उस तस्वीर पर जूतियां चलाने एक मातहत रख लूं..!!

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  • गिरीश बिल्लोरे मुकुल
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  •     जी चाहता था उस बिन ठुड्डी वाले तस्वीर एक दीवार पर लगा दूं जिसने आज़ मुझे सरे आम बेवज़ह अपमानित किया ....उस तस्वीर पर जूतियां चलाने एक मातहत रख लूं   वो मुझे मेरे किये धरे कार्यों की गलतियाँ गिनाता , सबके सामने खुले आम मुझे ज़लील करता हुआ अपने को मेरा भाग्य विधाता साबित करता है......!
    सच मुझे ईश्वर ने जीते जी अपने मरने का दु:ख सह सकने की ताकत न दी होती तो मैं उस बेचारे मूर्ख को भी आइना दिखा देता और होता ये कि -"मुझे नौकरी से हाथ धोना पङता , मेरे का बच्चों का स्कूल छूट जाता , मैं कोर्ट कचहरी के चक्कर में उलझ जाता । धीमे-धीमे मेरे करीब आता न्याय .... और ज़लालत से मिलाती निजात । लेकिन तब तक मैं दुनियाँ से बीस बरस पीछे चला जाता और आगे होती चाटूकारों की फौज सो मैं चुप हूँ ......... लेकिन उसको आइना तो दिखाना ही है... जो मुझे आइना दिखाता रहा है !

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