नक्सलियों को जनमत संग्रह की चुनौती

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    छत्तीसगढ़ का आम आदिवासी नक्सल हिंसा के दंष से
     
     मुक्ति पाकर विकास की मुख्यधारा से जुड़ना चाहता है 

    छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने लोकतंत्र , विकास और आतंकवाद विषय पर आयोजित चर्चा में लोकतंत्र की रक्षा के लिए नक्सलवाद को समाप्त करने पर जोर दिया

    नई दिल्ली 4 मई छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने नक्सलियों तथा उनकी विचारधारा के समर्थकों को छत्तीसगढ़ में जनमत संग्रह की चुनौती दी है । नई दिल्ली में लोकतंत्र , विकास और आतंकवाद विषय पर आयोजित चर्चा में मुख्यमंत्री ने कहा कि चुनाव आयोग जैसी देष की किसी भी निष्पक्ष संस्था से पूरे राज्य में इस विषय पर जनमत संग्रह कराया जाये की राज्य की जनता नक्सलियों की विचारधारा के पक्ष में है या लोकतांत्रिक प्रक्रिया से राज्य के विकास के पक्ष में । उन्होंने कहा कि इससे देष के महानगरों में अनर्गल प्रलाप करने वाले तथाकथित बुद्विजीवियों का भ्रम दूर हो जायेगा । उन्होंने कहा कि नक्सलियों का मुख्य एजेंडा देष के षासन तंत्र पर कब्जा कर अपनी विचारधारा का षासन चलाना है और छत्तीसगढ़ के लोग उसके इस प्रयास में सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़े है । चर्चा में केन्द्रीय भारी उद्योग विभाग के मंत्री श्री विलासराव देषमुख , झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री श्री बाबूलाल मंराडी ,  मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य तथा सासंद श्री सीताराम येचुरी ने भी अपने विचार व्यक्त किए ।
     
    मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जोर देकर कहा कि देष में लोकतंत्र की रक्षा के लिए नक्सली विचारधारा को पराजित करना जरूरी है । उन्होंने कहा कि लाषों को गिनकर नक्सल समस्या की गंभीरता को नही समझा जा सकता है । यह एक ऐसी लड़ाई है जिसे जीतना देष के लिए जरूरी है । उन्होंने कहा कि आजादी के बाद भारत में काफी जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों ने भी आदिवासी अंचलों में विकास को यह कहकर रोककर रखा कि इससे आदिवासियों की मूल संस्कृति पर असर पड़ेगा। इसीलिए उन्होंने आदिवासियों के निवास क्षेत्रों में सड़क, बिजली जैसी जरूरी अधोसंरचना भी नहीं बनने दिया। विदेशी पर्यटकों को इन इलाकों में घुमाने और उनसे यात्रा वृतांत लिखवाने का फैशन चलाया गया। जो किसी न किसी रूप में आज भी कथित एनजीओ, मानव अधिकार संगठन का एक सगल है। मुझे आश्चर्य होता है कि उनमें से ही कुछ लोग अब यह सवाल करते हैं कि बस्तर में सड़क क्यों नहीं बने। अबूझमाड़ अबूझ कैसे रह गया। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि एक दीर्घ कालीन षड़यंत्र के तहत बरसों पहले यह सब किया जाता रहा था, ताकि इन इलाकों में नक्सलवाद की तरह का आतंकवाद और अलगाववाद पनप सके।  उन्होंने सवाल उठाया कि एक कसाब, एक अफजल गुरू के खिलाफ जितना आक्रोश, जितना गुस्सा भारतवासियों के दिल में है, उतना गुस्सा नक्सलवादियों के लिए क्यों नहीं होना चाहिए। भोले-भाले वनवासियांे के खून की कीमत मुम्बई, दिल्ली में रहने वाले किसी व्यक्ति के खून से भला कम कैसे हो सकती है? उन्होंने कहा कि मैं भारत सहित दुनिया के मीडिया से यह सवाल करना चाहता हूं कि वे नक्सलवादियों और उनके शहरी समर्थकांे को बेनकाब करने के लिए सामने क्यों नही आते? हमारे संविधान में आम आदमी को न्याय दिलाने और उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए जो प्रावधान किए हैं, उसका फायदा तथाकथित मानव अधिकार समर्थक नक्सलियों के हित में करें और यह मीडिया की नजर से बचाकर कैसे किया जाता रहा।
       
    उन्होंने कहा कि लोग अपने मन से यह बात निकाल दें कि जहां पिछड़ापन है, वहां नक्सलवाद है। वास्तव में  नक्सलवाद ही देश के बहुत बड़े हिस्से में पिछड़ेपन का कारण है। नक्सलवाद का जो रूप हमने देखा है, उसमें गरीबों की बेहतरी को लेकर कोई चिंता नहीं है। उन्होंने सबसे ज्यादा नुकसान अगर किसी को पहुंचाया है तो वह जंगलों से घिरे गांवों में रहने वाली वह आबादी है, जिसकी मूलभूत आवश्यकताएं पूरा करने के लिए सरकारें तो अपने स्तर पर प्रयास कर रही हैं, लेकिन नक्सलवादी विकास कार्यों का लाभ ग्रामीणों, गरीबों, किसानों, आदिवासियों, वनवासियों तक पहुंचने ही नहीं देना चाहते। नक्सलवादी कभी नहीं चाहते कि ऐसे दूरस्थ इलाकों के लोगों को सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, राशन जैसी बेहद जरूरी सुविधाओं का लाभ भी मिले। नक्सलवादी, लोगों को इसलिए शिक्षित, जागरूक और समृद्ध नहीं होने देना चाहते, जिससे कि वे उनके हाथों से निकल जाएं। नक्सली ग्रामीणों का पिछड़ापन बरकरार रखते हुए उनका मानसिक और शारीरिक शोषण करते रहना चाहते हैं ताकि उनकी दुकानदारी चलती रहे।
     
    मुख्यमंत्री ने कहा कि हमने सरगुजा-बस्तर जैसे सघन वन क्षेत्रों और नक्सली प्रभावित अंचलों में सघन दौरा किया। हमने यह पाया कि सिर्फ प्रचलित व्यवस्था से आदिवासी अंचल में विकास की गति नहीं बढ़ाई जा सकती। इसलिए नए सिरे से विचार कर हमने बस्तर एवं दक्षिण क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण, सरगुजा एवं उत्तर क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण तथा अनुसूचित जाति विकास प्राधिकरण का गठन किया। हमने यहां स्थानीय जरूरतों और मांगों के आधार पर तत्काल निर्णय लेने की व्यवस्था की। हर साल स्वतंत्र रूप से बजट दिया जिसके परिणामस्वरूप लोगों को सरकार की कार्यप्रणाली पर विश्वास हुआ। उनकी समस्याएं तुरंत दूर होने से स्थानीय जनप्रतिनिधियों की बैठकों में भागीदारी बढ़ी और धीरे-धीरे करीब सैकड़ों करोड़ रूपए के कार्य इन क्षेत्रों में करा दिए गए। इसी प्रकार चाहे सस्ता नमक देना हो, सस्ता चावल देना हो, निःशुल्क चरण पादुकाएं देना हो, बच्चों को शिक्षा के लिए नई आश्रम शाला खोलना हो। नई-नई योजनाएं बनाकर ग्रामीण जनता के घर जाकर साधन-सुविधाएं मुहैया कराने की कारगर रणनीति और योजनाएं लागू की गई। ऐसे अनेक उपाय किए गए, जिससे कि स्थानीय आबादी को सरकार की उपस्थिति का बोध हो और उन्हें जल्दी से जल्दी राहत मिले। वे स्वयं और हमारी सरकार के अनेक मंत्री तथा अधिकारी ऐसे-ऐसे दुर्गम अंचलों में पहुंचे जहां पहले कोई सरकारी आदमी पहुंचा ही नहीं था।
     
    उन्होंने कहा कि वे गर्व के साथ यह कहना चाहता हैं कि  इन प्रयासों का अच्छा असर हुआ। इसके साथ ही हमने नक्सलवादी, वामपंथी हिंसक तत्वों को साफ संदेश दिया कि यदि वे हिंसा का रास्ता छोड़ना चाहते हैं तो हमारी नई पुनर्वास नीति उन्हें मदद करेगी। और अगर वे हिंसा का रास्ता नहीं छोड़ेंगे तो हमारी सरकार उन्हें मुंह तोड़ जबाव देने का रास्ता अपनाएगी। आजादी के 60 सालों में नक्सलवादियों को पहली बार किसी सरकार ने ऐसा दो टूक जवाब दिया था। इससे ग्रामीण जन-जीवन में पैदा हुए विश्वास ने अपना चमत्कार दिखाना चालू कर दिया। 
     
    मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ के सर्वश्रेष्ठ पर्यटन स्थल, प्राकृतिक संसाधन, छत्तीसगढ की उत्कृष्ट संस्कृति इन्हीं वनवासी अंचलों में है, और सदियों से विकास की बाट जोह रहे हैं लेकिन नक्सलवादियों की बारूदी सुरंगों ने इनका रास्ता रोक रखा है। नक्सलियों की काली छाया से मुक्त होने पर यह अंचल देश ही नहीं, दुनिया में अपनी प्राकृतिक सुन्दरता और संसाधनों के लिए जाना जाएगा। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में न सिर्फ विकास की ललक जाग चुकी है, बल्कि जागरूकता की मशाल भी जल चुकी है। इस वीर भूमि से नक्सलियों के पैर उखड़ने की शुरूआत भी हो चुकी है। अब हम उस दिन के लिए तैयारी कर रहे हैं, जब छत्तीसगढ़ नक्सल मुक्त राज्य कहलाएगा। देर से ही सही केन्द्र सरकार भी इस मसले की गंभीरता को समझने लगी है। हमने अनेक बार यह सुझाव दिया है कि केन्द्र की अगुवाई में प्रभावित राज्यों के लिए एक समन्वित रणनीति और कार्य योजना बनाकर ही नक्सल समस्या से ही निबटा जा सकता है। केन्द्र सरकार के हाल के संकेतों से लग रहा है कि अब नक्सली मामले में केन्द्र की दुविधा की स्थिति खत्म हो रही है।
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    2 टिप्‍पणियां:

    1. मुख्यमंत्री को कहने के लिए नहीं करने के लिए चुना जाता है. सरकार का काम जन-धन की सुरक्षा का है, वक्तव्य देते रहने का नहीं. कहना-सुनना बहुत हो गया, अब पीड़ितों के सब्र का बाँध टूटता जा रहा है.

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