अब जाने को हैं ये झोला उठा के.

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  • Kajal Kumar
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  • वामपंथ ने, लोगों को अकर्मण्यता की जो घुट्टी आज तक पिलाई है उसका असर आख़िर कब तक बनाया रखा जा सकता था. बंगाल की आर्थिक प्रगति पर जितना कम कहा जाए उतना ही अच्छा. केरल का हाल भी यही है पर यहां के ज्यादातर लोगों के राज्य से बाहर रह कर पैसा राज्य में परिवारों को भेजते रहने से समस्या इतनी उग्र दिखाई नहीं देती.

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    ममता देश की रेलमंत्री होने के बजाय एक राज्य की मुख्यमंत्री बनने से आगे नहीं सोच सकतीं. भारत की राजनीति में, देश के बजाय राज्य व राज्य से भी ज़्यादा अपनी सीट का मोह रखने वाले राजनेताओं का वर्चस्व बढ़ा है. ऐसा शायद उन सभी के साथ है जो राष्ट्रीय स्तर पर कोई महत्व या पहचान नहीं रखते इसीलिए क्षेत्रिय प्रभाव पर ही आश्रित रहते हैं व, इसके आगे की सोच भी नहीं पाते. देवगौड़ा तो प्रधानमंत्री बन कर भी कर्नाटक से ऊपर नहीं उठ पाए.

     

    आज आज़ादी के 6 दशक बाद भी, बिहार के रेलमंत्रियों की रेलें बिहार से ही बाहर नहीं निकलतीं. क्षेत्रियता इतनी हावी है कि देश के सबसे अधिक कटे पहाड़ी क्षेत्रों को देश की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए शायद तभी काम होगा जब कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम, अरूणाचल, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम व त्रिपुरा के सांसद बारी-बारी से रेलमंत्री बनाए जाएंगे. दूसरी ओर, चीन ने बीजिंग से ल्हासा को जोड़ कर पूरे तिब्बत को मुख्यधारा में समाहित करने की ओर ठोस कदम बढ़ाया है. हम क्षेत्रिय स्वार्थों के चलते भारतीय भूभाग पर भी समुचित प्रभाव बनाए रखने में असक्षम दिखते हैं. इन क्षेत्रिय राज्यों को रेलों से जोड़ना राजनैतिक व सामाजिक आवश्यकता ही नहीं है बल्कि सामरिक व राष्ट्रीय आवश्यकता है. इसके लिए नीतिगत प्रयासों की आवश्यकता है.

     

    आज तक जिन नीतियों ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया है वे हैं NHAI के माध्यम से राष्ट्रीय राजमार्गों के क्षेत्र में क्रांति, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, पंचायती राज व नरेगा (मनरेगा). राष्ट्रीय नदियों को जोड़ने की दिशा में कोई विषेश प्रगति नहीं होने के कारण मैं इसे अन्य प्रभावशाली योजना नहीं मान पाया. देश को आज पापुलिस्ट नीतियों की अपेक्षा ऐसी ही रचनात्मक नीतियों की आवश्यकता है जिन्हें बृहत्तर राष्ट्रहित में चरणबद्ध रूप से कार्यान्वित किया जाए.

     

    एक पार्टी के वर्चस्व से निकल कर भारतीय लोकतंत्र द्विपार्टी व्यवस्था की ओर बढ़ते हुए आज, गठबंधन व्यवस्था के मुहाने पर खड़ा है. इसलिए यह बहुत ज़रूरी हो गया है कि देश में स्थायी नीतियां अपनाई जाएं जो सरकारों के आने जाने से प्रभावित न हों. आशा है कि वामपंथी भी जिद्दी मुद्दे छोड़ देश की मुख्यधारा में सम्मिलित होंगे.

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    -काजल कुमार

    8 टिप्‍पणियां:

    1. बहुत बढ़िया और सार्थक आलेख !

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    2. अच्छा विश्लेषण। एक पार्टी का वर्चस्व होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है।

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    3. सत्य वचन जी, बहुत सुंदर ओर सटीक लिखा धन्यवाद

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    4. "अकर्मण्यता की घुट्टी" ने बंगाल को कंगाल बना दिया। सार्थक लेख।

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    5. दूरदर्शितापूर्ण विश्लेषण , मगर सवाल यही है कि क्या ये वामपंथी सुधरेंगे ? क्या कौंग्रेस फूट डालों, तुष्ठीकरण करो और राज करो की निति छोड़ पायेगी ? नेहरू खानदान से बाहर निकल पायेगी ? मुझे तो नहीं लगता , आजकल आप लोग भी नोट कर रहे होंगे कि एक ख़ास सडयंत्र के तहत जान बूझकर सेना का मनोबल गिराया जा रहा है , क्या जो ये घटनाएं थी पहले नहीं होती थी क्या ? इस लिए हालात सुधरने के आसार तो नहीं दीखते !

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    6. बहुत बढ़िया लेख. वामपंथियों के बारे में आपकी आशा की दाद देता हूँ मगर सच यह है कि अब तक वहां जब भी सुधार की बात हुई तो एक नया विघटन और एक नया सशस्त्र संघर्ष शुरू हुआ है. देश को दरअसल शिक्षा, विकास और सुशासन की ज़रुरत है. यह होगा तो कोई आतंकवादी संगठन अपने को जनता का संरक्षक नहीं कह पायेगा.

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