मक्खनवादी हैं हम भारतीय

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  • सुनील वाणी
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    हम भारतीय कई सारी खूबियों से लैस हैं। दुनिया के कोने-कोने में हम छाए हुए हैं। इसका एक सबसे बडा कारण हम दूसरों को मक्खन(मस्का या चाटुकारिता) लगाने में माहिर हैं। कभी बातों से मक्खन लगाकर, कभी जी हजूरी करके, कभी हां में हां मिलकार तो कभी जूते तक साफ करके हम अपने मक्खनवादिता होने का परिचय देते रहते हैं। कभी भी इस तरह के अवसर को हम चूकने नहीं देते। आगे बढने के लिए इसका बखूबी इस्तेमाल किया जाता है। यह हर क्षेत्र में मान्य है। सरकारी से लेकर निजी संस्थानों तक। किसी को अपनी तरक्की चाहिए तो इसके लिए मक्खन लगाना पडता है, तो किसी को वेतन बढोतरी के लिए मक्खन लगाना पडता है, कोई कामचोरी के लिए मक्खन लगाता है, तो कोई अपना काम निकालने के लिए मक्खन लगाता है। और कोई योग्यता हो न हो पर आगे बढने के लिए इस मक्खनवादी योग्यता का होना जरूरी है। वरना आप सबकी नजर में खटकते रहेंगे। हालांकि इस मामले में हम भारतीय स्वतः सर्वगुण संपन्न हैं। बिना प्रशिक्षण के ही हम इसमें प्रशिक्षित हो जाते हैं। दफ्तरों में यह तो सामान्य बात है, जो जितना मक्खन लगाता है, उसके चेहरे पे मुस्कान सदैव देखा जा सकता है, और आपमें यह कला नहीं है तो आपके चेहरे में हमेशा तनाव बना रहेगा। अब देखिए न मायावती का जूता साफ करके उसने अपने मक्खनवादी होने का परिचय दिया और अपने से जूनियर को यह संदेश भी दे दिया कि किस तरह से अपने से सीनियर को मक्खन लगाया जाता है। इसी तरह संसद सुचारु रूप से चलाने के लिए सरकार लगातार विपक्ष को मक्खन लगा रही है। हालांकि पुराने जमाने में ठाकुर के पैरों के नीचे बैठ के कइयों को मक्खन लगाते फिल्मों में देखा है लेकिन अब साक्षात अब पत्रढे-लिखे गंवार को मक्खनवादिता को परिभाषित करते देखा जा सकता है।

    4 टिप्‍पणियां:

    1. मैं आपकी बात से सहमत नहीं हूँ। न तो हर व्यक्ति मक्खनवादी होता है न हर जगह मक्खनवाद चलता है। चापलूस आदमी हमेशा सफल नहीं होता। ऐसे अनेक लोग मिलेंगे जो स्वाभिमानी होते हुए भी अत्यंत सफल हैं।
      आपका ये लेख बहुत सतही सा लगा। शायद आप व्यंग्य लिखना चाहते थे पर व्यंग्य के तत्वों की कमी है और ये एक गंभीर लेख सा लग रहा है पढ़ने में।

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    2. मक्खन लगाने की कला अपने आप में निराली है | हाँ यह बात और है कि यह कला सबको नहीं आती या यूं कहें कि सबको नहीं भाती | स्वाभिमान सर्वोपरि है , स्वाभिमानी और ईमानदार व्यक्ति कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं कर पाता | यह बात और है कि ऐसे लोग लुप्तप्राय हो रहे जीवों की तरह गिनती के ही रह गए हैं | मक्खनबाजी करने वालों की संख्या बहुत है |

      आपका लेख मक्खन बाजों के तीन -तिकडमों की कथा ढंग से बयां कर रहा है |

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    3. नहीं पुरा देश चापलूस नहीं है हा ये व्यक्ति विशेस पर निर्भर है कुछ चापलूसी करके आगे बढ़ जाते है कुछ काम करके कुछ अपनी पहुँच से तो कुछ तिकड़म लगा कर | कुछ चापलूसी भी एक हद तक करते है कुछ उसमे भी बिल्कुल गिर कर तलुए ही चाटने लगते है |

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    4. जन-गणना शुरू हो गयी है. इसमें मक्खनबाजों की भी गिनती होनी चाहिए, ताकि उनकी सही-सही आबादी मालूम हो सके. वैसे आपके इस आलेख को पढ़ कर कुछ-कुछ अंदाज तो लगाया जा सकता है.देश में मक्खन की कीमत भी अगर आसमान छू रही है, तो शायद इसका एक कारण मक्खनबाजों की बढती जनसंख्या है,लेकिन जिनके पास मक्खन खरीदने को रूपए नहीं हैं, वो क्या करें ? तेल भी तो काफी महंगा हो गया है !

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