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समीर लाल जी ने कहा और हिन्दी ब्लॉगरों ने सुना, आप भी पढि़ए
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सकारात्मक गतिविधियों से ही होगा हिंदी ब्लोगिंग का विस्तार : समीर लाल
सखी री, आया न मानसून..सुनिये-समीर लाल!!
परसों ज्ञात हुआ कि पत्रिका सोपानStep के जुलाई २०१० के अंक में नारदवाणी कॉलम में, जिसे भाई अविनाश वाचस्पति जी नियमित लिख रहे हैं, में एक आलेख छपा, जिसका शीर्षक था ’ जुलाई भी बन गयी जून,सखी री आया न मानसून’ .
शीर्षक देखते ही मैने वहाँ कमेंट किया कि अरे, यह तो गीत बन सकता है और जब तक मैं कुछ लिखता तब तक सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी ने वहीं कमेंट में कुछ पंक्तियाँ पेश भी कर दीं. अब चूँकि हम कह चुके थे और भाई अविनाश ने उस पर मुहर भी लगा दी थी कि आप लिखिये और उसे नुक्कड़ से प्रस्तुत करिये तो पीछे कैसे हटते. अतः फिर गीत लिखा गया और उसे गाने का बीड़ा उठाया सुश्री अर्चना चावजी ने.
पर्यावरण चेतना पर आधारित यह गीत और वीडियो फिल्म कैसी लगी, बताईयेगा. फिल्म के लिए सभी चित्र गूगल से साभार लिए गये हैं. अभियान का प्रतीक चिन्ह (लोगो) अपने ब्लॉग पर लगाने के लिए कोड उड़न तश्तरी के साईड बार से लें.
जुलाई भी बन गयी जून
सखी री आया न मानसून
पंथ निहारे खेतिहर तरस गये
धरती की मांग भई सून.
सखी री आया न मानसून
कलयुग ने कैसा रंग दिखाया
पानी से सस्ता है खून
सखी री आया न मानसून
अबकी ये बदरा ऐसे हिराये
जैसे पिया गये रंगून
सखी री आया न मानसून
सूरज ने ऐसा कहर दिखाया
बिन पानी सब सून
सखी री आया न मानसून
वृक्ष कटे, वो खेला धरा से
कथा का ये ही है मजमून..
सखी री आया न मानसून
-समीर लाल ’समीर’
* हिराये = खोये, गुमे
विडियो यहाँ देखें:
मेरे यू ए ई के मित्र यहाँ सुनें:
गीत का लिंक यहाँ क्लिक करके पायें.
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शीर्षक देखते ही मैने वहाँ कमेंट किया कि अरे, यह तो गीत बन सकता है और जब तक मैं कुछ लिखता तब तक सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी ने वहीं कमेंट में कुछ पंक्तियाँ पेश भी कर दीं. अब चूँकि हम कह चुके थे और भाई अविनाश ने उस पर मुहर भी लगा दी थी कि आप लिखिये और उसे नुक्कड़ से प्रस्तुत करिये तो पीछे कैसे हटते. अतः फिर गीत लिखा गया और उसे गाने का बीड़ा उठाया सुश्री अर्चना चावजी ने.
पर्यावरण चेतना पर आधारित यह गीत और वीडियो फिल्म कैसी लगी, बताईयेगा. फिल्म के लिए सभी चित्र गूगल से साभार लिए गये हैं. अभियान का प्रतीक चिन्ह (लोगो) अपने ब्लॉग पर लगाने के लिए कोड उड़न तश्तरी के साईड बार से लें.
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जुलाई भी बन गयी जून
सखी री आया न मानसून
पंथ निहारे खेतिहर तरस गये
धरती की मांग भई सून.
सखी री आया न मानसून
कलयुग ने कैसा रंग दिखाया
पानी से सस्ता है खून
सखी री आया न मानसून
अबकी ये बदरा ऐसे हिराये
जैसे पिया गये रंगून
सखी री आया न मानसून
सूरज ने ऐसा कहर दिखाया
बिन पानी सब सून
सखी री आया न मानसून
वृक्ष कटे, वो खेला धरा से
कथा का ये ही है मजमून..
सखी री आया न मानसून
-समीर लाल ’समीर’
* हिराये = खोये, गुमे
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