जीवन के सरोकार

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  • फ़ज़ल इमाम मल्लिक

    रवींद्र प्रभात यों तो साहित्यिकार है लेकिन उससे से कहीं ज्यादा ब्लॉग की दुनिया में जाना-पहचाना नाम है। हिंदी चिट्ठाजगत में रवींद्र प्रभात ने ढेर सारे काम किए हैं। पिछले चार-पांच सालों में जिन कुछ लोगों ने ब्लागिंग की दुनिया में गंभीरता से काम किया है, रवींद्र प्रभात उनमें से एक हैं। यह भी सही है कि वे लंबे समय से साहित्य से जुड़े रहे और विभिन्न विधाओं में उन्होंने रचनाएं कीं, लेकिन उनकी पहचान व्यंग रचनाओं के लिए ही होती रही है। शायद इसकी वजह अख़बारों में उनका नियमित कॉलम भी हो सकता है लेकिन हाल के दिनों में उन्होंने ब्लागिंग को लेकर उन्होंने जो काम किया है, उसने उन्हें एक बड़े और विशाल पाठक वर्ग से जोड़ा। हाल ही में ब्लागिंग पर आई उनकी किताब ने मीडिया के इस नए स्वरूप को एक बड़े वर्ग के सामने रखा और ब्लागिंग की दुनिया को एक विस्तार भी दिया। वे ‘परिकल्पना समूह’ के मॉडरेटर के रूप में भी चर्चित हैं। यह बात दीगर है कि इस बीच उन्होंने अपने कथाकार को भी मांजा और उसे विस्तार दिया। उनके इस कथाकार को उनके नए उपन्यास ‘ताक बचा रहे लोकतंत्र’ में देखा जा सकता है। अपने पहले उपन्यास ‘प्रेम न हाट बिकाय’ में रवींद्र प्रभात ने ज़िंदगी के जिन अनुभवों को सामने रखा था अपने इस नए उपन्यास में उन अनुभवों को विस्तार दिया है। यह बात दीगर है कि दोनों के कथ्य और विषय अलग-अलग हैं लेकिन कंसर्न एक हैं।
    रवींद्र प्रभात ने समाज में जो विभाजन रेखा खिंची है, उसे केंद्र में रख कर अपना उपन्यास रचा है। शोषकों और शोषितों के बीच बरसों से पनपी गहरी खाई आज भी समाज में मौजूद है। जिसके पास सत्ता, शक्ति और ताक़त है वह समाज को अपने तरीक़े से हांकता है और जिनके पास यह सब कुछ नहीं होता वह इनके हाथों शोषण का शिकार होते रहते हैं। आज़ादी के सालों बाद भी देश में हालात में कोई बदलाव नहीं आया है, हां चेहरे ज़रूर बदल गए हैं लेकिन बाक़ी चीज़ें अपनी जगह जस की तस हैं। ‘ताकि बचा रहे लोकतंत्र’ इसी को केंद्र में रख कर लिखा गया है। अपने शिल्प और कथा को लेकर रवींद्र प्रभात ने भले बहुत ज़्यदा प्रयोग नहीं किए हों लेकिन उपन्यास की पठनीयता को उन्होंने बनाए रखा है।
    उपन्यास भले बिहार की पृष्ठभूमि पर लिखा गया हो लेकिन उसमें देश के हर उस इंसान के चेहरा दिखाी देता है जिनके लिए सरकार की योजनाएं तो हैं लेकिन वह योजनाएं उन तक नहीं पहुंच पातीं। बत्तीस या छब्बीस रुपए रोजÞ की कमाई करने के बावजूद वह उस ग़रीबी रेखा से ऊपर उठ नहीं पाया है, सरकार जिसकी परिभाषा अदालतों में देती रही है। झींगना उनमें से ही एक है, जो लोकतंत्र के पहरुआ तो है लेकिन वह लोकतंत्र उससे, उसके जीने का अधिकार भी छीन लेता है। अच्छी बात यह है कि रवींद्र प्रभात ने दलित विमर्श का नारा लगाए बिना उपन्यास रचा है। शायद इसकी वजह यह भी हो सकती है कि रचनाकार को इस तरह के किसी बैसाखी की ज़रूरत नहीं होती। हालांकि आजकल अधिकांश दलित लेखक इसी शार्टकट के सहारे रातोंरात रचनाकार बनने की जुगत में लगे हैं। हालांकि समय-समय पर यह बात भी कही जाती रही है कि दलितों के जीवन की अक्कासी वही कर सकता है जो ख़ुद भी दलित हो। ऐसी बात कहने वालों का तर्क है कि कोई भी गैरदलित आदमीउनके दुख, उनकी पीड़ा, उनकी संवेदनाओं को उस तरह से नहीं समझ सकता है, जितनी कि कोई दलित लेखक। लेकिन रवींद्र प्रभात अपने इस उपन्यास के ज़रिए इस धारणा को तोड़ते हैं। हो सकता है रवींद्र प्रभात का यह उपन्यास उन दलित लेखकों को पसंद न आए जो ‘दलित विमर्श’ के नाम पर अपनी दुकान चला रहे हों लेंकिन उनका यह उपन्यास अपने समय और समाज से मुठभेड़ तो करता ही है।
    ताकि बचा रहे लोकतंत्र (उपन्यास), लेखक - रवींद्र प्रभात, प्रकाशक: हिन्दी युग्म, 1, जिया सराय, हौज खास, नई दिल्ली-110016, मूल्य: 250 रुपए।

    3 टिप्‍पणियां:

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