क्या आप फ़ेसबुक व ट्विट्टर पर हैं ?

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  • Kajal Kumar
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  • अजब दुनिया है यह फ़ेसबुक और ट्विट्टर भी. लगता है जैसे खाली बैठे सिर खुजाने वालों के मोहल्ले में आ गए हों.

    इस तरह के प्रोग्राम लिखने वालों को इनकी प्रेरणा ज़रूर आदिमानवों द्वारा बनाए गए भित्ति चित्रों से मिली होगी. उन लोगों ने गुफाओं की दीवारों पर चित्र बनाए और कुछ-कुछ लिख कर चलते बने, पर अक़्लमंद लोग हैं कि उनके लिखे में आज भी मतलब ढूँढ़ रहे हैं. अरे भई छोड़ो न, ये उनके समय के फ़ेसबुक और ट्विट्टर थे. आज हज़ारों साल बाद भी यह परंपरा ज़िंदा है, यक़ीन नहीं तो बाहर कहीं भी किसी भी दीवार पर नज़र घुमाइए, शर्तिया कुछ न कुछ लिखा ज़रूर मिलेगा.

    फ़ेसबुक व ट्विट्टर भी, दीवारों पर यूँ ही कुछ-कुछ लिख कर चलते बने लोगों की ही दुनिया है. यहाँ कुछ लोग हैं कि कुछ कवितामय छोड़ देते हैं तो कुछ जीवन-दर्शन सरीखा कुछ, कई तो चुटकुले लिख जाते हैं. पता ही नहीं चलता कि कौन किसके लिए क्या लिख रहा है. कुछ तरह-तरह की फ़ोटो टाँग जाते हैं.

    सुंदर सी महिलाओं की फ़ोटो वाली लाइनों के नीचे पसंद करने वालों और प्रतिक्रिया देने वालों का तो ताँता ही लगा मिलता है, ज़ाहिर है इन लाइन लगाए लोगों में पुरुष ही ज़्यादा होते हैं.

    ये प्रोग्राम भी जातिवादी परंपरा का पालन करते हैं. यहाँ बड़े लोगों के फ़ैन बनने के न्योते आते हैं तो आम जनता को मित्र बनाने के सूचनाएँ चस्पा की जाती हैं. अब श्रृद्धा आपकी है कि आप क्या करना चाहते हैं.

    कुछ झंडाबरदार लोग भी यहाँ आते हैं, उन्हें इतने से ही सुख नहीं मिलता कि कुछ लिख कर चलते बनें. वे ग्रुप कहे जाने वाले अपने गुट बनाकर यहाँ-वहाँ लोगों को उनमें शामिल करने के संदेश तो दाग़ते ही रहते हैं, जहाँ मौक़ा मिला वहाँ लोगों को, उन्हें बिना बताए ही, इनमें चुपचाप शामिल भी कर लेते हैं. इनका गुज़ारा इतने से ही नहीं होता, इसके बाद आपको ढेरों इमेल भी ठेले जाते हैं कि फ़लाने ने ढिमाके के यहाँ क्या तीर मारा.

    ट्विट्टर तो गूंगों की दुनिया लगती है. कोई आया और कुछ-कुछ लिख कर चलता बना, अगर आपके पास समय है तो पढ़ लो. बहुत हुआ तो आप भी कुछ लिख आओ. ट्विट्टर पढ़ कर ऐसे लगता है कि किसी ने शायद जम्हाई लेते हुए कुछ अनर्गल/ निरापद कह दिया हो. हां, यह बात दीगर है कि कुछ बड़े लोग जो कुछ कभी-कभार यहां लिखते हैं उसका ढिंढोरा मीडिया के दूसरे लोग जम कर पीट मारते हैं.

    पहले-पहल कंप्यूटर में विंडो के साथ सॉलिटायर गेम का उद्देश्य यह बताया गया था कि यह काम करते-करते बोर होने पर मन बहलाने भर के लिए है. आज यही काम फ़ेसबुक और ट्विट्टर कर रहे हैं. ज्यों जेम्स बाँड की फ़िल्म में कोई सामाजिक संदेश नहीं ढूँढ़ा जाता ठीक वैसे ही फ़ेसबुक और ट्विट्टर पर भी कोई अर्थ नहीं ढूँढ़ा जाना चाहिए.

    बहुत से लोगों को, एक समय के बाद यहां ऊब होने लगती है पर कई ठाड़े हैं कि जो आज भी यहां डटे हुए हैं.

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    - काजल कुमार

    13 टिप्‍पणियां:

    1. फेसबुक और ट्विटर को लेकर आपके विचार वास्तव में विचारणीय हैं ,लेकिन मेरे विचार से यह तो अभी-अभी आया अभिव्यक्ति का नया माध्यम है . हर किसी की चाहत होती है कि कोई उसके भी दिल की बात सुने .शायद आधुनिक इंसान की इसी एक चाहत ने रेडियो , टी.वी , कम्प्यूटर और सेलफोन से लेकर आज फेसबुक और ट्विटर जैसे तकनीकी माध्यमों को जन्म दिया है.

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    2. अविनाश जी , हमने तो फेसबुक का विनाश बहुत पहले ही भांप लिया था , इसलिए छोड़ दिया .
      लेकिन आप भी तो फेसबुक पर लगे रहते हो . कब छोड़ रहे हो ?

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    3. मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
      आईआईएम बेंगलुरु की छात्रा मालिनी मुर्मू के आत्महत्या जैसे कदम उठाये जाने से एक बार फिर सोशल-साईट्स में बनाने वाले रिश्तों की गंभीरता पर प्रश्नचिन्ह उठता है,कि बिना-देखे भाले बनाए गए रिश्ते और दोस्ती टिकाउपन के लिहाज से कहीं क्षण-भंगुर तो नहीं...?महज अपनी फ्रेंड-लिस्ट के बड़ा होते जाने को लेकर रोमांटिक होना इस दुनिया का बड़ा शगल है,एक दुसरे के पोस्ट को लाईक करना या उनपर कमेन्ट कर दोस्ती की परिभाषा पूरी नहीं हुआ करती,बल्कि आपसी समझ-और विचारों के आदान-प्रदान द्वारा एक-दुसरे को और-और-और ज्यादा समझते जाना,साथ ही अपनी समझ को विकसित करना भी नेट-दोस्ती की एक महत्वपूर्ण कसौटी बनायी जा सकती है !
      इंटरनेट पल-भर में अपनी वैश्विक पहुँच के कारण आज ना सिर्फ सूचनाओं के त्वरित पहुँच का कारण और माध्यम बन चुका है बल्कि हरेक व्यक्ति के अपने विचारों के प्रकटीकरण का सबसे सशक्त माध्यम भी बन चुका है,मगर दोस्ती और संवेदना के लिहाज से यह अब भी खासा निरुत्साहित करने वाला है.क्यूंकि दोस्ती के लिए जान लड़ा देने वाली परम्परागत वैश्विक सोच के बनिस्पत यह दोस्ती अब गोया एक खेल बन चुकी इस माध्यम में....!!और यही इस माध्यम सबसे क्रूर सत्य है !!एक-दुसरे से कोसों-मीलों दूर बैठे लोग जब एक-दुसरे से दोस्ती गांठने का उपक्रम करते हैं तब उनमें कैसी और कितनी समझ होती है एक-दुसरे के प्रति, यह एक सवालिया निशान है इस नेट जगत के दोस्तों के बीच....और इस तरह के मुद्दों के मद्देनज़र हम सबको अपने भीतर भी टटोलना चाहिए कि हम इस दोस्ती में कहाँ तक ईमानदार है...??
      वरना एक तरफ तो हो सकता है कि आपके विचारों या आपकी बातों से प्रभावित होकर या आकर्षित होकर कोई आपको अपना दोस्त-प्रेमी-प्रेयसी या कुछ भी बना डालता हो,जबकि आप सिर्फ शब्दडाम्बर रच रहे होंओ....महज एक खेल खेल रहें होंओ....या फिर इसका उलटा भी होओ....कि सामने वाला यही कर रहा हो आपके साथ....!!ऐसे में तो इस नयी दोस्ती से किसी भी प्रकार की अपेक्षा करना भी बिलकुल व्यर्थ है और इससे यह सन्देश भी ध्वनित होता है कि इस तरह की सोशल साईट्स में जाकर दोस्त "निर्मित" करने वाले लोग दोस्ती को दोस्ती के अर्थ में ना लें !!(जहां वाकई लोग दोस्त ही हैं,उनकी बात मैं नहीं कर रहा !!)
      और इस करके वो इस तरह की "दोस्तियों" से कुछ भी अपेक्षा ना रखें !!बल्कि किसी भी "नामालूम"आगत के लिए भी खुद को तैयार रखें...क्यूंकि यह बात सदा ध्यान में रखने योग्य है कि जिस जगह आप दोस्ती कर रहे हो,वह सार्वजनिक है (बल्कि सार्वजनिक पैखाना कहूँ तो ज्यादा बेहतर होगा !!)और जहां बहुत सारे लोग टट्टी-पेशाब की तरह भी दोस्ती कर रहें हैं,जिन्हें पहचाना भी नहीं जा सकता......और इसका खुलासा तो तब हो पाता है जब कोई मालिनी मुर्मू फेसबुक पर अपने बॉय-फ्रेंड के खुद के रिश्ते पर सार्वजनिक रूप से कमेन्ट किये जाने पर आत्महत्या जैसा आखिरी कदम उठा लेती है,जिसे मेरे जैसे लोग ह्त्या मानते हैं....मगर इस तरह के बॉय-फ्रेंड जैसे हत्यारे तरह-तरह के तिकड़मी वक्तव्यों से खुद को बचा भी लेते हैं,क्यूंकि वो दरअसल एक ठग हैं!! इसलिए ओ फेसबुकिया दोस्तों सावधान....यहाँ पर हजारों ठग हैं....संभल कर कीजिये दोस्ती....एक शेर तो सूना ही आपलोगों ने....बशीर बद्र का है,कोई हाथ भी ना मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से....ये नए मिजाज का शहर है,ज़रा फासले से मिला करो !!(क्या बशीर जी ने यह सोचा भी होगा कि उनके द्वारा यह लिखे जाने के बाद ऐसी एक वर्चुवल दुनिया पैदा होगी जहां उनका यह शेर बिलकुल सटीक बैठ जाएगा....!!??)

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    4. लीग से हट कर है आपकी यह पोस्ट... बढ़िया प्रस्तुति
      समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागता है
      http://mhare-anubhav.blogspot.com/

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    5. डॉ. दराल जी, मैं तो सब जगह रहते भी, कहीं पर भी नहीं होता हूं। हां, अपने लेखन कर्म में इनको व्‍यवधान नहीं, सहायक मानता हूं क्‍योंकि ब्‍लॉग पर तो पाठक अब कम आते हैं या आते भी हैं तो टिप्‍पणी दिए बिना खिसक जाते हैं लेकिन फेसबुक या ट्विटर की एक खास बात है कि वहां चाहे पढ़ा कुछ न जाए परंतु टिप्‍पणियां और पसंद खूब मिलती हैं और यही मोह वहां पर बांधे रखता है। उनमें से ही कुछ गंभीर पाठक भी मिलते हैं।
      वैसे ऊपर पोस्‍ट में पेश विचार काजल कुमार जी के हैं। जिनसे सभी थोड़ा बहुत इत्‍तेफाक तो रखते ही हैं, मैं भी रखता हूं। वैसे भी समाज में चारों तरफ बुराईयां और अच्‍छाईयां भरी हुई हैं, इनमें से अच्‍छाईयों को आत्‍मसात करना और बुराईयों की तरफ, न तो खुद ध्‍यान देना और न दूसरों का ध्‍यान आने देने की जिम्‍मेदारी भी हमारी है और काजल कमार जी इस जिम्‍मेदारी को बखूबी निबाहते रहते हैं।

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    6. फेसबुक और ट्विटर भी समाज का ही आइना हैं। आपकी पोस्ट रुचिकर है।

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    7. काजल कुमार जी की बातों से तो हम भी १००% सहमत हैं . अविनाश जी , आपका नाम पढ़कर लगा जैसे आपने ही पोस्ट लिखी है .
      खैर हमें तो फेसबुक से ज्यादा वाहियात और कुछ नहीं लगता जहाँ आज की युवा पीढ़ी अपना कर्म धर्म भूलकर आधुनिक संचार व्यवस्था का मिसयूज करते हुए खुद को डिसयूज कर रही है .
      ब्लॉग पर नियमित और एक निश्चित अंतराल के बाद लिखते रहिये , पाठक और टिप्पणियां मिलती रहेंगी .

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    8. हम भी फेसबुक और ट्वीटर का प्रयोग केवल ब्लॉग की पोस्ट की जानकारी देने के लिए करते हैं।
      यह पोस्ट पढ़कर और डा0 दराल साहब का कमेंट पढ़कर लगा कि ठीक ही करते हैं।

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    9. अजी कवितामय और जीवन दर्शन लिखने वालों की छोड़िए, आजकल लोग अपनी रसोई में बने पकवानों के चित्र,अपने बगीचे में लगी सब्जियों के चित्र भी लगा जाते हैं. चुटकुले तो ठीक थे, आजकल खरीदारी करने जाने से पहले जाने कि खबर भी "न्यूज़ फीड" पर होती है. पर जैसे कीचड़ में कमल, वैसे ही कुछ अच्छाइयाँ भी हैं यहाँ. मसलन किसी भी अच्छे विषय पर लोगों में जागरूकता लाना, कोई नई काम कि जानकारी आदि.

      आपके लिखने का अंदाज़ बहुत अच्छा है, हलके फुल्के ढंग से भरी भरकम बातें कहना सहज नहीं :)

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    10. बिलकुल सही आईना दिखाया है आपने.

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    आपके आने के लिए धन्यवाद
    लिखें सदा बेबाकी से है फरियाद

     
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