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आगरा में ताज साहित्‍य उत्‍सव 2013 का भव्‍य शुभारंभ : अखबारों में भरपूर कवरेज

आज के समाचार पत्र अमर उजाला, दैनिक जागरण, सच का सामना, डीएलए, आई नेक्‍स्‍ट इत्‍यादि इत्‍यादि ताज साहित्‍य उत्‍सव 2013 के भव्‍य शुभारभ की पल पल की जानकारी चित्रों के साथ दे रहे हैं। आप इन्‍हें ऑनलाईन भी पढ़ सकते हैं।
शुभारंभ








कैमराधारक अविनाश वाचस्‍पति हैं इसलिए आप उन्‍हें चित्रों में नहीं देख पा रहे हैं।


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आगरा में नए मीडिया की आंच महसूस कीजिएगा : ताज साहित्‍य उत्‍सव 2013

इसे डाउनलोड करके दोबारा से खोलें, पढ़कर पूरी जानकारी ले पाएंगे


ताज साहित्य उत्सव 2013 को रविवार 3 फरवरी 2013 को DPS SHASTRIPURAM, AGRA प्रोग्राम 

पहला सत्र- सुबह 11 बजे से 1 बजे तक

विषय : साहित्य की कसौटी पर नये मंचों की लिखत-पढ़त

पैनल :
1- श्री रेजीनैल्ड मैसी
2- श्री राहुल देव
3- श्री आलोक पुराणिक
4- श्री हर्ष छाया
5- श्री अरविंद जोशी
6- श्री चंडीदत्त शुक्ला

दूसरा सत्र 2 बजे से 4 बजे तक
विषय : सोशल मीडिया की भाषा, सरोकार और उपयोगिता के आयाम
1-श्री राहुल देव
2-श्री प्रमोद जोशी
3-श्री प्रतीक पांडे
4-श्री अविनाश वाचस्पति
5-श्री राजेश जैन
6-श्री आलोक श्रीवास्तव

तीसरा सत्र 4.15 से 5.30
सोशल मीडिया बनाम रचनात्मक प्रयोग की ज़मीन ( कुछ सुन लिया जाए)
1-आलोक पुराणिक, शायरी
2-पीयूष पांडे, शायरी
3-अविनाश वाचस्पति, फाइकू
4-हर्ष छाया, ब्लॉग पाठ
5-चंडीदत्त शुक्ला, कविता
6-अरविंद जोशी, कविता
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3 फरवरी 2012 को आगरा में डॉ. हरीश अरोड़ा : ब्‍लॉग विमर्श पुस्‍तक में आलेख प्रकाशन के लिए हिन्‍दी चिट्ठाकार अभी नंबर मिलाकर बात कर लें

किसने कहा हिंदी चिट्ठाकारी में तेजी का रुझान नहीं देखने में आ रहा है। जिसने भी यह उड़ाया है, वह अफवाह उड़ाने में माहिर है। हिंदी चिट्ठाकारी में तेजी वह शेयर है जो फेस नहीं देखता, अब वह बुक (पुस्‍तक) देख रहा है। पिछले वर्ष हिन्‍दी चिट्ठाकारी पर तीन पुस्‍तकें प्रकाशित होकर खूब चर्चित हुई हैं और उनकी मांग बढ़ी हुई है। इस विधा में और अधिक काम करने का विश्‍वास लिए हम फिर से हाजिर हैं, ब्‍लॉग विमर्श पुस्‍तक के प्रकाशन के लिए। आप सबसे विनम्र अनुरोध है कि यदि आप इस पुस्‍तक में अपना शोधात्‍मक आलेख भेजना चाहते हैं तो विषय और प्रारूप के साथ डॉ. हरीश अरोड़ा जी से फोन नंबर 09968723222 पर बात कर लें।
- अविनाश वाचस्‍पति
'ब्लॉग विमर्श' किताब के लिए आलेखों के संकलन का काम जोरों पर है. मन में कुछ विचार उफान रहे थे. उन्हें आलेखबद्ध करने में लगा हूँ. चंद शब्द उस लेख से ........

- डॉ. हरीश अरोड़ा

हर इंसान की यह सोच होती है कि वह अपने विचारों और संवेदनाओं को अभिव्यक्ति देने के लिए कला के किसी-न-किसी माध्यम को आधार बनाए और इसके लिए उसे सबसे सरल और सशक्त माध्यम मिला ‘भाषा’। भाषा ही वह साधन है जो किसी भी मनुष्य को अभिव्यक्ति के लिए एक विराट जगत प्रदान करती है। मनुष्य अनुभूति के क्षणों को जब तक जीता है तब तक वह उसकी निजता का साक्षी रहता है लेकिन जैसे ही वह शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त होता है तब वह उसकी निजता से निकलकर सामाजिक सम्पत्ति बन जाते हैं।
जीवन की पीड़ा को अनुभूत करते हुए उसे शब्दों के आकार देकर साहित्य-सर्जना करने वाले साहित्यकार के लिए तो जैसे उसका साहित्य प्रसव-पीड़ा के बाद के सुखद आनन्द के क्षण का-सा भास देता है। पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से नवीन सूचना प्रौद्योगिकी ने समाज और समूची जीवन-धारा को प्रभावित किया उससे भला साहित्य और साहित्यकार कैसे अछूते रह सकते थे। इंटरनेट और उसकी दुनिया तो एक आम-आदमी के साथ-साथ साहित्यकार के लिए भी काल्पनिक दुनिया थी। अपनी रचनाओं के प्रशंसकों के लिए उसे पाठकों की तलाश करने की आवश्कता उसे हमेशा रही लेकिन उसने कभी यह न सोचा होगा कि आने वाले कल में उसकी दुनिया प्रकाशक की नहीं वरन् ‘पोस्ट और पेस्ट’ की होगी। उसकी इस तलाश को पूरा किया ब्लॉग (चिट्ठा) ने - जहाँ वह अपनी निजता को अभिव्यंजित करने के लिए अपनी संवेदनाओं और विचारों के शब्दों का डिज़िटलीकरण करता है और ये शब्द उसके ब्लॉग के माध्यम से समाज के सभी वर्गों के पाठकों तक सहजता से पहुँच जाते। इस तरह देखा जाए तो ब्लॉग निजता की सामाजिक अभिव्यक्ति के डिज़िटल-शाब्दीकरण का एक ऐसा माध्यम है जो सूचनात्मक और सृजनात्मक साहित्य को परम्परागत विधाओं के दबाव से मुक्त करता है और अभिव्यंजित होने के लिए विस्तृत कैनवास देता है। यह निजी डायरी भी है और सार्वजनिक किताब भी। यह सृजन-कर्म भी है और विमर्श भी।
एक समय जब साहित्यकारों और कलाकारों के लिए ‘कॉफी हाऊस कल्चर’ का प्रचलन अपने जोरों पर था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों ने नयी सूचना तकनीकों के आगमन के कारण ‘कॉफी हाऊस कल्चर का प्रचलन हाशिए पर आ गया। उसकी जगह इंटरनेट की सोशल साईट्स ने ले ली। ऐसे में साहित्यकारों के बीच संवादहीनता की स्थिति के चलते उन्हें लगने लगा कि कहीं तकनीक की दुनिया के इस नए सामाजिक क्षेत्र के कारण उनकी दुनिया सीमित न हो जाए, ऐसे में अपने आरम्भिक दौर में इंटरनेट और ब्लॉग लेखन से परहेज करने वाले साहित्यकारों ने इसकी अहमियत को समझा और अपने ब्लॉगों के माध्यम से एक नए समाज और पाठक वर्ग से जुड़ते चले गए। इस तरह ‘काफी हाऊस कल्चर’ की जगह ‘ब्लॉग कल्चर’ ने ले ली। इस ब्लॉग कल्चर का फायदा कला जगत से जुड़े सभी कलाकारों ने उठाया। चाहे वह साहित्यिक ब्लॉगिंग हो, चाहे संगीत ब्लॉगिंग या चित्र ब्लॉगिंग - ‘ब्लॉग कल्चर’ ने सभी को अपने भीतर समेट लिया।
एक समय जिस कलाकार को, चाहे वह कला के किसी भी माध्यम को क्यों न अपनाता हो, उसे अपनी रचनाधर्मिता को समाज तक लाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। लेखकों की पुस्तकों को आम-सामाजिक या पाठक तक पहुँचाने के लिए प्रकाशकों को पुस्तकालयों की खरीद पर निर्भर रहना पड़ता था। ऐसे में भी उन पुस्तकों के पाठक कौन होंगे और उस पुस्तक पर उनकी प्रतिक्रिया होगी इससे लेखक या प्रकाशक का कोई सीधा-सम्बन्ध नहीं बन पाता था। पुस्तकों के प्रचार-प्रसार के लिए पत्र-पत्रिकाओं में उनकी आलोचनात्मक-समीक्षाओं के लिए पुस्तकों को भेजना अनिवार्य-सा हो गया था। लेकिन तकनीक की इस नयी कल्चर ने तो जैसे रचनाधर्मियों के लिए विमर्ष का एक नया दायरा खोल दिया। एक आम सामाजिक से लेकर विशेषज्ञों की आलोचनात्मक टिप्पणियों ने तो जैसे एक नई विमर्ष-संस्कृति का निर्माण कर दिया। जिन लेखकों की अभिव्यक्ति सशक्त होने पर भी उन्हें प्रकाशकों का सहारा नहीं मिला वे लेखक भी ब्लॉगिंग की दुनिया के निराला और मुक्तिबोध होने लगे। उन्हें देश ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर भी पाठकीय-प्रतिस्पंदन मिलने लगा। लघु-आलोचना का एक नया दौर शुरू हो गया।
ब्लॉगिंग ने आम-सामाजिक को केवल विचारों को पढ़ने या समझने की सीख ही नहीं दी बल्कि अपनी अभिव्यक्ति के लिए विकसित शब्द-भण्डार से भी परिचित कराया। ब्लॉगिंग के आगमन पर जिन रचनाकारों और भाषाविदों ने भाषा के खतरे को लेकर चिन्ता व्यक्त की वही लोग अब ब्लॉगिंग की इस दुनिया में पंख फैलाकर उसके असीमित आकाश में अपने विचारों और संवेदनाओं को अभिव्यंजित कर रहे हैं। ऐसे लोगों की अभिव्यक्ति ने ही आम-सामाजिक को भाषा-ज्ञान दिया। अब उसके पास भी अपना एक विशाल आकाश था जहाँ उसने अपने भीतर की खुशियों को शब्द-सुमनों से सजाया वहीं अपनी दुःखद अभिव्यंजनाओं पर शब्दों का मरहम भी लगाया।
ब्लॉगिंग की दुनिया में कदम रखते ही एक आम-आदमी के लिए तो जैसे अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम हाथ लगा जिसके लिए उसे किसी दबाव की आवश्यकता नहीं थी। वह अपनी संवेदनाओं को स्वयं गढ़ता और ब्लॉग पर चस्पा कर देता। तत्काल प्रतिक्रियाओं ने उसकी रचनाधर्मिता की आलोचना के माध्यम से उसे अपनी कमज़ोरियों को समझने और उन्हें ठीक करने का अवसर दिया। सीखने और सिखाने के लिए इससे बेहतर विकल्प और क्या हो सकता है? दूसरी ओर स्थापित साहित्यकारों के लिए भी यह एक ऐसा माध्यम बन गया कि अब अपनी रचनाओं और भावनाओं के लिए प्रकाशकों के दबाव और रचनाओं के प्रकाशन के संघर्ष से उसे रूबरू नहीं होना पड़ता बल्कि वह स्वयं ही प्रकाशक भी हो गया है और सम्पादक भी। बाज़ार में बैठे प्रकाशकों और सम्पादकों से उसका कोई सरोकार नहीं रहा। निजी और सामूहिक ब्लॉगों के माध्यम से वह अपनी रचनाधर्मिता को एक नया आयाम दे रहा है।
दरअसल पाठकों और लेखकों के बीच सीधा-सम्बन्ध स्थापित करने वाली इस विधा ने समाज के आम-आदमी के साथ-साथ प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी अपनी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए ब्लॉगिंग की ओर अग्रसर किया है। अब तो ब्लॉग-ब्रह्म के मंत्र को समझते हुए वे भी कहने को बाध्य हो गए हैं कि ‘बिन ब्लॉगिंग सब सून’। जन-पत्रकारिता और जन-साहित्य (या कहें लोकप्रिय साहित्य) का ऐसा माध्यम जिसने साहित्य और पत्रकारिता दोनों की ही तस्वीर बदल दी है। अगर कहें कि विमर्ष का यह नया आधार आज सबसे सशक्त माध्यम है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

 
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आज आगरा आ रहा हूं मैं

जी हां
आज दिन में पहुंचूंगा
और वापसी
कल दोपहर को होगी।
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आओ चलते हैं आगरा : फिर मिलते हैं ब्‍लॉगर बंधुओं से - संभव हो तो इस कार्यक्रम में शामिल हों (अविनाश वाचस्‍पति)

सोच रहा हूं
इस कार्यक्रम में
कैसे पहुंचूं
मिल गया है हल
मन से पहुंचूंगा
और मानस में
करूंगा महसूस
पर आप अवश्
हाजिर होना।



आगरा ही नहीं हिंदी जगत की प्रतिष्ठित संस्था आनंद मंगलम सा तत्वावधान में १४ मई २०१० को माथुर वैश्य सभा भवन आगरा पर अखिल भारतीय कवि सम्मलेन और डॉक्टर राय एवं व डाक्टर रंजन, डॉक्टर परिहार का सम्मान किया जायेगा। यह जानकारी पूरा पढ़ने और शुभकामनाएं देने के लिए यहां पर क्लिक कीजिए
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