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पाबला जी, नदिया-जल, वृक्ष-फल...खुशदीप

नदिया न पीए कभी अपना जल,
वृक्ष न खाए कभी अपने फल,
अपने तन का,मन का, धन का दूजों को जो दे दान है,
वो सच्चा इनसान अरे इस धरती का भगवान है,
नदिया न पीए कभी अपना जल...


अगर किसी का तन जले और दुनिया को मीठी सुहास दे
दीपक का उसका जीवन है जो दूजों को अपना प्रकाश दे,
धर्म है जिसका भगवद् गीता, सेवा ही वेद-कुरान है,
वो सच्चा इनसान अरे इस धरती का भगवान है,
नदिया न पीए कभी अपना जल...


चाहे कोई गुणगान करे, चाहे करे निंदा कोई,
फूलो से कोई सत्कार करे या काटे चुभा जाए कोई,
मान और अपमान ही दोनों जिसके लिए समान है
वो सच्चा इनसान अरे इस धरती का भगवान है...
नदिया न पीए कभी अपना जल...






पाबला जी ने अपनी ज़िंदगी के फ़लसफ़े को चरितार्थ करता हुआ भजन आज अपनी पोस्ट पर दिखाया-सुनाया...इस भजन का एक-एक शब्द जीवन में उतारने लायक है...पाबला जी ने क्या कमाया है, ये आज उनके जन्मदिन पर ब्लॉग जगत में चारों तरफ से उमड़े प्यार और सम्मान ने साबित कर दिया है...मैं इस पोस्ट के ज़रिए प्रस्ताव करता हूं कि आज से हर साल 21 सितंबर को पाबला डे के तौर पर मनाया जाए...
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