उम्मीद की लौ

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  • फ़ज़ल इमाम मल्लिक

    वक्Þत तेज़ी से भाग रहा था और उतनी ही तेज़ी से भारत की मुट्ठियों से मैच भी फिसल रहा था। समय जैसे-जैसे भाग रहा था हमारे चेहरे पर उदासी, मायूसी और नाउम्मीदी की परत गहरी होती जा रही थी। पत्रकार दीर्घा में बैठे हम पत्रकार ही नहीं गैलरियों में तिरंगा लहराते...तालियां बजाते दर्शकों के चेहरे पर भी गुज़रते वक्Þत के साथ-साथ नाउम्मीदी गहरी होती जा रही थी। हम में से बहुतों को यह उम्मीद थी कि भारतीय महिला हॉकी टीम भागते समय के बीच ही कोई चमत्कार कर दिखाएगी और हार के जबड़े से जीत को खींच लाएगी। ओलंपिक में जगह बनाने के लिए भारतीय महिलाओं को इससे बेहतर मौक़ा शायद ही फिर कभी मिले। घरेलू मैदान पर अपने दर्शकों के बीच खेलना किसी भी टीम को बेहतर करने के लिए प्रेरित करता है। इसलिए इस बार भारत के लिए बेहतरीन मौक़ा था। लेकिन समय भागता गया और मैच में वापसी की उम्मीदें धीरे-धीरे दम तोड़ती गईं। मैच ख़त्म होने का हूटर बजा तो स्कोर कार्ड दक्षिण अफ्रीका के पक्ष में चमक रहा था 3-1। हम मैच हार गए थे और ओलंपिक में खेलने का सपना भी कहीं दम तोड़ गया था। यानी भारतीय महिला हॉकी को अब चार साल और इंतज़ार करना पड़ेगा...लेकिन यह चार साल का इंतज़ार बहुत लंबा होने वाला है। इन चार सालों में भारतीय महिलाएं कितना भी ज़ोर लगा लें, कितना भी अच्छा खेल लें ओलंपिक में खेलने का उनका सपना तो कहीं दम तोड़ ही गया है और उनका ही क्यों भारतीय हॉकी के चाहने वालों के सपने भी उस रात मेजर ध्यानचंद स्टेडियम पर कहीं खो-सा गया था। इन सपनों के टूटने की कसक मैदान से बाहर आती खिलाड़ियों के चेहरे पर लिखी इबारत से भी साफ़ पढ़ी जा सकती थी। कइयों की आंखों में आंसू झिलमिला रहे थे। उदास...मायूस...सर झुकाए मैदान से बाहर आती लड़कियों को पता था कि जिन सत्तर मिनट में वे अपने सपने को पूरा कर सकती थीं, उन सत्तर मिनटों में उन्होंने ऐसा कोई कमाल नहीं दिखाया जो उनके सपनों में हक़ीक़त का रंग भरता। उदास और मायूस लड़कियां जब मैदान से बाहर निकल रही थीं तो मुझे फ़िल्म ‘चक दे इंडिया’ बेतरह याद आ रही थी। यह सही है कि फिÞल्मों से हक़ीक़त का दूर-दूर तक का रिश्ता नहीं लेकिन यह भी सच है कि फ़िल्में कभी-कभी हमें बेहतर करने के लिए प्रेरित ज़रूर करती हैं, अगर हम सीखना चाहें तब। इसलिए उस शाम नेशनल स्टेडियम पर शाहरुख ख़ान के संवाद मुझे सुनाई पड़ रहे थे कि यह सत्तर मिनट तो तुम्हारा ख़ुदा भी तुमसे नहीं छीन सकता। लेकिन भारतीय महिलाओं से यह सत्तर मिनट उनके ख़ुदा ने छीन लिया था और उनकी हॉकी को चार साल पीछे ढकेल दिया था।
    ऐसा नहीं था कि दक्षिण अफ्रÞीका की महिलाओं ने बहुत अच्छी हॉकी खेली दरअसल हमने ख़राब हॉकी खेली और दक्षिण अफ्रÞीका को मैच में बेहतर खेलने के मौक़े दिए। हम थोड़ा और बेहतर खेलते तो लंदन ओलंपिक में हम बुलंद इरादों के साथ दुनिया की चोटी की टीमों को टक्कर दे रहे होते। यह सही है कि लीग मुक़ाबले में इसी टीम ने भारत को 5-2 के बड़े अंतर से हराया था। लेकिन फ़ाइनल में भारतीय टीम के बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद हमें थी। अपने अंतिम लीग मुक़ाबले में उसने जिस तरह इटली को फ़तह कर फ़ाइनल में खेलने का हक़ बनाया था, इससे उम्मीदें तो बढ़ी ही थीं, लीग मुक़ाबले में इसी टीम के हाथों मिली हार का बदला लेने का मौक़ा भी हमारे सामने था। इन उम्मीदों और सपनों को साथ लेकर ही लोग स्टेडियम पहुंचे थे।
    तिरंगा लहराते...देश की जीत का नारा लगाते...चेहरे पर तिरंगा बना कर उत्साह से भरे दर्शकों को देखना भी किसी अनुभव से कम नहीं था। दर्शकों की इतनी बड़ी तादाद महिलाओं की हॉकी देखने आएगी, किसने सोचा होगा भला। ख़ास कर तब जब देश में क्रिकेट का बोलबाला हो और माता-पिता अपने बच्चों में सचिन-सहवाग का चेहरा देखते हों। लेकिन ओलंपिक क्वालीफाइंग के फ़ाइनल ने इस भ्रम को तोड़ा। यह बात दीगर है कि हार के साथ ही स्टेडियम में मौजूद दर्शकों का सपना भी टूट गया।
    भारतीय महिलाओं ने थोड़ा लय और चमक दिखाई होती तो लंदन ओलंपिक में उनके दरवाज़े खुले होते। लेकिन फ़ाइनल में अपने से कहीं मज़बूत टीम के ख़िलाफ़ भारतीय टीम बिखरी-सी दिखाई दी। कभी-कभी ही वह लय और रंगत में नज़र आई। नहीं तो ज्Þयादातर वक्Þत तो वह बचाव में ही लगी रही। यह सही है कि दक्षिण अफ्रÞीकी टीम ने चौथे मिनट पर ही अनुभवी खिलाड़ी सोल शेली की गोल की मदद से बढ़त लेकर भारतीय टीम को दबाव में डाल दिया था। सच तो यह है कि भारतीट रक्षापंक्ति ने यह गोल उन्हें तोहफ़े में दे डाला था। दाएं छोर से दक्षिण अफ्रÞीकी खिालड़ी मार्शा मोेर्शिया ने बढ़ाव बनाया। भारत की रक्षा पंक्ति की खिलाड़ी जसप्रीत कौर ने गेंद को बीच में सफ़ाई से रोका तो ज़रूर लेकिन ट्रन के साथ गेंद को लेकर डी से बाहर निकलने की कोशिश में वे सफ़ाई नहीं दिखा सकीं और गेंद शेली को थमा बैठीं। वे गेंद को थाम कर बाएं छोर से डी में दाख़िल हुईं और आगे निकल आई गोलची योगिताबाली को गच्चा देकर गोल का तख़्ता खड़का दिया। इस गोल ने भारतीय टीम की हार की इबारत लिखी। किसी भी फ़ाइनल में इस तरह का गोल मिल जाना किसी भी टीम को लय और रंगत में लाने के लिए काफ़ी होता है। दक्षिण अफ्रÞीका के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसने खेल पर अपनी पकड़ बनाई और ओलंपिक में जगह। हालांकि बीच-बीच में भारतीय महिलाओं ने ज़रूर चमक दिखाने की कोशिश की लेकिन उनके आक्रमण में वह धार नहीं दिखी जो लीग मुकाबÞलों में देखने को मिली थी। दसवें मिनट पर भारत ने पेनल्टी कार्नर को बर्बाद किया और मैच में वापसी की उम्मीदें भी इसके साथ दम तोड़ने लगी थी। हाफ़ टाइम से ठीक पहले दक्षिण अफ्रÞकी टीम को लगातार तीन पेनल्टी कार्नर मिले और तीसरे पेनल्टी कार्नर पर कप्तान मार्शा ने दनदनाता शाट लगा कर गोल बना डाला। यानी इस गोल ने भारतीय वापसी की उम्मीदों को और कम कर दिया था।
    हालांकि दूसरे हाफ़ में भारत ने तेज़ शुरुआत की और उसे गोल के दो बेहतरीन मौक़े मिले लेकिन इन मौक़ों को भारत गोल में बदल नहीं पाया। दोनों ही बार अनुराधा देवी ने मौक़े गंवाए। पहले डी में मिले क्रास पर वह गोल पर निशाना नहीं साध सकीं और फिर जसजीत कौर हांडा ने सर्कल के अंदर उन्हें गेंद बढ़ाई थी। उनके सामने सिर्फ़ गोलची थीं। लेकिन अनुराध गोल नहीं कर पार्इं। इसके बाद तो भारत के लिए कुछ बचा नहीं था। क्योंकि दक्षिण अफ्रÞीकÞा ने इस बीच पेनल्टी कार्नर पर तीसरा गोल भेद कर भारतीट टीम की उम्मीदों को पूरी तरह बंद कर डाला था। लेकिन खेल ख़त्म होने से क़रीब सोलह मिनट पहले भारत ने उम्मीदों के बंद दरवाज़े में थोड़ी सी दरार बनाई और उम्मीद की एक नन्ही सी किरण इन दरारों से छन कर बाहर आई। जसप्रीत कौर ने मिले मैच के दूसरे पेनल्टी कार्नर पर दनदनाता शाट लगाया और दक्षिण अफ्रÞीकी डिफेंस इससे पहले कि कुछ कर पाता, गेंद ने गोल का तख़्ता खड़खड़ा दिया था। इस एक गोल ने भारतीय दर्शकों को उत्साहित किया। तिरंगा फिर से लहराने लगा था और उम्मीद की एक झीनी सी किरण छन-छन कर स्टेडियम पर उतर आ रही थी। लेकिन इस उम्मीद के बीच ही समय तेज़ी से भाग रहा था और मैच हमारे हाथों से फिसलता जा रहा था। समय किसके रोके रुका है भला। दूसरे हाफ़ के ख़त्म होने का हूटर जब बजा तो उम्मीद की वह किरण अंधेरे में दम तोड़ चुकी थी। हम हार कर मैदान से बाहर आ रहे थे। एफआईएच के किसी बड़े टूर्नामेंट के फ़ाइनल में पहुंचने वाली भारतीय महिला टीम ओलंपिक में जाने से चूक गई थी। बत्तीस सालों से ओलंपिक में खेलने का इंतज़ार और बढ़ गया था। अब तक भारतीय महिला हॉकी टीम ने सिर्फ़ एक बार 1980 के मास्को ओलंपिक में हिस्सी लिया है। उस समय भारत को आमंत्रण के जरिए इसमें जगह मिली थी। तब से लेकर अब तक उसे दूसरी बार ओलंपिक में खेलने का इंतज़ार है। इस हार के साथ यह इंतज़ार और बढ़ गया है। 2008 के बेजिंग ओलंपिक के लिए कजान में खेले गए क्वालीफाइंग मुक़ाबलों में हम चौथे स्थान पर रहे थे। इस बार दो पायदान की छलांग हमने लगाई है। लेकिन यह दिल को बहलाने के लिए तो ठीक है, हॉकी के लिए इसे ठीक नहीं कहा जा सकता। कल इटली की टीम को फ़तह कर जब हम बाहर निकले थे तो मेरी आंखें नम थीं, आज फ़ाइनल में हम हार कर बाहर हुए हैं तो आंखों में फिर नमी उतरी हुई है। कल की नमी में जीत की चमक थी, आज की नमी में हार की उदासी और कसक।
    भारतीय महिला टीम फ़ाइनल में पिट कर ओलंपिक में खेलने से चूक गई है। कल भारतीय पुरुषों को खेलना है। चलिए उम्मीद की एक लौ क़ायम है। उस उम्मीद और सपनों के पूरा होने के लिए हम-आप दुआ मांगें...ताकि हॉकी की चमक क़ायम रहे और साख भी।

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