क्या आज ही महिला दिवस है ?

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    आप कहते हैं तो मान लेते हैं कि आज ८ मार्च है और यह दिन हम महिलाओं के नाम समर्पित है पर लगता तो नहीं कि महिलाओं का भी कोई दिवस होता है| वही हर रोज जैसी सुबह है, दिन भी कमोवेश वैसा ही बीत जाएगा और रात उसे तो बीतना ही होता है | आज मेरी सेविका ने पूछा कि दीदी आज क्या त्यौहार है? बेटी कह रही है कि माँ आज तो अखबार में लिखा है कि महिला दिवस है | क्या आज मेरा मर्द मुझे दारू पीकर नहीं पीटेगा और क्या आज मुझे काम से भी छुट्टी मिलेगी| कम से कम एक दिन तो हमें भी आराम का मिलना ही चाहिए| हमारा भी तो मन होता है कि बरस दो बरस में कभी अपने मन का करें | क्यों क्या तुम रोज दूसरे की मर्जी से जीती हो |अब उसका मुँह खुल ही गया- अरे जब से माँ की कोख में आए हैं तब ही से हमें खतम करने की पूरी की पूरी साजिश रची गई पर शायद तब मोड़ा मोडी की जांच के साधन नहीं होते होंगे तभी तो मैं इस संसार में आ गई| पली, बड़ी पर सब कुछ चुपचाप होता रहा न मन में कोई उल्लास था और न कोई उमंग| अभी दस साल की भी नहीं हुई कि अम्मा को मेरे ब्याह की चिंता लग गई| हमेशा यही सुनाती रही तू तो पराये घर की अमानत है| जितनी जल्दी अपने घर पहुँच जाए तो हम गंगा नहाले |बापू को भी हमेशा यही कहते सुना तेरे हाथ पीले कर दू तो चिंता दूर हो जाए| मै तो जब से जन्मी माँ बाप के लिए चिंता ही बनी रही| ये १४ सालके होंगे और मैं १२ बरस की तब मुझे घर से विदा कर दिया गया| ससुराल पहुँच कर सोचा अब तो अपने घर आगई | पर भेद तो बाद में खुला कि ये घर भी मेरा नहीं था यहाँ भी सास कहती रही अरे पराये घर से आई है | चार पांच बालक हो गए मर्द की कमाई से घरखर्च पूरा नहीं होता तो खुद भी काम ढूढ़ लिया पर अभी तक कुछ भी नहीं बदला | अब लडके कहते है कि लडकियों को पढाने लिखाने की क्या जरूरत है जल्दी जल्दी लड़का देख कर ब्याह दें अपने घर जाए क्या जरूरत है पढाने लिखाने की बस चूल्हा चौका का काम सिखा दे | अभी तक तो मैं अपने कारण ही परेशान थी पर अब बेटियों का दुःख खाए जाता है | सभी मर्द एक जैसे ही होते हैं कौन सा लड़ाका देखू सबको इक ही बात सिखाई गई है कि औरत तो पैर की जूती है बस दान्त्मार कर काबू में रखो हाथ से निकल नी नहीं चाहिए ज्यादा खिलाने पिलाने की कोई जरूरत नहीं मोटी होगी तो ब्याह में परेशानी | दीदी अब आप ही बताओ कि मैं किस दिन को महिला का दिन समझू ये आप बड़े लोगों के चोंचले होते होंगे हमारे लिए तो जैसी ८मार्च वैसे ही और दिन |
    मैं समझ नहीं पा रही कि कि मैं उसे क्या जबाब दूं | किन प्रगतियों को गिनाऊ और कौन से झूठे आश्वासन दूं बस इतना ही कह पाई देख जब तेरी बिटिया पढ़ लिख लेगी तब तुझे इन बातों के अर्थ समझ आयेंगे| किताबोंमें सब लिखा होता हैकि क्या सच है और क्या झूठ | उसको तो मैंने विदा कर दिया |\,पर मैं अपने मन को ही नहीं समझा पारही कि क्या वाकई महिला दिवस पर हम कुछ विशेष हो जाते हैं |यदि शिक्षा ही हमारे अंदर बदलाब लापाती तो आज भी आम औरत को घरेलू हिंसा का शिकार क्यों होना पढ़ता? क्यों लग्भ्स्ग रोज ही मासूम बच्चियां बलात्कार की शिकार होती और न ही यह समाज अपनी आधी आबादी के साथ इतना अमानवीय हो पाटा / प्रश्नोंके उत्तर तो मेरे भी पास नहीं हैं पर मैं इन प्रश्नों से स्वयं को बहुत ही घिरा महसूस कर रही हूँ ? हो सकता है आप मेरी कुछ सहायता कर सकें मेरे इन सवालों का यह अर्थ कतई नहीं है कि हम महिला दिवस पर खुश न हो और नकारात्मक सोंचें पर हम यह विचार अवश्य करें कि आखिर यह आधा अधूरा ज्ञान हमें कहाँ ले जारहा है?
    Posted by beena at 10:04 AM 0 comments Links to this p

    3 टिप्‍पणियां:

    1. महिला दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
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      केशर-क्यारी को सदा, स्नेह सुधा से सींच।
      पुरुष न होता उच्च है, नारि न होती नीच।।
      नारि न होती नीच, पुरुष की खान यही है।
      है विडम्बना फिर भी इसका मान नहीं है।।
      कह ‘मयंक’ असहाय, नारि अबला-दुखियारी।
      बिना स्नेह के सूख रही यह केशर-क्यारी।।

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    2. महिला दिवस की हार्दिक बधाई .
      आपका प्रश्न सही है मगर वक्त के साथ बदलाव आ रहे है बेशक रफ़्तार धीमी है और हम ही उन लोगो को प्रेरित कर सकते है बदलने के लिये ……………हाँ ये सवाल हमे भी कचोटते है मगर सभी ऐसा ही सोचकर रुकने लगे तो कभी आगे बढ ही नही सकेंगे………पहला बदलाव अपने घर से ही शुरु होता है उसके बाद समाज मे भी फ़ैलता है…………निराश होने की जगह हम सभी को आशा का दामन पकडना होगा तभी ये सपना भी साकार हो जायेगा इक दिन्।

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