पार कर दे हर सरहद जो दिलों में ला रही दूरियाँ ,
इन्सानसे इंसान तक़सीम हो ,खुदाने कब चाहा ?
लौट के आयेंगी बहारें ,जायेगी ये खिज़ा,
रुत बदल के देख, गर, चाहती है फूलना!
मुश्किल है बड़ा,नही काम ये आसाँ,
दूर सही,जानिबे मंजिल, क़दम तो बढ़ा!
१५ अगस्त के पर्व पे एक अदना-सी रचना पाठकों को समर्पित है..चंद पाठकों ने पढी होगी...पुनरावृत्ती की माफी चाहती हूँ!
Read More...
इन्सानसे इंसान तक़सीम हो ,खुदाने कब चाहा ?
लौट के आयेंगी बहारें ,जायेगी ये खिज़ा,
रुत बदल के देख, गर, चाहती है फूलना!
मुश्किल है बड़ा,नही काम ये आसाँ,
दूर सही,जानिबे मंजिल, क़दम तो बढ़ा!
१५ अगस्त के पर्व पे एक अदना-सी रचना पाठकों को समर्पित है..चंद पाठकों ने पढी होगी...पुनरावृत्ती की माफी चाहती हूँ!


