एक बार फिर हम कमजोर देश साबित हुए : जनसंदेश टाइम्‍स में संपादक की कलम से : 30 जून 2013

हमारा कमजोर होना
हमें बनाता है
बार बार कमजोर
घटता जाता है जोर
हम हैं 
जोरदार कमजोर

जोर जो जबर्दस्‍ती होना चाहिए
इसका तक नहीं कर पाते हैं हम
सब मिलकर बंदोवस्‍त
जोर के मामले पर
हो जाते हैं पस्‍त

पस्‍त के बाद सुस्‍त 
सुस्‍त के बाद 
उठाते हैं 
रोज रोज 
हर मोर्चे पर
भयंकर कष्‍ट

कष्‍ट से चाहते हैं मुक्ति
पर जबर नहीं बन पाते। 

2 टिप्‍पणियां:

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