वर्जनाओं के विरुद्ध एकजुट : सोच और शरीर

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  • गिरीश बिल्लोरे मुकुल
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  •  जागरण जंक्शन का आभार अवश्य कहना होगा उनने जागरण रीडर्स ब्लाग पर  मेरे ब्लाग "मिसफ़िट" पर प्रकाशित आलेख वर्जनाओं के "विरुद्ध एकजुट : सोच और शरीर" को पसंद किया और मुझे श्रेष्ठ सप्ताह के ब्लागर होने का मौका दिया... मैं अभिभूत एवम आभारी हूं............

    इस आलेख को मेरे ब्लाग स्पाट पर के ब्लाग "मिसफ़िट" पर यहां भी  देखा जा सकता है..!
    कुछ अंश
    " पिछले दस बरसों में जिस तेजी से सामाजिक सोच में बदलाव आ रहे हैं उससे तो लग रहा कि बदलाव बेहद निकट हैं शायद अगले पांच बरस में… कदाचित उससे भी पहले .कारण यह कि अब “जीवन को कैसे जियें ?” सवाल नहीं हैं अब तो सवाल यह है कि जीवन का प्रबंधन कैसे किया जाए. कैसे जियें के सवाल का हल सामाजिक-वर्जनाओं को ध्यान रखते हुए खोजा जाता है जबकि जीवन के प्रबंधन के लिये वर्जनाओं का ध्यान रखा जाना तार्किक नज़रिये से आवश्यक नहीं की श्रेणी में रखा जाता है.जीवन के जीने के तौर तरीके में आ रहे बदलाव का सबसे पहला असर पारिवारिक व्यवस्थापर खास कर यौन संबंधों पड़ता नज़र आ रहा है. बेशक विवाह नर-मादा के व्यक्तिगत अधिकार का विषय है पर अब पुरुष अथवा महिला के जीवन की व्यस्तताओं के चलते उभरतीं दैहिक (अनाधिकृत?) आकांक्षाओं के प्रबंधन का अधिकार भी मांगा जावेगा कहना कोई बड़ी बात नहीं."

    1 टिप्पणी:

    1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
      आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (23-08-2013) को "ईश्वर तू ऐसा क्यों करता है" (शुक्रवारीय चर्चामंचःअंक-1346) पर भी होगी!
      सादर...!
      डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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