जन आंदोलनों को सियासी बैसाखियों की ज़रूरत..?

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  • गिरीश बिल्लोरे मुकुल
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  •                                       मित्रो  बीमारी के चलते दिन भर टी.वी. के सहारे समय काट रहा था कि शाम को मेरे एक अन्ना समर्थक मित्र आए.. बोलो कि भाई क्या ज़रूरी था अन्ना- जी के मंच पर इन सबको बुलाना. ? उनके अचानक हुए इस सवाली हमले से मुक्ति पाने मैने पूछा:-"भाई, बुराई क्या है..?
    बस मित्र भड़क गए और जो धारा प्रवाह मुझे कहा उसे मैं हूबहू नीचे चैंप रहा हूं.............. 
     11 दिसंबर 2011 जंतर-मंतर पर अन्ना ने फ़िर भरी हुंकार . 10 दिसम्बर की प्रेस कांफ़्रेंस में पूरे देश ने देखा सारी बातों के अलावा केजरीवाल जी की उस सूची को पढ़ना जिसमें यह कहा गया जा रहा था कि अमुक दल से तमुक जी पधारेंगें  केवल एक संकेत दे रहा था कि "अन्ना-टीम" आमंत्रण की  स्वीकृतियों को अपनी उपलब्धि मान रही है.
    "आगे इधर है भई..........भारत ब्रिगेड पर जी"

    2 टिप्‍पणियां:

    1. इन्ही बैशाखियों से सहारे कुछ बैसाख-नंदन शीर्ष पर पहुँच कर घास चरेंगे ,फिर कहेंगे घास का घोटाला हुआ !एक और आन्दोलन , कुछ समितियाँ ,थोडा हंगामा , फिर तय होगी -घास बचाओ आन्दोलन का प्रारूप और प्रति-प्रारूप ,फिर आएँगी बैशाखियाँ ,क्यों की बैसाख फिर आएगा ......

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