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हिन्दी भाषा और साहित्य में चिट्ठाकारिता की भूमिका -अभिव्‍यक्ति में रवीन्द्र प्रभात ने पेश किया है, अवश्‍य पढि़एगा

साभार अभिव्‍यक्ति
वर्ष-२०१० में हिंदी चिट्ठाकारिता के चहुमुखी विकास में पूरे वर्ष भले ही अवरोध की स्थिति बनी रही, किन्तु बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका अपने इस आकलन को लेकर करीब-करीब एकमत है कि आने वाला कल हमारा है यानी हिंदी चिट्ठाकारिता का है। इसकों लेकर किन्तु-परन्तु हो सकता है कि हिंदी चिट्ठाकारिता का विकास अन्य भाषाओं की तुलना में धीमा रहा, लेकिन इसे लेकर किसी को संशय नहीं होना चाहिए कि हिंदी चिट्ठाकारी उर्जावान चिट्ठाकारों का एक ऐसा बड़ा समूह बनता जा रहा है जो किसी भी तरह की चुनौतियों पर पार पाने में सक्षम है और उसने अपने को हर मोर्चे पर सिद्ध भी किया है । वस्तुत: विगत वर्ष की एक बड़ी उपलब्धि और साथ ही आशा की किरण यह रही है कि चिट्ठों के माध्यम से वातावरण का निर्माण केवल वरिष्ठ चिट्ठाकारों ने ही नहीं किया है ,अपितु एक बड़ी संख्या नए और उर्जावान ब्लोगरों की भी आई है,जिनके सोचने का स्तर परिपक्व है। वे सकारात्मक सोच रहे हैं,सकारात्मक लिख रहे हैं और सकारात्मक गतिविधियों में शामिल भी हो रहे हैं। पूरा पढ़ने व प्रतिक्रिया देने के लिए क्लिक कीजिए, यह आपका ही मामला है 
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रोके रुके न हिन्‍दी

http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2010/rokerukenahindi.htm
रोके रुके न हिन्‍दी
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हिन्‍दी ब्‍लॉगरों लड़ाई झगड़े छोड़ो : अपनी ताकत जमाने को दिखला दो - अभिव्‍यक्ति को अपनी साकार करो (अविनाश वाचस्‍पति)

जलजला कुमार और ढपोरशंख और बेनामी सरीखे हिन्‍दी ब्‍लॉगर-टिप्‍पणीकारों से विशेष आवाह्ल।


कमल से लो सीख लो। वो खुद सिखलाने नहीं आएगा। आप उसकी जीवन प्रक्रिया को जानो, समझो और मंथन करो। जिस प्रकार कमल का फूल गंदे पानी के तालाब में रहकर भी पुष्पित होता है । जीवन की तरह, जीवन के लिए खिल उठता है। आप भी सबके जीवन में वैसे ही रंग भरो। मोर के साथ भी ऐसा ही है, पर उसके पैरों की गंदगी की तरफ गौर मत करो। उससे ऊपर की सुंदरता निहारो। मयूरपंख के सौंदर्य को भला भुलाया जा सकता है। वह छिपाया भी नहीं जा सकता है। इंसान भी बुराईयों और गंदगी पर टिका हुआ है। उस बुराई और गंदगी को अपने मन पर जगह पर मत दो। अपनी ऊर्जा को उसी में निरर्थक मत गंवाने दो। जमाने को दिखला दो कि बुराई और गंदगी, विवाद और झगड़ों के मध्‍य रहकर भी हम ऐसा रच सकते हैं, जिस पर जमाने को गर्व हो सकता है। नहीं रच सकते ? कोशिश तो कर सकते हैं, एक बार, दो बार न सही, पर बार बार कोई असफल नहीं होता है। किसी दिन तो असफल में से अ हटेगा और उसके बाद सफलता आपकी कलम या कीबोर्ड को चूमेगी और उसके बाद स भी हट जाएगा और फल की प्राप्ति होगी। वो फल कैसा होगा, कैसा होगा उसका स्‍वाद, कितनी मात्रा में मिलेगा - यह सब आपकी सफलता और असफलता से निर्धारित होगा। सफलता पाने के लिए निराश होना नहीं, अनुभवों से सीखना जरूरी है। अनुभवों के सभी भावों को जान लो, अपने विचारों में उतार लो। फिर जो फल मिलेगा, वो सिर्फ आपको ही नहीं, सबको पसंद आएगा। पूरी गुणवत्‍ता और मात्रा में मिलेगा। लेकिन अब मैं भाषण बंद करता हूं। आपको और भी पोस्‍टें पढ़नी हैं, टिप्‍पणियां करनी है। इसके अतिरिक्‍त जीवन के और सत्‍यों से दो चार होना है।
आप अभिव्‍यक्ति से परिचित होंगे और अनुभूति से भी परंतु अनुभूति की अभिव्‍यक्ति से अगर नहीं हैं परिचित तो अभी हो जाएं और इस लिंक को क्लिक करना छोड़कर आगे मत बढ़ जायें। अगर आगे बढ़ गये तो फिर यह अवसर हाथ नहीं आयेगा। अवसर सिर्फ 10 जून 2010 तक ही है। कलम अगला विशेषांक- कमल नहीं माउस इस पर क्लिक करें।
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आतंकवादी की नाक खतरे में : अभिव्‍यक्ति में खोल रहे हैं राज : हमारे आपके सबके अविनाश वाचस्‍पति जी


........... आम हालातों में शौहर अपनी बीबी से तभी दुखी होते हैं जब वे उनसे घर के कार्य करवाने लगती हैं और बरतन मांजने के लिए कड़ाके की ठंड में भी गरम पानी की व्यवस्था नहीं करतीं। निःसंदेह इस स्थिति को दुखद माना जा सकता है तो क्‍या आजकल लादेन ऐसी ही विकट परिस्थितियों के संकट से जूझ रहा है। शौहर से सिर्फ चाय बनवाने या खाना बनवाने जैसी घटनाएँ अब दुर्घटनाओं की श्रेणी में नहीं गिनी जाती हैं। ये तो अब पुरुषों की दैनिक चर्या का अंग बन चुकी हैं। लेकिन आतंकवादियों को तो अपनी जान के लाले पड़े रहते हैं उस पर ये कठिन कर्म निश्चय ही उनके जीवन में आतंक भर देती होंगी। हालात तब और वीभत्‍स हो उठे होंगे जब उन्‍हें अपने नवजात शिशुओं की गीली लंगोटियाँ भी साफ करने के लिए मजबूर कर दिया गया होगा। पता नहीं बेचारे आतंकवादी के साथ क्या गुजर रही है। यह सब तो पूरा पढ़ने के लिए क्लिक कीजिए
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कथा महोत्‍सव 2008 : टीम अभिव्‍यक्ति ने परिणाम घोषित किए : बधाई और महाबधाई

नुक्‍कड़
देता है बधाई
कथा महोत्‍सव 2008 के
सभी विजेताओं को
और उन्‍हें भी जो विजयी
नहीं हो पाए
पर जिनकी भागीदारी से
विजेता विजेता बने।

विजेता तीस हैं
शुभकामनाएं एक सौ चौवन
भेज रहा हूं
जिन्‍होंने भाग लिया
सब भागीदारों को एक एक
पहले दस विजेताओं को तीन तीन
बाकी बीस विजेताओं को दो दो
इन्‍हें आपस में वितरित कर लें।

एक महाबधाई आयोजकों को
कुछ महाबधाईयां
प्रायोजकों, संयोजकों और निर्णायकों
के लिए भी
पर उनकी संख्‍या ही नहीं मालूम
इसलिए असंख्‍य दे रहा हूं।

सभी स्‍वीकारें।
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ब्‍लॉगरों आना मत भूल जाना : अभिव्‍यक्ति में दीपावली की शुभकामनायें पाना (अविनाश वाचस्‍पति)

अभिव्‍यक्ति हूं मैं

आप जानते हैं न मुझे

पढ़ते हैं न मुझे

तो फिर अपनी राय भी दिया करें
।


दिवाली है इसलिए

दिया करें

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तेरस की तहस-नहस और दिवाली का दिवाला
उसके पास दिया जलाने

यहां पर आना
दिया यहां पर जलता मिलेगा

आपका मन खिल उठेगा।
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कच्‍ची कली कचनार की

कचनार
अभिव्‍यक्ति के 5 मई 2008 के नवीनतम अंक में अपने लीक से हटकर संपादकीयों के लिए ख्‍यातिप्राप्‍त माननीया पूर्णिमा वर्मन जी ने कचनार विशेषांक प्रकाशित करने की घोषणा की है। इस पर उन्‍होंने जो रचनाएं मांगी है, उनकी अंतिम तिथि जानने के लिए कलम गही नहिं हाथ ज्‍यों का त्‍यों सादर उद्धृत किया जा रहा है -

कलम गही नहिं हाथ

कच्ची कली कचनार की यह एक कहावत है, गाना है और अनुप्रास अलंकार का उदाहरण भी। कचनार की कली को कोमल सौंदर्य का प्रतीक समझा जाता है। संस्कृत में इसे कोविदार कहते है। कालिदास इसके सौंदर्य का वर्णन करते हुए ऋतुसंहार में कहते हैं- चित्तं विदारयति कस्य न कोविदारः यानी ऐसा कौन है जिसके मन को कोविदार का सौंदर्य विचलित न कर दे। जिन्होंने कचनार का फूल देखा है वे लोग कालिदास के इस विचार से ज़रूर सहमत होंगे। मराठी में आज भी इसका नाम कोविदार ही है। हिंदी तक आते आते कोविदार कचनार कैसे बन गया यह खोज का विषय हो सकता है, पर इसको खोजे कौन? कंकरीट के जंगलों में पैसे की दौड़ में खोए कितने लोग होंगे जो अपने बगीचे के पौधों के नाम जानते होंगे? अपनी सड़क पर खिलते वृक्षों को पहचानते होंगे? ईश्वर ने हमें मुफ़्त की हवा दी है साँस लेने के लिए, प्रकृति का सौंदर्य दिया हैं मन को प्रफुल्लित करने के लिए पर हम मुफ़्त की चीज़ों की क़द्र करना भूल गए हैं। इन भूली हुई यादों को ताज़ा करने के क्रम में हम पिछले दो सालों से सुंदर फूलों वाले वृक्षों के विशेषांक निकालते आए हैं। २००६ में गुलमोहर विशेषांक और २००७ में अमलतास विशेषांक के बाद इस क्रम में इस वर्ष बारी है कचनार की। आपकी रचनाएँ सादर आमंत्रित हैं। रचनाएँ भेजने की अंतिम तिथि ३१ मई है। --पूर्णिमा वर्मन (टीम अभिव्यक्ति)
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