लोक मेधा के कलमकारः रवीन्द्र प्रभात

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  • () डॉ. रामबहादुर मिश्र 

    विगत पाँच छः वर्षों में साहित्यकार रवीन्द्र प्रभात की छवि साहित्य जगत में एक ब्लॉगर, ब्लॉग विश्लेषक एवं लगभग आठ अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन के संयोजक के रूप में स्थापित हो गयी है जबकि उन्होने साहित्य की अनेकानेक विधाओं में प्रभावी लेखन किया है। एक सहृदय कवि, लोक कथाकार, कुशल निबंधकार, सफल संपादक और सार्थक संगठनकर्ता भाई रवीन्द्र प्रभात के बारे में लिखते समय तय नहीं कर पाता कि उनकी किस सृजनधर्मिता को उत्कृष्ट या उल्लेखनीय कहूँ-‘को बड़ छोट कहत अपराधू'। यह किसी भी कलमकार की प्रतिभा का कमाल है कि जिस विषय पर भी कलम चलाया पाठकों की बाहबाही मिली। ऐसा प्रभात जी के साथ है। उन्होने गजल संग्रह ‘मत रोना रमजानी चाचा‘, गीत-गजल संग्रह ‘हम सफर‘, कविता संग्रह ‘स्मृति शेष‘, उपन्यास ‘प्रेम न हाट बिकाय‘ और ‘ताकि बचा रहे लोकतन्त्र‘ समीक्षात्मक पुस्तक ‘हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास‘, हिन्दी मासिक ‘परिकल्पना समय‘ और संपादित पुस्तक ‘समकालीन नेपाली साहित्य‘ और सह संपादित ‘हिन्दी ब्लॉगिंगः अभिव्यक्ति की नई क्रान्ति‘ के माध्यम से साहित्य जगत को अपनी बहुमुखी प्रतिभा से परिचित कराया है। उनका सर्वाधिक चर्चित व्यंग्य धारावाहिक ‘धरती पकड़ निर्दलीय‘ बहुचर्चित रहा जिसे वरिष्ठ साहित्यकार गिरीश पंकज ने प्रयोगधर्मी उपन्यास की संज्ञा दी है। 

    रवीन्द्र प्रभात के लेखन की विशेषता है कि वे जिस जीवन और समाज से अनुभव बटोरते हैं उससे अगाध प्रेम भी करते हैं। वे उस परिवेश का चित्रण ही नहीं करते अपितु उसे जीते भी हैं। सीतामढ़ी बिहार जहां उनका जीवन बीता उसे छोड़े हुये एक युग बीत गया किन्तु आज भी उनके मन में रचा-बसा है उनका गाँव, वहाँ की संस्कृति, वहाँ के सुख-दुःख। धरती पकड़ निर्दलीय (उपन्यास) का बढ़ाईपुरवा गाँव प्रकारांतर से उनका गाँव है-गाँव की समृद्धि की कामना, विवशता, अभाव, अशिक्षा, रूढ़ियाँ, संस्कृति प्रेम, संस्कृति में निहित प्रतिरोध क्षमता, राजनीति का पतन, राष्ट्रीय सुरक्षा, दलाली-ठेकेदारी, भ्रष्ट नौकरशाही, वोट का व्यापार, स्वार्थपरता, अमरीकी दादागिरी, पाँच परमेश्वर बनाम प्रपंच परमेश्वर, जनता की संपत्ति का बंदरबान्त, दिल्ली का बिचित्र चरित्र, पारस्परिक विद्वेष, गाँव में बढ़ता असंतोष, अनाचार, अन्याय, अपराध, भ्रष्ट पुलिस, मंहगाई, कठिन जीवन यापन, सरकारी तंत्र, जन प्रतिनिधियों के कारनामे, गाँव में आते नए परिवर्तन, गांवो का शहरीकरण, गांवो में पहुँचती संचार क्रान्ति, वैश्वीकरण-बाजारीकरण, राजनैतिक भ्रष्टाचार और सबकुछ होने के बावजूद जीता जागता गाँव। यह सब व्यक्त करना कठिन होता यदि रवीन्द्र प्रभात के पास भोगा हुआ यथार्थ न होता। 

    गाँव की जनता संचार क्रान्ति में वह सबकुछ जानती है, प्रादेशिक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सभी मुद्दों पर वह स्वस्थ बहस करती है। धरती पकड़ निर्दलीय का एक प्रसंग दृष्टव्य है- ‘‘ई त बड़ी दूर की बात कहत हौ निर्दलीय जी। नेतवन हो या ब्यूरोक्रेसी या फिर नककटवा सबका चरित्र हो गया है हमारे देश मा तवायफ के गजरा जइसा। रात को पहनो सुबह को उतार दो। सब ससुरा समझ लिया है ई देश को रामजी की चिरई रामजी का खेत।‘‘ लोकतन्त्र की ताकत का अहसास है हर आदमी को - ‘‘ई जो पब्लिक है राम भरोसे सब जानत है। सभके पहचानत है। चाहे महामाया हो चाहे सोनिया चाची। आज तक केहू पब्लिक के वार से कबौ बचल चाची? नोएडा से लखनऊ तक बहिन जी खाके खिलाके सोशल इंजीनियरिंग के हाथी दाँत के पाठ जनता के पढ़ौली सब धन बाईस पसेरी वाला हिसाब तोता नियन रटौली। मगर एन मौके पर सब गुड गोबर हो गइल। चुनाव आयोग मतदान खातिर महिना गलत चुन लिहले। फागुन मा वोट डाले से ससुरा सब गड़बड़ हो गइल। भंग के तरंग में उड़ गइल धज्जी सोशल इंजीनियरिंग के आ गइल प्रदेश मा अखिलेश का नया साम्राज्य।‘‘ 

    कुल मिलाकर देखा जाये तो रवीन्द्र जी लोकभाषा की ताकत को भलीभाँति समझते हैं और उसका सटीक प्रयोग भी करते हैं। 

     अध्यक्षः अवध भारती संस्थान, लोकसदन, नरौली, हैदरगढ़, बाराबंकी (उत्तर प्रदेश)

    1 टिप्पणी:

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