इतिहास और विरासत

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  • फ़ज़ल इमाम मल्लिक

    राजस्थान की धरती प्राकृतिक सौंदर्य और धरोहरों के लिए जितनी मशहूर है, जांबाज सपूतों की बहादुरी के लिए भी जानी जाती है। चित्तौड़गढ़ राजस्थान का ऐसा ही एक शहर है जहां के जर्रे-जर्रे पर बहादुरी और सुंदरता का समागम देखा जा सकता है। चित्तौड़गढ़ की शोहरत ऊंची पहाड़ी पर बने किले को लेकर भी है और यह पर्यटकों के आकर्षण का खास केंद्र भी है। हालांकि इस बात की सही-सही जानकारी नहीं मिलती है कि यह शहर कितना पुराना है और इसे किस ने बसाया, लेकिन ऐसा कहा जाता है कि मौर्य शासकों ने सातवीं सदी में इस किले का निर्माण कराया था। लोगों का यह मानना भी है कि भीम ने अमरत्व के रहस्यों को समझने के लिए इस स्थान का दौरा किया था और एक पंडित को अपना गुरु बनाया, लेकिन समस्त प्रक्रिया पूरी करने से पहले अधीर होकर वह अपना लक्ष्य नहीं पा सका और गुस्से में आकर उसने अपना पांव जोर से जमीन पर मारा जिससे वहां पानी का स्रोत फूट पड़ा, पानी का यह कुंड भीम ताल कहा जाता है। बाद में यह स्थान मौर्य या मूरी राजपूतों के अधीन आ गया। हालांकि इसे लेकर अलग-अलग राय है कि यह मेवाड़ शासकों के अधीन कब आया, लेकिन राजधानी को उदयपुर ले जाने से पहले 1568 तक चित्तौड़गढ़ मेवाड़ की राजधानी रही। धर्मेंद्र कंवर की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘चित्तौड़गढ़: द ब्रेवबर्ट आॅफ राजपूताना’ में इस किले से जुड़ी यादों को फिर से ताजा करने की कोशिश की गई है। धर्मेंद्र कंवर की इस पुस्तक में इस किले से जुड़ी कई नई बातों का पता भी चलता है। इतिहास और यात्रा संस्मरण के क्षेत्र में धर्मेंद्र कंवर एक जाना-पहचाना नाम है। घुमक्कड़ी पर उनकी लिखी किताबें सराही गर्इं हैं और उन्हें अंग्रेजी में बेहतरीन यात्रा संस्मरण लिखने पर पुरस्कार भी मिल चुका है। लंबे समय तक वे राजस्थान अतिथि की संपादक तो रहीं ही, राजमाता गायत्री देवी के भी काफ़ी क़रीब थीं। इसलिए उन्हें राजस्थान की कला-संस्कृति से गहरा जुड़ाव रहा है और वहां की विरासत पर गहरी पकड़ रखती हैं। उनकी इस ताजा पुस्तक ‘चित्तोड़गढ़: द ब्रेवहर्ट आॅफ राजपूताना’ में इसे देखा और समझा जा सकता है।
    धमेंद्र कंवर ने चित्तौड़गढ़ के इतिाहस को क्रमवार लिखा है और बहुत ही सहज और सरल भाषा का इस्तेमाल किया है। भाषा इस पुस्तक की बड़ी खूबी कही जा सकती है। चित्तौड़गढ़ में वीरांगनाओं का भी गढ़ रहा है। रानी पद्मिनी के उल्लेख के साथ लेखिका ने इन वीरांगनाओं का जिक्र बेहतर ढंग से किया है। ‘द लीजेंड आॅफ पद्मिनी’ खंड में लेखिका ने जायसी को बी तरीके से याद किया है और उनकी रचना ‘पद्मावत’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने लिखा है कि अपनी इस कालजयी रचना में उन्होंने रानी की सुंदरता का बखान बखूबी किया है और उनकी खूबसूरती के हर पहलू का एक जिंदा बयान इसे कहा जा सकता है और सच भी है यह। ‘पद्मावत’ की पंक्तियों का उल्लेख पुस्तक को और भी महत्त्वपूर्ण बनाता है। लेखिका ने एक अलग खंड यहां की वीरांगनाओं पर दिया है। ‘द ब्रेव वुमेन चित्तौड़’ में उन्होंने कुछ ऐसी अनाम महिलाओं का जिक्र किया है जिनका जिक्र इतिहास और किताबों में कम ही मिलता है। पन्ना धाई, राणा कुंबला, राणा हमीर और राणा प्रताप से जुड़े इतिहासों से भी वे हमें रूबरू कराती हैं। अंत में उन्होंने हिंदी श्ब्दों के अंग्रेजी में अर्थ देकर विशुद्ध अंग्रेजी पाठकों का भला भी किया है, कुछ प्रचलित हिंदी शब्दों की जानकारी भी उन्हें दी है। पुस्तक को खूबूसरत बनाने में छायाकार अभिजीत सिंह झाला की तस्वीरों का कमाल भी है। लंबे समय से वे इस क्षेत्र में सक्रिय हैं और इस पुस्तक के पन्ने पर उनका कलाकारी को देखा जा सकता है।
    चित्तौड़गढ़: द ब्रेवहर्ट आॅफ राजपूताना (यात्रा संस्मरण): लेखिका: धर्मेंद्र कंवर, छायाचित्र: अङिजीत सिंह झाला, प्रकाशक: नियोगी बुक्स: डी-78, ओखला इंडस्टियल एरिया, फेज-1, नई दिल्ली-110020, मूल्य: 795 रुपए।

    1 टिप्पणी:

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