा, कसैला
तीखा स्वाद भी सभी चाहिए
हिंन्दी चिट्ठाकारी को बढ़ाने के लिए
नुस्खे आजमाने चाहिए
वही तो आजमा रहे हैं
हम तो मजमा लगा रहे हैं
पर हमें मदारी मत समझना
हम नकद हैं
हमें उधारी न समझना
पर अपनी समझ पर
कभी संशय मत करना
विश्वास जरूरी है
सूची पर
निर्णायक मंडल पर
पुरस्कार पर
सम्मान पर
रवीन्द्र प्रभात के
इस ब्लॉगहितकारी
आवाह्न पर।
संदर्भ : परिकल्पना सम्मान हेतु नामांकित ब्लोगर्स की सूची प्रतिक्रियास्वरूप त्वरित टिप्पणी।



