चिमनी पर टंगा चांद की कविताएं नहीं हैं चीनियों के चेहरे जैसी : नामवर सिंह

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  • अविनाश वाचस्पति
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  • चिमनी पर टंगा चाँद (कवि-सुरेश यादव) काव्यकृति का लोकार्पण 


    नई दिल्ली, त्रिवेणी सभागार, दिनांक 6 अगस्त 2010 : शाम छह बजे हिंदी के सुपरिचित कवि सुरेश यादव के तीसरे काव्य संकलन 'चिमनी पर टंगा चाँद' का विमोचन वरिष्ठ आलोचक डॉ. नामवर सिंह एवं वरिष्ठ कवि व पूर्व सांसद उदयप्रताप सिंह के कर-कमलों द्वारा किया गया। इस अवसर पर खचाखच भरे त्रिवेणी सभागार को सम्बोधित करते हुए डॉ. नामवर सिंह ने इस समय की पूरी कविता पर विहंगम दृष्टि डालते हुए कहा कि चीनियों के चेहरों की तरह आज के सभी कवियों की कविता एक-सी लगती है। ऐसे में सुरेश यादव की कविता अपनी स्पष्ट पहचान लेकर सामने आई है जो कि बहुत बड़ी बात है। इस संकलन का पूरे हिंदी समाज को स्वागत करना चाहिए। इस अवसर पर श्री उदयप्रताप सिंह ने विमोचित कविता संग्रह की कविताओं को जीवन-संघर्ष के विभिन्न आयामों को समेटने वाली और अपने समय के सवालों से जूझने वाली कविताएं बताते हुए इसे एक अत्यन्त पठनीय कृति कहा। प्रसिद्ध ग़ज़लकार-व्यंग्यकार डॉ. शेरजंग गर्ग ने इस पुस्तक को ईमानदारी से रची हुई जीवन-संघर्ष में पगी ऐसी कविताओं का दस्तावेज बताया जो अपने समय के सवालों को समेटते हुए समय के पार जाने वाली कविताओं से भरा पड़ा है। उनका यह भी कहना था कि जीवन में ईमानदारी के बिना ऐसी कविताओं का सृजन असंभव है। डॉ. शेरजंग गर्ग ने आज के ही दिन छह अगस्त को जापान के नागासाकी पर गिरे पहले विनाशकारी परमाणु बम की त्रासदी को रेखांकित किया तो इस बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ. गंगाप्रसाद विमल ने सुरेश यादव के इसी संकलन की 'बम लगता है' की पंक्तियों - '
    ' लगता है कभी-कभी/ रिश्तों में अब बारूद भर गया है/ न जाने किस भेष में कोई/ खुली माचिस धर गया है...  आकाश जितना भरोसा भी/कभी-कभी मुट्ठी भर से कम लगता है/ ... अपनी थाली के/ अपने निवाले में/ कभी-कभी बम लगता है...'' 
    को विशेष रूप में उद्धृत करते हुए इस संग्रह की कविताओं को मिटती हुई नैसर्गिक सृजनात्मकता के पक्ष में एक आवाज़ बताया। वरिष्ठ कवि-ग़ज़लकार लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने कहा कि संकलन की कविताएं विषय-वैविध्य लिए हुए हैं और अपनी काव्य सम्वेदना में नारी विषयक बिन्दुओं को बहुत सूक्ष्मता से स्पर्श करती हैं। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने संग्रह की 'देह की दीवार' की- '
    दीवार है देह बस/समूची स्त्री तो/उसी के पास है' 
    तथा अन्य अनेक कविताओं का उदाहरण दिया। वरिष्ठ पूर्व प्रशासक डॉ. भूरे लाल ने कविता के सामाजिक सरोकारों को विस्तार से उठाया और इस संग्रह को आम जीवन से जुड़े सवालों की पैरवी करने वाली सहज-सरल कविताओं का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बताया। वरिष्ठ कवि एवं गीतकार डॉ. राजेन्द्र गौतम इस संग्रह के शीर्षक को बेहद प्रभावकारी बताते हुए कहा कि 'चिमनी पर टंगा चाँद' में 'टंगा' शब्द बहुत गहरे अर्थों को लिए हुए है और इस संग्रह के नाम का सार्थक करता है। उन्होंने अपने समय की सारी चिंताओं को कविताओं में समेटने की सकारात्मक कोशिश बताते हुए कवि सुरेश यादव की सम्वेदना को एक ऐसे निरंतर सक्रिय कैमरे जैसा बताया जो बहुत बारीकी से वहाँ पहुँच जाता है, जहाँ सत्य और मानवता आहत होती है। लोक साहित्य के अन्वेषी डॉ. हरीसिंह पाल ने जोर देकर कहा कि छंदमुक्त कविता जिन्हें कतई अच्छी नहीं लगती है, वे भी इस संग्रह को यदि पढ़ेंगे तो पूरा संकलन पढ़कर ही मानेंगे, ऐसा इन कविताओं की सहजता, सरलता और इनमें व्याप्त लय के कारण है। चिंता इन कविताओं का सबसे प्रिय और सर्वग्राही विषय है। प्रसिद्ध ग़ज़लकार उपेन्द्र कुमार ने स्पष्ट किया कि शायद ही कोई अन्य काव्य संकलन ऐसा हो जिसमें इतनी अधिक उत्कृष्ट और पठनीय कविताएँ संग्रहित हों। बिम्ब और उपमाएँ इतनी अनूठी और इतनी अधिक हैं कि यदि उदाहरण देने लगें तो सारी कविताएं समाहित हो जाएंगी। आदिकाल से उठाये जा रहे सवालों को ये कविताएं अलग तरह से उठाती हैं और सवालों से कहीं अधिक जवाब बनकर समाप्त होती हैं। प्रतिष्ठित कवि-कथाकार सुभाष नीरव ने कहा कि आज जब साहित्य, विशेषकर कविता को हाशिये पर फेंक देने की साजिश चल रही हो, ऐसे में सुरेश यादव की अच्छी कविताओं को पढ़ना, सुनना और उन पर बात करना सुखद लगता है। 'गरीब का हुनर' – 
    जिस आग से गरीब/अपना घर बचाता है/उसी आग से वह रोटी भी पकाता है...
    का विशेष उल्लेख करते हुए उन्होंने सुरेश यादव को सृजन-धर्म को निभाने वाला कवि बताया। जाने-माने ग़जलकार-कथाकार अशोक वर्मा ने इन कविताओं को गाँव से शहर तक की ऐसी यात्रा बताया जहां विचारों और अनुभवों को बहुत बारीकी के साथ गहन सम्वेदनाओं में ढाला गया है। एक खुमार की तरह इन कविताओं के असर को स्वीकार करते हुए अशोक वर्मा ने लगभग हर कविता को अन्याय के विरुद्ध खड़ा हुआ बताया। वीर रस के कवि-गजलकार जयसिंह आर्य ने कविताओं की रोचकता को प्रधान विशेषता के रूप में इंगित करते हुए दिल की गहराइयों तक पहुँचने वाली कविताएं बताया और यह कहा कि कविताएं अपना अमिट प्रभाव छोड़ती हैं। सशक्‍त रचनाकार और कार्यक्रम का संचालनकर्ता डॉ. जगदीश व्‍योम ने कहा कि कविता संकलन की कविताएं अंतराष्‍ट्रीय स्‍तर पर व्‍यापक प्रचार की हकदार हैं। इन कविताओं को तो आवश्‍यक रूप से पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। वरिष्ठ प्रवक्ता, कवि-समीक्षक डॉ. हरीश अरोड़ा ने एक पाठकीय प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए प्रकृति के सहचर्य से जीवन दर्शन को प्रकट करने वाली कविताएं बताया और कहा कि प्रकृति के उपमानों, बिम्बों, प्रतीकों से सामाजिक संघर्ष को व्यक्ति करने में सफल हैं इसीलिए इन कविताओं का विशिष्ट स्थान है।
    इस अनूठे समारोह में दिल्ली के लगभग २०० साहित्यकारों, लेखकों, कवियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज़ की। समारोह की समाप्ति पर चिमनी पर टंगा चाँद काव्य संकलन की लगभग १५० प्रतियों का हाथोंहाथ बिक जाना इस बात का संकेत है कि अच्छी कविता के पाठक अभी भी मौजूद हैं।
    ०००

    3 टिप्‍पणियां:

    1. 'चिमनी पर टँगा चाँद' शीर्षक तो पसंद आया।

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    2. सुरेश भाई, जो अपने समय को पहचान सकता है, उसकी आंधियों, तूफानों को देख सकता है, उसके सीने पर उगे कांटों और फूलों को अपने भीतर महसूस कर सकता है, सिर्फ वही अच्छी रचनायें दे सकता है. कविता केवल कल्पना, फंतासी या इन्द्रधनुषी आवेग भर नहीं है, वह आदमी के संघर्ष और साहस की कथा है, उसके दर्द और वेदना की कहानी है. आप की जितनी कवितायें मैं पढ पाया हूं, वह हालांकि पर्याप्त नहीं हैं लेकिन वह एक कवि का परिचय देने के लिये काफी हैं. मैं खुश हूं कि मेरी उम्मीदों के अनुकूल ही वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किये. आप से अभी और अच्छी कविताओं की अपेक्षा रहेगी. शुभकामनायें.

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    3. डॉ. नामवर सिंह ने इस समय की पूरी कविता पर विहंगम दृष्टि डालते हुए कहा कि चीनियों के चेहरों की तरह आज के सभी कवियों की कविता एक-सी लगती है।
      दोष मठाधीश की चीनी आँखों का ही अधिक लगता है....जो चीन भक्त हैं, उन्हें तो कहीं भी चीन ही दिखाई देगा ।
      सुरेश यादव अच्छे कवि हैं उन्हें अपनी कविता को चीन की नज़र से बचाना चाहिए, वैसे संस्कार, मुंडन के समय पंडे पुजारियों को बुलाने की मनाही नहीं है ।

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