सकारात्‍मक लेखन की चुनौतियां : दैनिक जनसंदेश स्‍तंभ 'उलटबांसी' 6 अगस्‍त 2013 में प्रकाशित



गरीबी पर योजना आयोग बार बार मुद्दे को गर्म कर देता है मानो ठंडे खाने को गर्म कर रहा हो और हर बार अपनी ही हदों से बाहर उबल-उबल कर गिरने लगता है।  ऐसे में लेखक के लिए जरूरी है कि वह गरीबी जैसे सनातन पर पुराने घिसे-पिटे विषय पर नए सिरे से ऐसा लिखे कि दोहराव न हो और पुराना छपा दोबारा छपवाने से सदा परहेज करे। जबकि दोनों तरह के लेखक पाए जाते। यह मत समझिए कि लेखक दो तरह के ही होते हैं। कुछ लेखक मुद्दे के पक्ष और विपक्ष में खूब अच्‍छी तरह से लिख लेते हैं, कुछ ऐसा लिखते हैं कि दोनों का बराबर संतुलन बना रहे। इनमें से कुछ को शर्तिया नेता होना चाहिए था, पर वे न जाने किन मजबूरियों के चलते लेखक बन गए।

जो छप जाए अच्‍छा, कई बार अलग-अलग दोनों तरह का ही छप जाता है। यह वे लेखक होते हें जो लिखने से अधिक किसी भी तरह छपने को वरीयता देते हैं। इंटरनेट के दौर में जो लेखक अपनी रचनाओं को अलग-अलग क्षेत्रों के अखबारों में छपवाते हैं, यह विचारों को अधिक व्‍यापक तौर से अधिक पाठकों तक पहुंचाने का उनका ऐसा तरीका है जो एकदम सही है। इसका कारण पूछने पर उनका कहना है कि कुछेक अखबारों के संपादक आजकल की सूचना क्रांति के इस महज सस्‍ते दौर में रचना मिलने पर उसके छपने या न छपने की सूचना देने में अपनी हेठी समझते हैं। जबकि इसके विपरीत कुछ स्‍वीकृति की सूचना के साथ प्रकाशन के दिन की भी जानकारी देते हैं। उधर विषय पुराना होने पर उनका लेखन आउटडेटेड हो जाता है। इसलिए वे लिखने के बाद न छपने का रिस्‍क नहीं लेते हैं और जो संपादक बतला देते हैं, उन्‍हें भेजे/छपे लेख मजाल कि कहीं पर दोबारा छप जाएं।

वह बात दीगर है कि दूरदराज के अखबार उनकी रचनाओं को हूबहू अपने अखबार में छाप लेते हैं और उसकी सूचना भी नहीं देते हैं। कई बार वे तो वे रचनाकार का नाम प्रकाशित करना भी जरूरी नहीं समझते हैं। ब्‍लॉग से अच्‍छी रचनाओं का चयन करके भी अखबारों में प्रकशित किया जाना एक स्‍वस्‍थ परंपरा है। जबकि इस पर ब्‍लॉग लेखक इसलिए कुपित पाए जाते हैं कि उनकी रचना तो छाप दी गई लेकिन न तो उसके प्रकाशन की सूचना ही उन्‍हें मिली और न ही प्रकाशित रचना की स्‍कैन प्रति अथवा लिंक ही, ऐसे में पारिश्रमिक या मानदेय की उम्‍मीद करना तो बिल्‍कुल बेमानी है।

मेरा मानना है कि बेहतर विचारों का प्रकाशन अवश्‍य होना चाहिए और उन्‍हें अधिक से अधिक पाठकों तक किसी भी जरिए से पहुंचना चाहिए। पर अधिक उत्‍साही लेखक इससे यह न समझ लें कि वे अपनी रचनाओं के इश्‍तहार छपवाकर अखबारों में डलवा या नुक्‍कड़, चौराहों और मोहल्‍ले में बंटवा सकते हैं। वे कर सकते हैं पर उन्‍हें इसलिए नहीं करना चाहिए क्‍योंकि यह एक तो सस्‍ती लोकप्रियता वाला हथकंडा है, दूसरा वे कोई दवाईयों, स्‍कूल, नृत्यशालाओं, जिम, साइबर कैफे का विज्ञापन तो कर नहीं रहे हैं।
इससे निष्‍कर्ष यह निकलता है कि बेहतर लिखो, अपना पाठकवर्ग तैयार करो, वह सकारात्‍मक लिखने और पाठकों तक पहुंचने से ही तैयार होगा।

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  2. बेहतर लिखना,
    अपना पाठकवर्ग तैयार करना,
    सकारात्‍मक लिखना और
    पाठकों तक पहुंचना



    वाह. यही है सार

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    उत्तर
    1. सर ... सर .... सर .....
      आपने पकड़ लिया है सारे
      कार्टून कला भी शब्‍दों का ही सारा सार।

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  3. उत्तर
    1. शुक्रिया कृ
      ष्‍ण जी
      याद रखता हूं
      सबको ध्‍यान में
      तभी लिख पाता हूं।

      हटाएं

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