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वात्‍सल्‍य निर्झर - कविता - अविनाश वाचस्‍पति

आपका प्रकाश एन जी ओ का प्रतीक चिन्‍ह
#‪#‎वात्‬‍सल्‍यनिर्झर
वायु चिकित्‍सा
एयर सर्जरी
संभव है
मेधा से
किए जाते हैं
सभी चमत्‍कार
समझते हैं हम
चमत्‍कार
पर न उसमें
चमक होती है
पर न होती है
उसमें कार
की चमकार
कार के मायने
जो समझते हैं
चौपहिया वाहन
पर करते हैं सवारी
जबकि कार का
जीवन कार्य
कारण या कारक
हाेना है
कारक वो जो सदा
सच्‍चे मन से किया जाए
सद्गुणों का अंबार लगाएं
अंबार लगाना
व्‍यापार सजाना
नोट कमाना
अपने उचित रूप में
सही कहलाता है
कारनामा
वही तो है
वात्‍सल्‍य निर्झर
जो पल पल झरता रहे
पुष्‍पों की तरह
महकता रहे
खुशबू की तरह
उड़ता रहे तितली की तरह
न कि पतझड़ की तरह
जबकि पतझड़ में
पत्‍तों का टूटकर
जमीन पर गिरना
नीचे सूखी-हरी घास पर
भी सकारात्‍मक है
पर काकरोचों की
किलमिलाहट चीख पुकार
गूंज में कैसे करोगे
सकारात्‍मकता का आवाह्न।
--- अविनाश वाचस्‍पति
9560981946
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तारक मेहता का उल्‍टा चश्‍मा सबको भा रहा है - कविता - अविनाश वाचस्‍पति


हंसने रोने की कविता
कभी जोर जोर से
हंसती है
और कभी उससे भी जोर से
रो पड़ती है दया भाभी की तरह।

पर कितना भी वह
रो या हंस जाए
तारक मेहता का चश्‍मा
उल्‍टा ही रहता है।

इस उल्‍टे चश्‍मे की
एक झलक देखने के लिए
और खुद को छिपाने के लिए
बोल बच्‍चन से लेकर
सलमान खान और चोटी के सितारे
तथा अभिनेत्रियां शामिल होकर
धन्‍य हो जाती हैं।

काफी अच्‍छा और कॉमेडी
तथा जीवन अनुभवों से भरपूर
धारावाहिक यह
धाराप्रवाह प्रवाहित हो रहा है।

पसंद बड़ों की
मुरीद बने हैं बच्‍चे इसके
सारे संसार को हंसा रहा है
सब कुछ है इसमें
इसमें न समा सके
ऐसा कुछ नहीं जग में।

- अविनाश वाचस्‍पति
मोबाइल 9560981946
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कायमचूर्ण, कयामत और यमराज - अविनाश वाचस्‍पति


आजकल की राजनीति कायमचूर्ण हो गई है जिससे वह हमारे सहयोग से वह कंकड़ पत्‍थर सब हजम कर लेती है जिस तरह कायम चूर्ण गर्म दूध या गुनगुने पानी के साथ लिया जाए तो बेहतर रहता है। कायमचूर्ण के प्रयोग से छोटी आंतें साफ हो जाती हैं जिससे डायबिटीज का खतरा पनप नहीं पाता है।
बरअक्‍स इसके वह सब हजम तो कर जाती है जिससे नोट, वोट, चोट, खोट, सोट इत्‍यादि मतलब वह सब जो यम के आने की आहट होती है। यम मौत का प्रतीक है आजकल कायमचूर्ण कई वैराटियों में बनने लगा है जिससे स्‍वाद लाजवाब रहे।अगर यम दूर न हो तो कयामत आ जाती है। कयामत का आना न नेता को और न वोटर को पसंद है। पसंदीदा कायमचूर्ण हो तो पौष्टिकता भी कायम रहती है। पर यम की मजबूरी है कि ‘देर आयद दुरुस्‍त आयद’ ऐसे ही करके वह यमलोक की नौकरी पर बना तो रहता है। बिना शिकार किए जाएगा तो उसकी नौकरी पर खतरा है, उसकी नौकरी जा भी सकती है।
यमराज को भी मौत का डर सता रहा है, सुनने-पढ़ने में बात हैरानी की है, पर सच्‍चाई यही है, जिसे यमराज भी जानता-समझता है, पर वह और क्‍या कर सकता है। संसार के अजीब रहस्‍यों में इसका शामिल होना, मतलब यह है कि सूचना क्रांति के तकनीकी दौर में कुछ भी हो सकता है, वही हो रहा है जिसपर भरोसा करना, भरोसे को लहूलुहान करना है। वैसे आज वह सब हो रहा है जिस पर आसानी से विश्‍वास नहीं होता है। अब मोबाइल फोन की ही बात करें कि वह इतना स्‍मार्ट हो गया है कि बाकी सब कुछ पीछे रह गया है। तकनीक का सफर अभी ऐसा लगता है कि बीते कल की बात है जब टाइपराईटर को धकिया कर, इलैक्‍ट्रानिक टाइपराइटर, टेलेक्‍स, फैक्‍स जैसी खूब सारी निर्जीव वस्‍तुओं के बाद मोबाइल फोन का आगमन हुआ, उस समय इस तकनीकी क्रांति की किसी ने कल्‍पना भी नहीं की थी, पर अब स्‍मार्ट फोन विस्मित करता है।
पर अब बदलाव की इस क्रांति पर हैरान होना अपनी मूर्खता जाहिर करने की तरह है, अगर आप इस सबसे चकाचौंध हो जाते हैं तब आपकी बुद्धि पर दाद देना एकदम से गलत है। आजकल के बच्‍चे जो तकनीकी की इस आंधी रूपी अंधी दौड़ में भाग रहे हैं, उनके पेरेंट गर्वमिश्रित बोली में कहते हैं कि उनका चाइल्‍ड जन्‍म लेते ही, मोबाइल गेम, टेबलेट, लैपटाप जैसी वस्‍तुओं का दीवाना है तो सबकी बांछें खिल-खुल जाती हैं। समाज में जिसे छूत का यह रोग नहीं लगा, उसका जीवन बेकार है। इस तकनीकी महामारी से जो पीडि़त नहीं हुआ, उसके जीने के कोई मायने ही नहीं है।
जबकि सोशल मीडिया का रोग ऐसा है जिससे अब बचने के उपाय खोजे जाने लगे हैं। 25 साल पुराना दोस्‍त या परिचित मिलने पर मिलने वाली खुशी को शब्‍दों में बयान नहीं किया जा सकता है। चाहे पहले उससे मित्रता कम, बैरभाव ज्‍यादा रहा हो, पर अब उससे मिलने को दोस्‍ती का भाव देकर बढ़ावा दिया जा रहा है। भाव भी ऐसा कि सारे हाव-भाव बढ़ जाते हैं। जबकि इसके कारण बैरभाव, लूटपाट, इंटरनेट पर ठगी की घटनाएं सामने आने लगी हैं। पर इनसे उलझना फिर सुलझना अच्‍छा लगता है।
आपके देखते-देखते ही भाजपा के मोदी, चाय बेचने के मामले को प्रचारित-प्रसारित करके पीएम बन गए हैं, वरना अब तक वह चाय ही बेचते रह जाते।   सोशल मीडिया की ताकत पर ही आप के अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, मनीष सिसौदिया, कुमार विश्‍वास ने अपने मुख्‍य आमदनी के धंधे को धकिया कर अपना अलग ही रुतबा-पहचान कायम की है। है किसी में हिम्‍मत कि इन्‍हें इसके कारण पब्लिक को नेतत्‍व करने की उनकी योग्‍यता पर उंगली उठा सके।
इस तकनीक ने फिल्‍मों को किस की किस्‍मत पर ला दिया है, कौन सी फिल्‍म आज ऐसी चल रही है जिसमें इस सोशल मीडिया की इस क्रांति से बचा जा सका हो। आज लाखों-करोड़ों का व्‍यापार इसके कारण अपार संसार में फैल चुका है। किस की किस्‍मत चिंगारी ज्‍वाला बनकर धधकेगी, इसके कयास भला कौन लगा सकता है। भाषा से लेकर दृश्‍यों तक आने वाले बदलावों को जरुरत बतलाया जा रहा है। जो सिनेमा के इस परिवर्तन से अछूता रह गया, उसने जीवन में कुछ हासिल नहीं किया। अपने बिग बी अमिताभ बच्‍चन ने कौन बनेगा करोड़पति के कई धारावाहिकों में नये प्रयोग करके अपनी कंपनी और डूबते कैरियर को बचाने में कामयाब हुए हैं, जिनमें उनके साथ सुदूर गांव के प्रतिभागियों ने अपनी विजय की जय-जयकार की, कई करोडपति बने।
ऐसा ही छोटे परदे पर सीरियल्स के जरिए हुआ, कितनों की किस्‍मत चमकी। कितने ही कॉमेडियन देखते-देखते अपना जलवा बिखेरने में कामयाब हुए, इसका तो अब अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है।
जब ऐसे में यम को जिंदा रहने के लिए भी अब वेट करना पड़ रहा है। मजबूरी जब इंसान से इंतजार करा देती है तो जाहिर है कि यम भी इंतजार करे। इंतजार करोगे तो कुछ नहीं मिलेगा कयामत के सिवाय। आखिर प्राणों का मोह तो यमराज के साथ भी जुड़ा हुआ है। वरना तो यमराज को भी कयामत तक पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता है। देखा है न सोशल मीडिया का चमत्‍कार, जिसे सब खुलकर नमस्‍कार कर रहे हैं और हैरान भी नहीं होते हैं। आपकी इस बारे में राय का इंतजार मुझे भी है, आपको नहीं है क्‍या ?
-    अविनाश वाचस्‍पति
-साहित्‍यकार सदन, 195 पहली मंजिल, सन्‍त नगर, ईस्‍ट ऑफ कैलाश के पास, नई दिल्‍ली 110065 फोन 01141707686/08750321868 ई मेल nukkadh@gmail.com
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चूहे बने हैं आज सबके बाप - अविनाश वाचस्‍पति



चूहे देखने में छोटन लगें ज्‍यों नाविक के तीर पर किसी से डरते नहीं हैं चूहे। वे चूहे ही क्‍या जो नेताओं से पीछे रहें। चूहे न नेताओं से पीछे रहते हैं और न ही उनके पीछे लगते हैं। माना कि नेताओं की तूती वब जगह बोलती है पर एक चूहे ने उत्‍तम प्रदेश के मुख्‍यमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस के दौरान सदा सत्‍य बोलने वाले सचिवालय के बिजली के तार कुतरने का श्रीगणेश किया है। चूहे की हिम्‍मत की दाद देनी पड़ रही है कि उसने हाथी जैसा विशालकाय जिगर पाया है और वह हाथी का लखते जिगर बन बैठा है। अब वह हाथी के जिगर के बालिश्‍त भर के जिगर की बराबरी कर रहा है। इसे ही तो कहा गया है कि ‘जिगर से बीड़ी सुलगाय ले’। इसे ही तो कहते हैं कि बीड़ी से जिगर जलाने वाला खेल, जलवा और रुतबा। अब तक हमारा हाथी जिंदा लाख रुपये की कीमत का तथा मरा हाथी सवा लाख रुपये की कीमत जितना मूल्‍यवान रहा है। परंतु अब मुहावरों के क्षेत्र में क्रांति का श्रेय एक चूहे ने अपने नाम कर लिया है कि तिरुवनंतापुरम के सांसद ने एक मरे हुए चूहे के साथ चित्र खिंचवाकर दिखा दिया क्‍योंकि उन्‍होंने अपने निर्वाचन एरिया में गंदे समुद्रीय जल की सफाई की थी। इससे मालूम चलता है कि चूहों की हिम्‍मत और खेल भावना का वर्चस्‍व अब दुनिया देखेगी। पहली बार है इसलिए ऐसी मिसाल भी अन्‍यत्र नहीं है। जबकि सौ चूहे मार कर हज यात्रा पर विमान जैसे काले कार्य को अंजाम तक पहुंचाया है, इसके लिए चूहों ने अपनी जान की बाजी पर खेल किया है।
अब भला किसमें इतनी हिम्‍मत है कि किसी चूहे की दबंगई पर सवाल उठाए। चाहे किसी चूहे को एक दिन का सी एम तक नहीं बनाया गया है पर उसके किए गए कार्य की गूंज दुनियाभर के मीडिया के द्वारा प्रिंट, चैनलों इत्‍यादि पर संपूर्ण क्रांति का बाप बन चुकी है। वह क्रांति क्‍या आज, जो संसार के सोशल मीडिया पर अनवरत प्रचारित और प्रसारित हो रही है। क्रांति की मूल अवधारणा से मेल खाती यह पाती सब जगह सम्‍मान पा रही है, कोई इसे पा ... पा ... पा ..... कहकर गुहार लगा चुका है। चारों ओर पापा ओ पापा की गूंज गुंजायमान हो रही है। सिर्फ हम ही जानते हैं कि इसकी उत्‍पत्ति के जनक संपूर्ण क्रांति के पिता ही हैं। आप उन्‍हें पिताजी कहने को मजबूर ही नहीं हुए हैं  बल्कि गर्व महसूस कर रहे हैं। चूहे जो अब तक रसोई, कमरे, अलमारियों, गंदी नालियों में घमासान मचाते रहे हैं, अब जल्‍दी ही आप इन्‍हें इनके नए रूप स्‍वरूप में देखेंगे। चूहे अब तक सिर्फ कंप्‍यूटर की कमांड संभालते रहे हैं पर अब जल्‍द ही मोबाइल सैल फोन की कमांड संभालते दिखाई देंगे। वह अपनी चूहिया प्रेमिकाओं से चैट में मशगूल नजर आएंगे। चूहों का यह नया चेहरा मार्क जुकरबर्ग को चूहे के चेहरे के लिए चेहराबुक यानी फेसबुक ओपन करने के मोहक प्‍लान के साथ दिखाई दे रहा है। मार्क जुकरबर्ग यूं किसी से मोह नहीं पालता पर यहां पर छोड़ने के मूड में तनिक भी नहीं है। नालियों, अलमारियों, रसोईयों इत्‍यादि से बाहर निकलकर चूहों की चुहेबुक का सार्वजनिक प्रदर्शन अपने चरम पर है। इसमें शैंपेन, रम और व्हिस्‍की चल रही है, बीयर त्‍याज्‍य है किसी को उसमें स्‍वाद नहीं आ रहा है। बीयर का मतलब सिर्फ भालू ही रह गया है और आलू की तरह उसकी तूतियां बोल रही हैं। आलू चिप्‍स की तूतियों से अधिक महंगी अब आलू की फसल किसानों को लुभा रही है, समझ लीजिए कि किसानों और उनके उगाए गए आलुओं के अच्‍छे दिन आ गए हैं। आलू के परांठे दुनियाभर में सबको मोहते रहे हैं पर अब परांठों से उपर मतलब परांठे बनने से पहले ही आलू अब अपने गरिमामयी स्‍वरूप में मौजूद है। आलू और भालू की तुक हेमामालिनी से मिलाने वाले अब चिकनी सड़कों की तुलना आलुओं से करने को विवश हैं। उनकी चिकनाहट भालू के बालों की स्‍मृतिपटल बन गई है।
इधर चूहे अपनी प्रेमिकाओं से आलू की बढ़ती कीमतों पर चर्चा में जुटै हुए हैं। उधर अन्‍य सब्जियों में निराशा भाव जन्‍म ले चुकी है। टमाटर फिसलकर अपनी पुरानी कीमतों से नीचे आकर रुक गए हैं। चाहे लाल सुर्ख हैं टमाटर पर हेमामालिनी आज शर्मिन्‍दा है और पानी के किसी कंपनी का विज्ञापन कर अपनी झेंप मिटा रही है। जबकि यह काम कोई नौसिखिया अभिनेत्रियां तक करती रही है और कर भी रही हैं। टमाटर अपनी किस्‍मत को बिसूर रहा है। प्‍याज आज किसी को अच्‍छी नहीं लग रही है, कोई उसकी तरफ विलोक नहीं रहा है, प्‍याज की यह दुर्दशा किस कारण से हुई है, सब इसी पर चिंतन में बिजी हैं। वरना तो प्‍याज और टमाटर ने आलू की बोलती बंद कर रखी थी पर अब आलू के कारण इनकी और उनकी सभी सब्जियों की बोलती बंद हो चुकी है। जबकि वह लुगाई ही क्‍या जिसके कारण खाबिंद की बोलती बंद न हुई हो पर वह आज के हलवाई तक बतला रहे हैं कि कौन लुगाई है, कौन हलवाई है, किसकी किसके कारण से बोलती बंद है चूहे जाज्‍वल्‍यमान उष्‍मा से ओत प्रोत हैं, भला अब भी किसी को बतलाने की जरूरत रह गई है। चूहों ने कीर्तिमान स्‍थापित कर दिया है, यह आजका वह मूषक है जिसका जादू कंप्‍यूटर के सिर चढ़कर बोल रहा है।
-    अविनाश वाचस्‍पति
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अविनाश वाचस्‍पति को सजाए फांसी के उपलक्ष में जोकसभा का आयोजन

इस तरह की पोस्‍टों को पसंद करना
टिप्‍पणी करना अनिवार्य है
वरना
अविनाश वाचस्‍पति की आत्‍मा
आपको तंग करेगी
आत्‍मा की शांति के लिए
पोस्‍ट को लाइक करना
और
उस पर कमेंट डालना
बनता है
पता नहीं
संता कहां है
पता चला है
कि अपना कमेंट
ई वी एस के जरिए
डालने गया है

आप भी डाल सकते हैं
शांति की चाह में
हिंदी ब्‍लॉग जगत की राह में
कमेंट
जिसमें बसते हैं
इंटरनेट के प्राण। 
#‪#‎शोकसभा
कुख्‍यात हिंदी ब्‍लॉगर
अविनाश वाचस्‍पति को
सजाए फांसी के उपरांत
श्‍मशानघाट निगम बोध घाट में
रात्रि 12 बजे
एक विशाल शोकसभा का
आयोजन किया गया है

आप इसमें शामिल होकर
अवश्‍य कृतार्थ हों
अपने अपने संस्‍मरण
लिखकर लाएं और 
जो न सुना पाएं
उसे वहां पर मौजूद
पत्र पेटी में जमा करवाएं
मौका मत चूकिएगा
सिर्फ पैदल 
शामिल होइयेगा
वाहन पाकिंग की सुविधा
महंगी होने के कारण
वापिस ले ली गई है

आप अपने हर्जे खर्चे के
जिम्‍मेदार स्‍वयं होंगे
जो संस्‍मरण सुनायंगे
नकद पांच हजार प्रति
संस्‍मरण भुगतान पाएंगे
बतलाइयेगा अब आप
कि आयेंगे 
या नहीं आयेंगे। 



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अविनाश वाचस्‍पति ने कविता का मतलब समझाया है (अविनाश वाचस्‍पति)

एक किलो मीठी मिठाई
पांच किलो नमकीन कविता
में से क्‍या खरीदोगे
कविता पांच सौ किलो
नमकीन या मीठी
कैसी भी हो
बिना पैसे खर्च किए
मिलेगी तो खरीद लोगे

पर क्‍या गारंटी कि
गारंटी इस बात की मांगोगे
कि खरीदकर भी नहीं पढ़ी तो
क्‍या बिगाड़ लोगे कवि
या कविता के सौदागर
सौदागिरी में काम आने लगी है कविता
सुनकर मोदी चिल्‍लाया
कविता के अच्‍छे दिन आए हैं
बिकने लगी है कविता
बिना पैसे दिए भी
बिकने लगी है कविता
कविता का पति नहीं है
यह काफी है
कविता खरीदने के लिए

कविता को पालने पोसने के लिए
एक आैर सुंदर कविता
कविता साथ में मिलेगी
सुनकर मैं बोला
एक कविता आज खरीद ली है मैंने
खरीदने गया था रसमलाई
खरीदकर लाया हूं कविता
कविता के बुरे दिनों का
सौदागर मैं
कविता के अच्‍छे दिन लाया हूं
मैं सफल व्‍यापारी हूं
आभारी हूं कविता जी
जो आप मुझे मिलीं
भली लगीं सो खरीद लाया हूं

खरीदने के लिए
कविता नहीं कहानी
उपन्‍यास, नाटक, नाटिका या नौटंकी
की खरीद व्‍यवसाय में
ला सकती है तूफान
पर आज वह काम
एक कविता ने किया है
कविता ने खूब बलिदान किया है
कविता का यह बलिदान
काले अक्षरों की उपज है
सोने के अक्षरों में गर लिखी जाती
कविता गर आज
तो लगती लाईनें
और सब लूटकर पूरी कविता
ले जाते
लुटेरे कहलाने से भी बाज नहीं आते

बाज आते हैं धरती पर यह देखकर
कि कविता नहीं
आदमी या जानवर की लाश है
लाश चूहे की भी हो सकती है
लाश की तलाश
बाज को महान बनाती है
उसकी तुलना में सबको
अपने से नीचे पाती है
वैसे भी कोई जाबांज ही
बाज को कर सकता है
आकर्षित
उसमें कशिश या खिंचाव पैदा

यह पैदाईश आदमी की पैदाईश से
काफी मुश्किल काम है
संकट की घड़ी में
घड़े में, ठंडे पानी के मटके में
मटकना छूटता नहीं है
मटका इसका फूटता नहीं है
बाज ही इसका कर सकता है सौदा
हर बार, हर दफा
वही बिकता है
जो कर दिया जाता है दफा
या लगाई जाए उस पर
दफा 302
कविता खरीदना
मर्डर करने के बराबर है

कवि मानने लगे हैं
पाठक भी बचने से सुनने के लिए
कविता पेलने पर
दफा 302 की मांग कर बैठते हैं
आओ एक कविता का सौदा करें
इसे सुनाएंगे
लालकिले से
या तालकटोरा स्‍टेडियम से
भरपूर इनाम पाएंगे
कितनी बार कई कवि
बिना सुनाए
न सुनाने का पारिश्रमिक
लेकर चले गए हैं
पर शर्म उन्‍हें नहीं आती
इस बात पर आती थी
उनको हंसी
अब हंसने की बात
कोई भी बात नहीं सुहाती है
हंसना भूल गए हैं
जब से कविता सुनने का
किया था फैसला
फैसले का बना है
इतना बड़ा फासला
कि फालसे गर्मी के
खीरा ककड़ी चुकंदर
जैसी कीमत भी अधिक लगती है
फ्री की कविता खरीदना भी

अब तो सजा लगती है। 
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.मेरे जीवन की एक रोमांचकारी घटना - अविनाश वाचस्‍पति मुन्‍नाभाई


रात के तीन बजे हैं। एकाएक महसूस होता है कि मेरा एक मित्र गिरधारीलाल शर्मा मेरे सिरहाने की ओर से अपने एक सा‍थी के साथ निकला है। वह बाहर दरवाजे की ओर नहीं गया है। मैं उठकर ड्राईंग रूम की तरफ उठकर जाता हूं पर वह दिखाई नहीं देता। सब दरवाजे बंद हैं। सीसीटीवी के कैमरे में उसके जाने को महसूस करना चाहता हूं पर असफल रहता हूं। धीरे धीरे सब याद आने लगा है जब वह दिखाई दिया उस समय मैं नींद में था। उसके जाने को ढूंढते समय मैं नींद से बाहर आ चुका था पर दोनों के बीच के अंतर को जाने क्यूं महसूस नहीं कर पा रहा था। बाहर भीतर सब एक हो गया। मानो दूध में पानी मिला दिया गया हो। बाद में बाहर बालकनी तक उसे और उसके साथी को ढूंढने गया। असल में उससे मिलने की चाह इसलिए मन में रही क्यों कि वह विदेशी मामलों के मंत्रालय कार्यालय में काम करता था और संभवत- तीन साल के लिए बाहर जाता था पर ऐसा पहली बार हुआ था कि वह गया और उसने मुझे सूचना तक नहीं दी। मैं अपनी बीमारी में व्यस्त रहा। हां, यह जरूर मालूम चला था कि वह अमेरिका या अफ्रीका देश में कहीं गया था। पर उसके बाद जो नींद टूटी तो आई नहीं और मैं जागता रहा। अगली रात फिर वह आया समय लगभग वही पर तब तक मुझे नींद नहीं आई। इस बार वे दोनों बाथरूम के भीतर उस ओर से आते दिखलाई दिए, जहां पर दीवार है। मैंने उठकर उसे तलाशने की कोशिश की पर असफल रहा। बाहर आकर देखा कि मुख्य दरवाजा बंद था। घर के अन्य सब सदस्य सो रहे थे पर मेरी आंखों में नींद कहां। मैंने अपने बड़े बेटे को जगाया और उससे इसका जिक्र किया। असल में मेरे मन में ऐसा महसूस हुआ कि उसके साथ अवश्य ही कोई घटना हुई है और वह मुझे बतलाना चाहता है पर उसका कोई संपर्क सूत्र उस समय मेरे पास नहीं था। इसके बाद न जाने क्यों मुझे बहुत क्रोध आया और मैंने अपनी धर्मपत्नी तक को अपशब्द कहे और जिस जिसने मुझे शांत करने की कोशिश की मेरे गुस्से का शिकार बना। यह गुस्सा भी अधिकतम तीन मिनिट का रहा जैसा कि आमतौर पर रहता है उसके बाद मुझे अपने उपर पछतावा भी हुआ। मेरी इकलौती बेटी और उसकी सहेली अपने कमरे में थे पर उनके बाहर आते ही मेरा गुस्सा उसकी सहेली पर चला गया और मैंने अपने घर की मूल्यीवान वस्तुओं को तोडना शुरू कर दिया । मेरे बेटे ने बामुश्किल मुझे शांत कराया यह गुस्सा तीन से लेकर सात मिनिट तक अवश्य रहा होगा। इसे भूकम्प मतलब शारीरिक जलजला कहा जा सकता है। असल में मुझे जब नींद आई होगी मुझे मालूम नहीं चला और वह दिखाई दिया। बाद का वाक्या होने तक मैं नींद से बाहर आ चुका था। न जाने मुझे ऐसा क्यों अहसास होने लगा कि उसके साथ जरूर ही कोई दुर्घटना हुई है और वह मुझे अपने साथ लेने आया था। जबकि बाद में जांच पड़ताल करने पर ऐसा कुछ नहीं मिला। बाद में मैंने उसके घर फोन किया तो मालूम हुआ कि उसका बड़ा बेटा इंडिया में है और छोटा उसके साथ गया था। पिता तथा पुत्र दोनों सोशल मीडिया के जरिए संपर्क में नहीं थे। जबकि आज कोई ऐसा मिले तो हैरानी होती है क्यों कि यह युग तकनीक का काफी उन्नत युग है और प्रगति हो रही है पर मेरे मित्र के पास मोबाइल फोन तक नहीं है। मालूम नहीं कि यह उसका पैसे को बचाने के कारण है अथवा अन्यं कोई वजह। कई बरस पहले जब उसकी पत्नी का निधन हुआ था तब वह डीटीसी में कार्यरत था और उसकी पत्नीी विदेशी मामलों के मंत्रालय में। उसके कार्यालय में उसकी नियुक्ति अनुकंपा के आधार पर की गई थी।

 जारी ......
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बजट की टच तकनीक



टच की तकनीक का वर्चस्‍व है। बजट जारी नहीं किया जाता। मंत्री महोदय पीएम महोदय का आदेश पाकर सिर्फ टच करते हैं और बजट जारी हो जाता है। बजट के रिलीज होते ही मंत्री महोदय को तो फारिग हो गए जैसा अहसास होता है जबकि पब्‍लिक जो अभी तक तनाव रहित थी, एकदम से तनाव में आ जाती है। बजट चीज ही ऐसी निकम्‍मी है कि क्‍या कहा जाए और क्‍या पूछा और बतलाया जाए। बजट कभी अपने असली रूप में नहीं आता है। वह सदा ही भेस बदलकर हाजिर आता है। आज वह रेल का रूप धारण करके कहर ढाने आया है। इससे दो दिन पहले उसने पब्‍लिक को लुभाने के लिए सेमी बुलेट ट्रेन का रूप रखा तब सारी फिजां उसकी दीवानी हो गई। उसकी स्‍पीड देख-सुन और पढ़कर सब विस्‍मित रह गए। उनका विस्‍मित होना ही बजट को टच करने पर माकूल नतीजे देता है।

मानो बजट नहीं, मोबाइल फोन हो गया। इस खासियतों से भरे पर छोटे महीने से उपकरण ने बच्‍चों से लेकर बड़े और बूढ़ों के जीवन में उथल-पुथल मचा दी है। यह हंगामा सिर्फ थल नहीं, वायु के सिग्‍नलों के जरिए अपना अधिक दिखला रहा है।  इसकी मिलीभगत महंगाई के साथ मिलकर की गई है। महंगाई के इस षडयंत्र से सभी पूर्व परिचित हैं और उनका यह पुराना अनुभव है पर यह सदा ही उनके झांसे में उलझ जाते हैं और खूब ध्‍यान लगाकर सुलझाने से भी सुलझते नहीं हैं। महंगाई की रेल बजट की पटरी पर स्‍पीड से फर्राटा भर कर पब्‍लिक को कुचलती हुई चली जा रही है। जाहिर ऐसे किया जाता है कि पब्‍लिक और रेल बजट की पटरी के बीच में पिसकर पब्‍लिक की किस्‍मत खुल जाएगी। पर यह मात्र छलावा ही साबित हुआ है। पब्‍लिक हर बार सदा की तरह यूं ही छली जाती है और छली जाती रहेगी।

पब्‍लिक को छलने के लिए सब ताक लगाकर बैठे हैं। पहले उन्‍हें ताक ऐसे दिए जाते हैं, मानो सबको राहत के मसनद बांटे जा रहे हों और वह निश्‍चिंत होकर ताक के सारे आराम से पसर जाते हैं। ताकने वाले इसी फिराक में रहते हैं और इनके पसरते ही इनके उपर रेल बजट की पटरी बिछाकर उस पर महंगाई की सेमी हाई स्‍पीड पब्‍लिक रौंद एक्‍सप्रेस दौड़ा देते हैं। यूं तो पब्‍लिक को इससे कुचले जाने की आदत डाल दी गई है और वह महसूस भी नहीं कर पाती।

इस बार महंगाई रेल का मुखोटा चेहरे पर चढ़ा कर चढ़ाई करने आई है। बच सको तो बच लो कितना बचोगे। नया पीएम अपने मंत्री को अपने सकारात्‍मक विकारों की दौड़ लगवा रहा है, जिसे पब्‍लिक विचारों की दौड़ समझ आंख और दिमाग मूंदकर दौड़ने में बाजी मार लेती है।

यह आंख मूंदना अंधभक्‍ति का द्वार है। द्वार भी ऐसा जो सदा ओपन रहता है और उस पर घातक से घातक वार किए जाते हैं। कभी रेल कि किराए के नाम पर, कभी डीजल, पेट्रोल, गैस के रेट बढ़ाकर और कभी रेट तो वही रहते हैं पर वजन घटा दिया जाता है। यह महाजनी परंपरा की सूदखोर व्‍यवस्‍था है। इसके कुप्रभाव से इसलिए नहीं बचा जा सकता क्‍योंकि इसकी खोरी जमा खोरी, जमा के साथ हरामखोरी का समन्‍वयन है। अकेले से आप पार पा सकते हो, हंगामा कर सकते हो, पर जो जमा है, उसे कैसे घटाओगे। बजट को टच करने का मुहुर्त हो गया है और मंत्री महोदय ने बजट को टच कर दिया है। इससे आपके सिवाय सब खुश हैं। अब तो आप भी खुश हैं न। 

                                -    अविनाश वाचस्‍पति
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आपका प्रकाश (अब भरोसे (ट्रस्‍ट) का यही नाम रहेगा)

Aapka Prakash




#‪#AapkaPrakash
किसी मित्र ने सुझाव नहीं दिया है
मैंने स्‍वंय अपन आप बदल दिया है
प्रकाश पुस्‍तकों का है
प्रकाश विचारों का है
प्रकाश रचनात्‍मकता का है
प्रकाश समूह का है
सब अच्‍छाइयों का प्रकाश है
समझ लीजिए आकाश है
अाकाश आपका अपना है
मैं तो निमित्‍त मात्र हूं
मिट्टी का पात्र हूं
मिट्टी कच्‍ची है
पर आपका प्रकाश
ऊर्जा है, आंच है
आंच वही जो सांच की है।

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विश्‍वासयोग्‍य 'आपका प्रकाशन' A TRUSTED NGO

##AAPKA PRAKASHAN
TRUSTED NGO
आपका प्रकाशन (गैर-सरकारी संगठन) आजकल एनजीओ की पहचान से सुर्खियों में है, का प्रतीक चिन्‍ह।





##monogram
आपका प्रकाशन के लिए कौन सा बॉर्डर कलर ठीक रहेगा।

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दुनिया है गोल - फुटबाल की गोलाई

फुटबाल जरूर देखी होगी आपने, उसे कभी न कभी दो चार लातें भी मारी होंगी। फुटबाल को सामने देखकर उसे लातों से ठोकने का मन बन ही जाता है। आप एक लात मारते हैं और वह अपने बचने के लिए भाग लेती है। आप उसके पीछे दौड़कर फिर दो चार लातें और जड़ देते हैं और अगर वह आपके सिर की ऊंचाई को क्रास कर गई तो फिर अपना सिर उसे दे मारते हैं। यह मारना इसलिए चालू रहता है क्‍योंकि फुटबाल की पीटने वाली प्रक्रिया इस दौरान निष्क्रिय रहती है। इससे आपके हौसले बुलंद हो जाते हैं।
मन में क्रिकेट प्रेम होते हुए भी फुटबाल से एक असीम दुलार वाला भाव बना रहता है। सामने वाला सिर्फ पिट रहा हो तो उसके प्रति प्‍यार उमड़ना स्‍वाभाविक है। अबोध शिशु जो क्रिकेट, फुटबाल अथवा किसी अन्‍य खेल के अंतर को नहीं जानता। इस आयु में अपनी आंखों से सबमें तुलना करने की असफल, कुछ सफल कोशिश करता रहता है। इसे पहचानने की कोशिश करता है, किसी किसी को अच्‍छी तरह पहचान लेता है। फिर घुटनों के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश में विजयी रहने के बाद, धीरे-धीरे आगे बढ़ना और रेंगना शुरू कर देता है। इसी बीच वह अस्‍फुट शब्‍दों में पुकारता है,यह पुकारना बोलने की शुरूआत कही जाती है। उस उम्र में, जबकि शिशु के लिए उम्र के कोई मायने नहीं होते,उसके लिए गुब्‍बारा भी फुटबाल होता है, गेंद भी, सेब भी, संतरा भी या कोई प्‍लास्टिक की खाली बोतल। उसके लिए हंसना, मुस्‍काराना भी फुटबाल और रोना,चीखना,चिल्‍लाना भी फुटबाल सरीखा। भूख लगने पर पीने के लिए मिलने वाला दूध उसके लिए वह गोल होता है, जिसे उसने हाल ही में अचीव किया है।
आप अच्‍छी तरह जानते हैं कि मां-बाप के लिए बच्‍चा अमूल्‍य निधि होता है और उसकी हंसी भरी खिलखिलाहट खजाना। जिसे संसार की किसी तराजू पर तोला नहीं जा सकता है। सब उसे प्‍यार करना, पुचकारना चाहते हैं। बच्‍चा जिसे भी नजर भर देखकर हंस या मुस्‍करा दे तो वह धन्‍य हो जाता है। यह सिर्फ घर की बात नहीं है – सभी नाते-रिश्‍तेदार, चाचा, बुआ, नानी, ताई, दादा, पिता,दीदी, भैया सबके लिए वह मासूम और भोला होता है। बच्‍चा हंसी का गोल जिस ओर फेंक दे, खुशियां जमाने भर की बिखर-बिखर जाती हैं।
पर इन दिनों संसार जिस फुटबाल को खेल रहा है, वह ब्राजील का है। इस खेल को खेलने वाले फुटबाल कला में कुशल और पारंगत होते हैं। फिर भी अचरज सब विजयी नहीं होते। यह सृष्टि का एक ऐसा रहस्‍य है जो हमेशा से रहस्‍य ही बना हुआ है। जबकि इसमें नामी खिलाड़ी जीतने के लिए फुटबाल को अनेक तरीकों से पीटते हैं। इस जीत पर खिलाड़ी का कैरियर होता है। जीतने के कैरियर पर तब भी कोई बैरियर नहीं होता है। जीतते जाओ, फुटबाल को पीटते जाओ और गोल समेटते जाओ। खेल खेलो अथवा नहीं खेलो पर गोल सहेजना आदत में शुमार हो जाता है। हरेक कदम मजबूती से जमाओ। जमे पैरों से तेजी से आगे बढते जाओ, न कि फुटबाल की तरह डगमगाओ। किसी थाली के बैंगन की तरह लुढ़को मत, बरफी,चमचम की तरह एक ही जगह जमे रहो। स्‍वाद को इनके लजीजपने का शिकार करने दो।
संसार रूपी फुटबाल का देख लो कमाल, एक फुट से अधिक दूरी हो तो कामयाबी नहीं मिलती। इसलिए संघर्ष के लिए न देर करो और न दूरी रखो। तभी खाने को मिलती रहेगी हलवे संग पूरी अन्‍यथा जीत की इच्‍छा रहेगी अधूरी।

                              -    अविनाश वाचस्‍पति
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