दृश्‍यांतर - मीडिया, साहित्‍य, संस्‍कृति और विचार का मासिक : संपादक अजित राय


कौन कौन से दृश्‍य हैं भीतर
भीतर उनके सारगर्भित विचार
हम बतला भी दें यहां पर
आप क्‍यों मानें
खरीद लें प्रवेशांक को
पढ़कर बतलायें
कैसा लगा
और क्‍या चाहते हैं आप।

भीतरी पन्‍नों को
आंखों और मानस के जरिए
उधेड़ना दरअसल
आपके बुने जाने की
सहज सरल प्रकिया है।

अपनी इस जिम्‍मेदारी से
आपको नजरें नहीं चुरानी
जैसा महसूस किया है
सब बातें हैं बतलानी।

इसके भीतर हैं
संवाद श्‍याम बेनेगल से
धारावाहिक उपन्‍यास राजेन्‍द्र यादव का
नाटक असगर वजाहत का
और संस्‍मरण रामगोपाल बजाज के।

इतने पर ही नहीं कीजै बस
अभी है और भी बहुत कुछ
यह तो बानगी भर है
सिनेमा भी मौजूद है
रिपोर्ताज भी
डायरी और स्मृति आख्‍यान
और संपादकीय न हो
यह कैसे हुआ
अंतिम पेज पर तो
नहीं मिला जबकि
आजकल वहीं पर
छपता है।


1 टिप्पणी:

  1. पत्रिका के सभी पक्षों को आपने अपनी कविता में समाहित कर दिया । बहुत बढ़िया ।

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