रास्ते चलते, घर में, बाहर, ऑफिस या कहीं भी, हम अपने भावों को अभिव्यक्त करने के लिये, भाषा का सहारा लेते हैं। भाषा का विकास इसीलिए हुआ था ताकि हम अपने भाव सही तरीके से अभिव्यक्त कर सकें। पर इसके बाद भी कई बार सीधी सादी बात बोलने पर भी सामने वाला तुनक जाता है। जिसका सीधा सा कारण होता है कि हम अपनी बात को सही शब्दों में अभिव्यक्त नहीं कर पाये। पर सिर्फ यही एक कारण नहीं होता, कारण होते हैं बहुतेरे यथा
पिछले दिनों ई मेल मैसेंजर पर एक पंक्ति टांगी ""तुम" हो तो "मेरा" होना भी है, जो "तुम" नहीं तो "मै" कैसे!!!" सीधे सरल शब्द हैं, किसी भी तरह से कोई भारी भरकम, नहीं समझ मे आने वाला शब्द प्रयोग नहीं किया गया है।
अब इसको किस किस अन्दाज मे पढ़ा जा सकता है, क्या क्या अर्थ निकाला जा सकता है, वो मुझे मित्रों ने बताया क्योंकि सबने अपने अपने तरीके से अलग अलग अर्थ निकाले और जो प्रतिक्रियायें मिलीं, उनकी बानगी देखिये :-
1. अरे, कौन है वो ? सीधा सा प्रश्न जो एक मित्र ने दागा।
2. ठीक कहा, उसके बिना जीना अधूरा सा है ना, या यूँ कहो कि है ही नहीं।
3. ह्म्म.... जीवन किसी एक पर टिक ही नहीं सकता... इसलिये तुम्हारी यह बात नितांत गलत है।
4. क्या यह वाकई में हो सकता है ?
यह तो सामान्य चर्चा बात हुई... अब थोड़ा विस्तार देती हूँ।
एक मित्र हैं, जो कि हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर हैं, उन्होंने कहा "डॉ, आप भी ना कैसी कैसी बातें लेकर आती हैं, वैसे हाँ दिल के मामले में यह बात १०० % सही है, एक बार फेल हुआ तो बस गये काम से"
दूसरे मित्र जो ज्योतिषी हैं उन्होंने कहा "ऐसा नहीं होता, हर तरह की ग्रह दशा का निवारण भी होता है"
एक मित्र जो मेरी तरह ऊर्जा चिकित्सक हैं, उन्होंने कहा "जब एक तरफ से औरा में नकारात्मक ऊर्जा की वृद्धि होने लगती है तभी अपने प्रियजन अपने नहीं रहते, और औरा में ऊर्जा लगातार नकारात्मक रूप लेती रहे तो, आप "आप" भी नहीं रहते, इसलिये आपकी बात मे दम है"
एक मित्र जो कि नितांत धार्मिक हैं, उन्होंने कहा "आपने गलत बात बोली, कबीर ने कहा जब मैं था तब तुम नहीं, जब तुम हो मैं नाहि, मतलब कि इबादत में तुम तुम ही रह जाता है, मैं तो होता ही नहीं"
एक मित्र ने कहा, "जब तक तुम हो, तो जिन्दा हूँ, तुम नहीं तो जिन्दगी भी नहींं"
एक मित्र धार्मिक तो नहीं हैं पर आध्यात्मिक हैं उन्होंने कहा "जिन्दगी इसी का नाम है, प्रकृति और पुरूष दोनों साथ साथ हैं, तभी जीवन है, किसी एक की कमी दोनों के अस्तित्व को मिटा देने के लिये पर्याप्त है"
अब इतने सारे अर्थ जानकर तो मैं भूल ही गयी कि मैंने वास्तव में क्या सोचकर लिखा था। पर इससे एक विचार बार बार दिमाग में कौंध रहा है कि इतनी छोटी सी बात के कितने और कैसे कैसे अर्थ लगा लिये गये, फिर हम गीता कुरान के सही अर्थ कैसे निकाल सके होंगे... ये सच है कि भाषा भावों की अभिव्यक्ति का साधन है, पर यह साधन कितना सही है ?
क्या हम अपने भाव उचित रूप से अभिव्यक्त कर पाने में सक्षम हैं ?
अगर हाँ, तब तो बहुत अच्छी बात है, अगर नहीं तो क्या हम सिर्फ एक छलावे के साथ जी रहे हैं ??
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पिछले दिनों ई मेल मैसेंजर पर एक पंक्ति टांगी ""तुम" हो तो "मेरा" होना भी है, जो "तुम" नहीं तो "मै" कैसे!!!" सीधे सरल शब्द हैं, किसी भी तरह से कोई भारी भरकम, नहीं समझ मे आने वाला शब्द प्रयोग नहीं किया गया है।
अब इसको किस किस अन्दाज मे पढ़ा जा सकता है, क्या क्या अर्थ निकाला जा सकता है, वो मुझे मित्रों ने बताया क्योंकि सबने अपने अपने तरीके से अलग अलग अर्थ निकाले और जो प्रतिक्रियायें मिलीं, उनकी बानगी देखिये :-
1. अरे, कौन है वो ? सीधा सा प्रश्न जो एक मित्र ने दागा।
2. ठीक कहा, उसके बिना जीना अधूरा सा है ना, या यूँ कहो कि है ही नहीं।
3. ह्म्म.... जीवन किसी एक पर टिक ही नहीं सकता... इसलिये तुम्हारी यह बात नितांत गलत है।
4. क्या यह वाकई में हो सकता है ?
यह तो सामान्य चर्चा बात हुई... अब थोड़ा विस्तार देती हूँ।
एक मित्र हैं, जो कि हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर हैं, उन्होंने कहा "डॉ, आप भी ना कैसी कैसी बातें लेकर आती हैं, वैसे हाँ दिल के मामले में यह बात १०० % सही है, एक बार फेल हुआ तो बस गये काम से"
दूसरे मित्र जो ज्योतिषी हैं उन्होंने कहा "ऐसा नहीं होता, हर तरह की ग्रह दशा का निवारण भी होता है"
एक मित्र जो मेरी तरह ऊर्जा चिकित्सक हैं, उन्होंने कहा "जब एक तरफ से औरा में नकारात्मक ऊर्जा की वृद्धि होने लगती है तभी अपने प्रियजन अपने नहीं रहते, और औरा में ऊर्जा लगातार नकारात्मक रूप लेती रहे तो, आप "आप" भी नहीं रहते, इसलिये आपकी बात मे दम है"
एक मित्र जो कि नितांत धार्मिक हैं, उन्होंने कहा "आपने गलत बात बोली, कबीर ने कहा जब मैं था तब तुम नहीं, जब तुम हो मैं नाहि, मतलब कि इबादत में तुम तुम ही रह जाता है, मैं तो होता ही नहीं"
एक मित्र ने कहा, "जब तक तुम हो, तो जिन्दा हूँ, तुम नहीं तो जिन्दगी भी नहींं"
एक मित्र धार्मिक तो नहीं हैं पर आध्यात्मिक हैं उन्होंने कहा "जिन्दगी इसी का नाम है, प्रकृति और पुरूष दोनों साथ साथ हैं, तभी जीवन है, किसी एक की कमी दोनों के अस्तित्व को मिटा देने के लिये पर्याप्त है"
अब इतने सारे अर्थ जानकर तो मैं भूल ही गयी कि मैंने वास्तव में क्या सोचकर लिखा था। पर इससे एक विचार बार बार दिमाग में कौंध रहा है कि इतनी छोटी सी बात के कितने और कैसे कैसे अर्थ लगा लिये गये, फिर हम गीता कुरान के सही अर्थ कैसे निकाल सके होंगे... ये सच है कि भाषा भावों की अभिव्यक्ति का साधन है, पर यह साधन कितना सही है ?
क्या हम अपने भाव उचित रूप से अभिव्यक्त कर पाने में सक्षम हैं ?
अगर हाँ, तब तो बहुत अच्छी बात है, अगर नहीं तो क्या हम सिर्फ एक छलावे के साथ जी रहे हैं ??


