जीत में छिपी हकीकत : दैनिक राष्‍ट्रीय सहारा 30 मई 2014 अंक में प्रसंगवश स्‍तंभ के अंतर्गत संपादकीय पेज पर प्रकाशित

जीत को जनता का आदेश मानकर स्वीकारना जीत को महाजीत बना देता है। गंगा की सेवा को अपने भाग्य से जोड़ लेना सुकर्म, उस पर गंगा मैया से आशीर्वाद लेना और आरती करना आस्था का गंगाकुंभ है। इस बार इससे चुनावों में देश के मुखिया पद की प्राप्ति हुई है। यह दौर निश्चित ही अचंभित करता है। जबकि यह असंभव नहीं है। धरती पर असंभव कुछ भी नहीं है। मन और मानस की आस और विास इसे शिखरत्व की ओर बढ़ाते हैं। इन सबका आपस में समाहित होना टीम वर्क की बेहतरीन मिसाल है। इस बार के चुनाव में यही स्थितियां विजय की कारक बनी हैं। जहां तक इसके लिए किए गए विरोध की हकीकत है, वह यह है कि लोहे की स्प्रिंग, फोम, डनलप या रबर को जितना अधिक नीचे की आर दबाओगे, वह उससे कई गुनी ताकत से बाहर शिखर की ओर प्रवाहमान होगी। बिल्कुल उसी प्रकार जिस प्रकार किसी रबर की गेंद को जमीन पर जितनी शक्ति से पटकोगे, वह उससे कई गुना ताकत से आसमान की ओर उछलेगी। इस बार के चुनाव में यही क्रिया इस महाजीत के मामले में प्रतिक्रिया बनी और जीत बढ़कर जश्न बन गई। समर्थन करना, गुणों की खान खोदकर बखान करना बहुत ही सरल कार्य है, जिसे कोई भी कर सकता है। इसके लिए न किसी विशेषज्ञता की न विशेष अनुभव की जरूरत होती है। इस प्रचार-प्रसार पर अधिक ध्यान जाता भी नहीं है, जबकि इसके विपरीत जिसका जितना विरोध किया जाएगा, वह रबर की गेंद की भांति उतनी ही तेजी से उछलकर जनता की नजरों में आएगा और उसको जानने के प्रति जिज्ञासा बढ़ाएगा। हवा में उड़ रही पतंग जब कटती है, उस समय हवा जिस ओर अपनी गति में बह रही होती है, कटी पतंग भी उस ओर बढ़ लेती है, यह प्रकृति का स्वाभाविक नियम है। चाहे इस लहर का नाम दो या कुछ भी कह लो। पर उस कटी पतंग को पकड़ने के लिए बच्चों के मन में उत्साह का अतिरेक होता है और भरपूर गहमा-गहमी के बावजूद उस पतंग को पकड़ने के लिए सब मन में विजयी होने का भरोसा लिए उसके पीछे दौड़ पड़ते हैं। सबके मन में पतंग लूटने का वही भाव-विास होता है। जो उन्हें कर्म के प्रति उत्साह से लबालब कर देता है। मन में उमंगे जाग जाती हैं। सफलता एक को मिलती है पर अपने लिए सबके मन में भरोसा जाग जाता है। इसे ही आत्मविास का अतिरेक कहा गया है। इसलिए इसे लूट का नाम देना गलत है। सब जानते हैं कि लूट उसे कहा जाता है, जिसमें सामान जबरन उसके मालिक से हथिया लिया जाता है। पर अगर वह लापरवाही या अन्य कारणों से छूट या गिर जाता है तो लूट कहना गलत है। लूट मतलब डकैती, जबकि इस विजय में ऐसा भाव कतई नहीं है। गौर से सोचेंगे तो इसमें कई तरह के अन्य उपादान दिखाई दे रहे हैं। जिनमें छूट की लूट वाले भाव का वर्चस्व भी सक्रिय मिलेगा। कटी पतंग को पतंग का मालिक और काटने वाला भी पकड़ कर लाने के लिए पूरी तरह आजाद हैं पर काटने वाला अपनी उड़ रही पतंग के स्थायित्व के लिए आशान्वित है और जिसकी पतंग कट गई है, वह उसके कटने की खामियों पर ध्यानमग्न है। यह अपनी हार के कारणों का विश्लेषण है। इनमें से एक पतंग न पाकर, सिर्फ काटकर ही जीत का आनंद ले रहा है, जैसे आप। दूसरा पतंग के पीछे न दौड़कर उसमें सावधानी बरतने की संभावनाओं पर गौर कर रहा है। इनमें विजयी कोई नहीं हुआ है पर उनमें संतोष का परम भाव है और यही भाव मन को परोक्ष रूप से उद्वेलित किए हुए है। जबकि पतंग को अपने कब्जे में लेने वाला स्वयं को विजयी मान प्रसन्न है। वह इसका जश्न भी मना रहा है, प्रचार भी कर रहा है और विजय यानी पतंग तो उसके हिस्से में आई ही है। यह कटी पतंग वर्तमान चुनावी माहौल को अच्छी तरह से प्रतिबिंबित कर रही है जबकि इसके गहरे तक छिपे पहलुओं पर विचार नहीं कर पा रही है इसलिए सतही बनकर रह गई है। देश का राजनीतिक माहौल कटी पतंग की मनोदशा से गुजर रहा है। पतंग एक के पास ही आई है, जबकि सबने इस पर नजरें गड़ाई थीं। पतंग लूटने की छीना-झपटी और कशमकश में पतंग फट भी सकती थी। यह चिंतनीय है। पतंग हाथ में भी आए और साबुत भी रहे, यह बहुत जरूरी है। वरना पतंग से कोई नहीं खेल पाएगा और न खेलेंगे और न खेलने देंगे वाली स्थिति खेल को बिगाड़ देगी। ऐसी विध्नसंतोषी राजनीति में सर्वाधिक सक्रिय हैं। इनसे बचकर सत्ता पाने के लिए ध्यान साधना सरल नहीं है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सही,सटीक और मुझे तो सरस भी लगी विश्लेषण की यह शैली !

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  2. अतिविश्वास ही सही पर विकल्प भी तो नहीं हैं

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