युद्ध की हिंसा और प्रेमकथाएं : अजित राय गोवा से

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  • अविनाश वाचस्पति
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  • पणजी, गोवा, 2 दिसम्‍बर
    भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह के प्रतियोगिता खंड में दिखाई गई पौलेंड के सुप्रसिद्ध फिल्‍मकार जान किदावा ब्‍लोंस्‍की की नई फिल्‍म ‘लिटल रोज’ एक दिलचस्‍प प्रेम कथा का त्रिकोण है। जिसमें इतिहास की कुछ कटु स्‍मृतियां शामिल हैं। इजरायल ने 1968 में जब फिलिस्‍तीन पर हमला किया था तो पौलेंड के कम्‍युनिस्‍ट शासकों ने इस अवसर का इस्‍तेमाल यहूदी और कई दूसरी राष्‍ट्रीयताओं वाले नागरिकों को देशनिकाला देने में किया था। उसी दौरान 1968 के मार्च महीने में पौलेंड की राजधानी वारसा में अभिव्‍यक्ति की आजादी को लेकर लेखकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और विश्‍वविद्यालयों के छात्रों ने एक बड़ा आंदोलन किया था जिसे सरकार ने बेरहमी से कुचल दिया। इसी पृष्‍ठभूमि में कम्‍युनिस्‍ट सुरक्षा सेवा का एक सीक्रेट एजेंट रोमन अपनी प्रेमिका कैमिला को एक सत्‍ता विरोधी लेखक एडम के पीछे लगा देता है। जिस पर शक है कि वह यहूदी है।
    एडम एक प्रतिष्ठित लेखक है और लगातार शासन की तानाशाही के खिलाफ आंदोलन का समर्थन करता है। कैमिला उसकी जासूसी करते हुये अंतत: उसके प्रेम में पड़ जाती है क्‍योंकि उसे लगता है कि एडम का पक्ष मनुष्‍यता का पक्ष है। इसके विपरीत उसका प्रेमी रोमन सिर्फ सरकार की एक नौकरी कर रहा है और सरकारी हिंसा और दमन को सही ठहराने पर तुला हुआ है। जब पहली बार कैमिला को इस रहस्‍य का पता चलता है तो उसे सहसा विश्‍वास ही नहीं होता कि सरकारी दमन और हिंसा में शामिल खुफिया पुलिस का एक दुर्दांत अधिकारी किसी स्‍त्री से प्रेम कैसे कर सकता है। वह यह भी पाती है कि प्रोफेसर एडम के ज्ञान और पक्षधरता का आकर्षण उसे एक नये तरह के प्रेम में डुबो देता है। अपने पहले प्रे‍मी के साथ उसे हमेशा लगता रहता है कि वह रखैल बनकर केवल इस्‍तेमाल होने की चीज है। उसकी न तो कोई पहचान है और न अस्तित्‍व। वह बिस्‍तर में अपने प्रेमी को सुख देने की वस्‍तु बनकर रह गई है। एडम से मिलने के बाद उसे जिंदगी में पहली बार अपने होने का अहसास होता है।
    ‘लिटल रोज’ के लिए जान किदावा ब्‍लोंस्‍की को मास्‍को अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में 32वें मास्‍को अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में सर्वश्रेष्‍ठ निर्देशक का पुरस्‍कार मिल चुका है। यह फिल्‍म एक प्रेम कथा के माध्‍यम से 1968 के पोलैंड की नस्‍लवादी राजनीति का वृतांत प्रस्‍तुत करती है। फिल्‍म के अंत में पर्दे पर वारसा रेलवे स्‍टेशन से आस्ट्रिया की राजधानी विएना जाने वाली एक ट्रेन छूट रही है। जिसमें देशनिकाला पाये हजारों लोग भेजे जा रहे हैं। पर्दे पर हम पढ़ते हैं कि कितनी संख्‍या में किस तरह के लोगों को पोलैंड से जबर्दस्‍ती निकाल बाहर किया गया था। कम्‍युनिस्‍ट सरकार को लगता था कि इन लोगों के रहते हुए पोलैंड में समाजवाद सुरक्षित नहीं रह सकता।
    गोवा फिल्‍मोत्‍सव में दर्शकों के लिए सबसे अधिक आकर्षण का केन्‍द्र कॉन क्‍लाइडोस्कोप 2010 खंड के अंतर्गत दिखाई जाने वाली वे 10 फिल्‍में थीं, जिन्‍हें प्रतिष्ठित कॉन फिल्‍म समारोह (मई 2010) से चुना गया था। इसमें क्रिस्‍तोफ होचास्‍लर की जर्मन फिल्‍म ‘द सिटी बिलो’ और ब्रिटिश फिल्‍मकार केन लोच की अंग्रेजी फिल्‍म ‘रूट आयरिश’ का विशेष रूप से उल्‍लेख किया जाना चाहिए।
    क्रिस्‍तोफ होचास्‍लर की फिल्‍म ‘द सिटी बिलो’ नये जमाने में कॉरपोरेट युद्ध को अलग तरीके से प्रस्‍तुत करती है। जर्मनी के फ्रेंकफुर्त शहर के एक टावर की अंतिम मंजिल पर बने रेस्‍त्रां में चार बिजनेसमैन एक पूरी कंपनी पर कब्‍जा करने की रणनीति बनाते हैं। उनमें से एक 50 वर्षीय रोलैंड अपने एक अधिकारी को साजिश करके इंडोनेशिया के खतरनाक इलाकों में भेज देता है ताकि वह उसकी पत्‍नी के साथ अपने सैक्‍स संबंधों को जारी रख सके। एक सुंदर और महत्‍वाकांक्षी स्‍त्री श्‍वेंजा शुरू-शुरू में तो उसके प्रेम जाल में अपने पति के साथ विश्‍वासघात करती है लेकिन बाद में वह सारा खेल पलट देती है।

    केन लोच की ‘रूट आयरिश’ दो अभिन्‍न दोस्‍तों के माध्‍यम से इराक युद्ध में ब्रिटेन के निजी सुरक्षा एजेंसियों और सीक्रेट एजेंसियों के हिंसक कारोबार की परतें उधेड़ती है। फर्गस अपने दोस्‍त फ्रेंकी को बगदाद में चल रहे युद्ध के एक प्रॉजेक्‍ट में भेजता है जहां फ्रेंकी मारा जाता है। दस हजार पाउंड प्रतिमाह टैक्‍स फ्री वेतन का लालच अंतत: उसे महंगा पड़ता है। फर्गस को लगता है कि फ्रेंकी की हत्‍या की गई है। इसके बाद की पूरी फिल्‍म एक थ्रिलर की तरह इस हत्‍या के पीछे छिपे सच को जानने का अवसर देती है। यह हत्‍या खुद सीक्रेट सर्विस के लोगों ने इसलिए की थी क्‍योंकि उन्‍होंने बगदाद में एक निर्दोष परिवार को मार डाला था। फ्रेंकी उनके खिलाफ सैनिक अदालत में मुकदमा कर सकता था और उन्‍हें उस इराकी परिवार को भारी मुआवजा देना पड़ता। इस कहानी के साथ लंदन और बगदाद के बीच घटित होने वाली कई दूसरी कहानियां भी चलती हैं।
    गोवा फिल्‍मोत्‍सव में हमेशा की तरह ईरान की फिल्मों ने जबर्दस्‍त वाहवाही लूटी। इस बार कंट्री फोकस में ईरान की 9 नई फिल्‍में प्रदर्शित की गईं। बिना सैक्‍स और हिंसा वाली इन फिल्‍मों में मानवीय करूणा और संघर्ष की कहानियों को जिस कुशलता से कहा गया है। वह दर्शकों के दिल के भीतर तक असर करता है। 

    1 टिप्पणी:

    1. सादर प्रणाम !
      फिल्मोत्सव कि पूर्ण जानकारी के लिए साधुवाद . अच्छी लगी रिपोर्ट .
      सादर !

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