हम अपने अपने टापू में कैद क्यों है ?

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  • हम सभी सामाजिक प्राणी है और हमें समाज के सहयोग की आवश्यकता हर पल पडती है |हमारा सबसे पहला साबका अपने पडौसी से ही पडता है|हमारे सुख-दुःख का सबसे पहला गवाह पडौसी ही हुआ करता है | हमने तो यह भी देखा है पडौसी हमारी रोजमर्रा की समस्याओं में सह भागी होता है पर अब शायद ऐसे पडौसी नहीं हुआ करते |हम वह् होते हैजैसा हमारा अडोस-पडौस,आमने -सामने होता है |शादीब्याह के सन्दर्भ में तो आपके -पडौसी ही आपसे संबंधी सूचनाओं के आधार हुआ करते है| कल हमारे पडौस में अम्माजी की मृत्यु हो गई |वह लंबे समय से बीमार थी | शाम ६ बजे उनकी मृत्यु हुई और लगभग ५० मिनिट बाद उस सूचना की सबसे पहली हकदार मैं ही बनी ,वह भी किसी तीसरे माध्यम से | खैर मैंने अपनी कालौनी के अन्य लोगों कों सूचित किया |
    मैं समझ नहीं पा रही आखिर हम इतने औपचारिक कब से हो गए कि मृत्यु जैसे दुखद अवसर पर भी हम यह प्रतीक्षा करने लगें कि जब शव यात्रा निकलेगी तब हम भी उस भीड़ का हिस्सा बन जायेंगे| कहाँ बची है हमारी संवेदना ,क्या अब इन बड़ी कोठियों के लोगो के बीच मोहल्ले जैसा भाईचारा जैसा कुछ नहीं होता | कहा वह समय था ,जब किसी के घर ऐसे अवसरों पर सब कुछ पडौसी ही संभाल लेते थे| जब तक रिश्तेदार आते ,तब तक तो सब हाथोहाथ ले लिया जाता| और अब एक समय ऐसा आगया जब सब कुछ ऑफिस नुमा हो गया | जहां रोने केस्वर सुनाई देने चाहिए थे वहाँ यह देखा जाने लगा कि हम अपने घर कों पहले व्यवस्थित कर लें |मुझे लगने लगा कि अब हम पदौसियोंके मध्य नहीं रहते बल्कि मशी नुमा जीवो के मध्य रहते हैं| हमारे अपने इगो इतने बढ़ गए कि हम स्वयं कों अपने में पूर्ण मानने लगे | हमें किसी से कोई लेना-देना नहीं |हमारे पास इतना पैसा जो आगया है कि अब सब कुछ उससे खरीदा सकता है | जी हाँ रिश्ते भी | और क्या आपने देखा नहीं शादी-विवाहों में गीत गाने के लिए मंडली बुलाई जाने लगी है सब कुछ पेशे जैसा हो गया |लोग आते है आपको खाना परसते है, खईदी हुई मुस्कान से आपका स्वागत करते है |
    और जो मेजबान है वह हाथ जोड़े दरवाजे पर केवल आपको अटेंड करते है| सब तो इतनी तेजी से बदल रहा है| शायद मेरे मन के किसी कोने में अब भी वह गंवईपन बाकी रह गया है जो जब चाहे अपना सर उठा लेता है और मुझे सोचने पर मजबूर कर देता है कि हम आखिर अपने -अपने टापुओ की हद कों तोड़ क्यों नहीं देते |हम अपनी संवेदनाओं का विस्तार क्यों नहीं कर लेते | और कम से कम दुःख के अवसरों पर तो आपसी वैमनस्य कों भुला क्यों नहीं देते ?हम पहले जैसे पडौसी क्यों नहीं बन जाते जब किसी के घर आहात भी होती तो पूरा मोहल्ला एक हो जाता | तब मोहल्ले की बहन बेटी सबकी बहन बेटी होती थी| एक कादुख सबका दुःख होता था |सब के सुख -दुःख में सब शरीक होते |पर शायद अब हमने अपने घर तो बड़ा बना लिया है पर दिल संकुचित हो गए है|

    3 टिप्‍पणियां:

    1. याद है, सपरिवार गाँव आता था तो मुहल्ले भर के लोगों से घिर जाता था। प्रणाम-पाती और आशीर्वाद का दौर। संक्षिप्त किंतु आत्मीय प्रेमालाप। काकी-दादी-दीदी सब नाक-मुँह निहारते। कहते कितना बदल गया है बिटवा। बिटिया तो पहचान में ही नहीं आती है। हम सकुचाते शर्माते कि पापा जहाँ नौकरी करते हैं वहाँ तो कोई इस तरह नहीं घेरता, नहीं पूछता। आज आपके ब्लॉग को पढ़कर लगा कि यह सवाल सिर्फ मेरे जेहन में नहीं बसी है। टापू समंदर के हर तलछट में है जो अगर डूब गया तो कोई पूछनहार नहीं। साधुवाद! आपको।
      राजीव रंजन प्रसाद, बीएचयू, वाराणसी
      www.issbaar.blogspot.com

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    2. बिलकुल सही विचार व्यक्त किये हैं आपने ! अब लोगों में पहले सी आत्मीयता और अंतरंगता बाकी नहीं रह गयी है ! सबने अपनी अपनी निजी दुनिया बना ली है जिसके आगे 'प्रवेश निषिद्ध' का बोर्ड लटका रहता है ! यह व्यवहार तो परस्पर होता है ! आपके मन में पड़ोसी के लिये चाहे जितना प्रेम और फ़िक्र हो लेकिन यदि वह आपसे दूरी बनाए रखना चाहता है तो आप अपनी मानवीय संवेदनाओं के लिये बैठे ही रह जायेंगे ! कुछ कर नहीं पायेंगे ! बहुत ही विचारपूर्ण और सारगर्भित पोस्ट ! मेरी बधाई स्वीकार करें !

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