प्राप्ति और प्रतीति

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  • गिरीश बिल्लोरे मुकुल
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  • परिंदों,
    तुम् आज़ाद हो,
    उड़ो,
    ऊँचे
    और ऊँचे,
    जहाँ
    सफलता का दृश्य,
    बाट जोहता है।
    जहाँ से कोई योगी,
    पहले पहल सोचता है ?
    इस आव्हान का असर,
    एक पाखी ने फड़फड़ाए पर,
    टकराकर, जाने किस से -गिर गया -!
    विस्तृत बयाबान में....!,
    तब
    से अब तक
    हम,आप और !!
    ताड़ के पत्तों से,

    2 टिप्‍पणियां:

    आपके आने के लिए धन्यवाद
    लिखें सदा बेबाकी से है फरियाद

     
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