क्‍या अंग्रेजी बन गयी है राष्‍ट्रभाषा ? द संडे इंडियन पत्रिका में पढि़ए ओंकारेश्‍वर पांडेय की आमुख कथा

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  • अविनाश वाचस्पति
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  • द संडे इंडियन पत्रिका का अभी यह अंक बाजार में आना है। आप प्रतीक्षा मत कीजिए, तुरंत पढ़ लीजिए। अपनी अच्‍छी बुरी जैसी भी हो, राय अवश्‍य दीजिए। पत्रिका 14 भाषाओं में एक साथ प्रकाशित होती है। एक एक इमेज पर क्लिक करते जाइये और पढ़ते रहिये

    इस आलेख को पढ़ने के लिए आपको अपना अच्‍छा समय निकालना होगा और वो समय आप हिन्‍दी हित में अवश्‍य निकालेंगे। मुझे पूरा विश्‍वास है, इसे पढ़ेंगे और इस पर अपने विचार प्रस्‍तुत करेंगे कि इतना सब जानकर आपकी बेबाक राय क्‍या है ? नुक्‍कड़ को प्रतीक्षा रहेगी आपके बहुमूल्‍य विचारों की।






























    द संडे इंडियन पत्रिका के दिनांक 19 मई से 30 मई 2010 अंक से साभार

    30 टिप्‍पणियां:

    1. अगर राष्ट्र भाषा का अर्थ सत्ता वर्ग की भाषा है तो हिन्दी अपने पद से बहुत पहले ही पदच्युत की जा चुकी है।

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    2. हिन्दी की औकात है ही क्या ?

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    3. सरकार से उम्मीद करना बेमानी है कि वह हिन्दी के लिए कुछ करेगी... और सरकार किसी एक भाषा के लिए कुछ करे भी क्यों? हिन्दीभाषियों को ही कुछ करना चाहिए। अगर हम सभी हिन्दी में हर विषय पर स्तरीय सामग्री लोगों को दे सकें, तो निश्चय ही हिन्दी की हालत में सुधार आएगा। हिन्दी ब्लॉगिंग इस दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है। लेकिन जितना मैंने देखा है, यहाँ भी विविधता और दिलचस्प सामग्री का भारी अभाव है। फिर भी कई मित्र अच्छा काम कर रहे हैं। उम्मीद है स्थिति सुधरेगी।

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    4. हैं !!
      अच्छा जी, :)
      अंग्रेजी राष्ट-भाषा बन गयी !!
      और हमेँ किसी ने बताया भी नहीं !!
      अब क्या अंग्रेजी भी सीखनी होगी. कौन है माई का लाल जो हमसे अंग्रेजी बुलवायेगा.
      देखते हैं !!

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    5. हिंदी के प्रचार के लिए गंभीरता से प्रयास करने की जरूरत है...हिंदी साहित्य में लोगों की रूचि बहुत कम होती जा रही है..और नई पीढ़ी इस से दूर होती जा रही है...ब्लॉग्गिंग एक प्रशंसनीय कदम है...फिर से हिंदी लिखने-पढने का अवसर लोगों को मिल रहा है....फिर भी नई पीढ़ी को इस से कैसे जोड़ें ..ये प्रयास करना चाहिए

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    6. जिस बाजार ने हिन्दी की यह दुर्गति की है वही बाजार अब हिन्दी को सम्मानित करेगा...
      समय ही कितना हुआ है अभी हिन्दी के प्रचलन को... अंग्रेजी की तरह 1000-500 साल नही सिर्फ 20-30 साल और फिर यही "मार्केट फोर्सेस" ही हिन्दी को वो ऊंचाइया देंगे जिसकी कल्पना भी अंग्रेजीदा लोगों को नही होगी...

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    7. sriman ji,

      bhasha aur sanskrati satta k anusaar uska vikas hota hai. bharat pehle british samrajyvaad k adhipaty mein tha to angreji padhi aur uske anusaar ek bahut bada tabka viksit hua. british samrajyvaad k patan k baad duniya mein uski jagah americn samrajyvaad ne le li. to american samrajyvaad k hiton k poorti angreji bhasha se hi hoti hai to desh ka satta varg angreji ko hi badhava dega lekin satta varg ki majboori hai ki vah hindi ko ignore nahi kar sakta hai uski apni majbooriyan hain. hindi bhasha k adhikansh vidvaan madhy vargiy samaaj se hain to vo chahe vidvaan kam hon lekin unka dambh unka ahankaar bhasha k vikas ko bhi nuksaan pahunchata hai. ham jab hindi k vidvaan se koi apeksha karte hain to uska dambh ahankaar aade aa jata hai. jiski chavi blogjagat mein roj dekhai deti hai ham jaise kamjor log kisi dambh ya ahankaar k saamne ek second ruk sakne mein asamarth hain isliye vichaar na vyakt kar nice se kaam chala lete hain bhartiy madhy varg samaaj ki chaya mein aksqr hota rehta hai ki tu raand ho jata hai to javaab aata hai ki tu to raand ho hi jaaye teri saas bhi raand ho jaaye. tippani ko anytha na lijiyega vineet bhaav k sath aapka

      sadar
      suman
      loksangharsha.blogsapot.com

      NICE....

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    8. राष्ट्रभाषा, मतलब जन भाषा, इंग्लिश अभी जन भाषा नहीं हुई, वो व्यवसायिक भाषा है, बिजनस के लिए इस्तेमाल होने वाली, स्टेटस को ऊंचा दिखाने की, फिर भी जो मजा अपनी भाषा में है वो कहीं और हो सकता ही नहीं।

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    9. हम सब अपने बच्चों को अंग्रेज़ी स्कूलों में भेज कर यहां हिन्दी सेवा का ढोंग भरते हैं. आह.

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    10. मुझको लगता है कि हिन्दी अगर राष्ट्रभाषा न बन सकी तो दोषी हम खुद हैं
      अपने बच्चों को अंग्रेजी कान्वेंट में हम पढ़ाते हैं ,हम उन्हें मक्के का लावा नहीं खिलाते पापकार्न खिलाते हैं
      ओंकारेश्वर जी ने ये भी लिखा कि हमारे यहाँ अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या यूरोप से ज्यादा है
      सरकार को दोष न देकर अगर हम खुद को सुधार लेंगे तो हिन्दी ही हमारी राजभाषा होगी
      मैं इ गुरु राजीव जी से भी सहमत हूँ

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    11. भाषा का कभी कोई विकल्प नहीं होता. दूसरी बात यह कि, किसी भाषा का अस्तित्व मात्र उसमें लिखे जा रहे साहित्य से है, तो यह थोडा मुश्किल है. ऐसे समय में जब बोलियों को अंतर राष्ट्रीय पहचान प्राप्त हो रही है. अंग्रेजी का राष्ट्रभाषा होना या होने की सम्भावना हम किस तरह से तय करते हैं, तकनीकों के ग्लोबल पैमाने पर तो यह बेवजह की बात है. चीन जैसे देशों में अंग्रेजी के भरपूर स्पेस के बावजूद चीनी भाषा का अपना स्वतंत्र अस्तित्व बना हुआ है. हमारे यहाँ अंग्रेजी भाषा का हौवापन या होड़ कुछ अजीब तरह की है. मध्यम वर्गीय स्तर पर अंग्रेजी भाषा का स्तर मात्र बोलचाल अथवा सामाजिक सरोकारों से सबद्ध अधिक होता है. साहित्य में जितना अंग्रेजी है उतना ही अन्य भाषाओँ पर भी है. इन सब बातों के साथ उपनिवेश और उसके बाद हाशिये पर बचे ग्लैमर प्रोग्राम आधुनिकतावाद को कितना प्रभावित कर रहे हैं. इसपर सोचने की ज़रूरत है....
      प्रश्न उठाकर चुप हो जाना..या हिंदी हिंदी के प्रेम और अंग्रेजी या अंग्रेजियत के विरोध मात्र एक भावनात्मक उद्वेग बनकर रह जाते हैं...इन विषयों पर भाषा वैज्ञानिक पद्धतियों से सोचे जाने की ज़रूरत है कि किस तरह एक देश में मूल भाषा का सामजिक ह्रास होना आरम्भ होता है.

      हिंदी के ह्रास को एतिहासिक परिप्रेक्ष्यों में अध्ययन करने के लिए यह देखना आवश्यक है, कि हिंदी का अस्तित्व है कहाँ से ह्रास कहाँ से हो रहा है. बेवजह की देशभक्ति प्रेमधारा में बहकर जुमले कसना की हम हिंदी के पक्षधर हैं तो यह सब कुछ बकवास है. सिर्फ एक चंद समय के भावनात्मक उद्वेग अथवा उत्तेजना के सिवा कुछ नहीं.

      http://taaham.blogspot.com/2010/02/blog-post.html

      Nishant
      www.taaham.blogspot.com

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    12. agar aap mujhse poocho to main to yhi kahoonga jab tak ham apne desh ke lie apni sthaniya bhasha me software develop nahi karenge tab tak kuch nahi hoga........

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    13. इस देश की कोई राष्ट्र भाषा भी है ?

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    14. गुलामी की पहचान है, क्योकि यह भाषा हमारी नही, किसी जमाने मै हमारे आंका बोलते थे इस भाषा को, ओर उन के चम्चे ओर देश के गद्दार, उन के चापलुस उन आंकाओ की चापलूसी करने के लिये उन के सामने गिडगिडाने के लिये टूटी फ़ुटी अग्रेजी बोलते थे, ओर उन गद्दरो की देखा देखी आज लोग भी उसी भाषा को बोल कर अपने आप को साहब कहालाते है, ओर आज भी इन अग्रेजॊ के गुलाम ही कहलाते है,

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    15. गुलामी की जंजीर ऐसी पड़ी की हम आज भी उबर नही पा रहे हैं...हिन्दी के विकास में कुछ करना ही होगा और यह शुरुआत कोई भी कर सकता है..हिन्दी सबकी भाषा है..हमें इसका प्रसार करना होगा अन्यथा आगे और भी स्थिति खराब हो सकती है...प्रस्तुति के लिए धन्यवाद

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    16. जिस तरह से क्रिकेट ने हाकी के उद्धार में योगदान किया है और आज बच्चों को समझाना मुश्किल हो रहा है कि आखिर हाकी किस कारण से भारत का राष्ट्रीय खेल है उसी तरह से अंग्रेजी भाषा ने भी हिंदी के लिए योगदान किया है और अब भी कर रही है , पूरे जोशो खरोश के साथ ।

      अविनाश भाई, धन्यवाद कि आपने इस बहस में हम सभी हिंदी ब्लोग्गर्स का प्रतिनिधित्व करते हुए , बहुत ही सकारात्मक बात कही है । हालांकि मेरा ये मानना है कि हिंदी को साईड लगा के अंग्रेजी कभी आम जन की भाषा नहीं बन सकती और अंग्रेजी को साईड लगा के आम से खास नहीं बना जा सकता ।

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    17. अविनाश जी मैं स्वयं स्तंभित हूं चर्चा में यह जानकर कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है ...? थी कभी भी ...... मित्र आजतक उसे हम राजभाषा तो बना नहीं पाये.. हैं .... कचहरी में बैठे हुये वकील और कारिंदे आज भी ’ मुसम्मात मुव्वक्किल आदि मुगलकालीन शब्दों का प्रयोग तो कर पा रहे हैं किंतु हिंदी के लिये आवश्यक ... ???

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    18. ...... रही बात अंग्रेजी की तो उसमें बू आती है आभिजात्यता की... पावर की .. और तो और किसी भी कार्याकय में जब तक आप अंग्रेजी के कुछ वाक्य नहीं बोलें तब तक आपको वांछित ’भाव ’ नहीं मिलता है ...

      स्वाभिमानी हिंदुस्तानी होने का गौरव और यह भाव संबवत: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद दिनों दिन तिरोहित होता चला गया है.
      Let's see what kan bee dun for hinDee

      मित्रवर क्षमा करें यदि अधिक हो गया हो तो परन्तु पीड़ा बहुत है

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    19. जिस घर में हम रहते हैं, जिस घर में हम पैदा हुए और जिस घर की पहचान हमसे बनी हो - वही घर कहे कि मैं इस बात का प्रमाण पेश करूँ कि मैं इस घर की ही सदस्य हूँ. इससे अधिक लज्जाजनक बात और क्या हो सकती है? ये कहने वालों के लिए डूब मरने वाली बात है. ऐसी घटना हो भी हमारे घर में ही सकती है. हाँ मैं अपने ही देश की बात कर रही हूँ.
      अरे हिंदी के लिए किसको सोचने की फुरसत है, उन्हें अपने वेतन और भत्तों की चिंता है, राष्ट्र हित की बात कहाँ से आ गयी? फिर हम दूर क्यों जाते हैं. हमारा अभिजात्य वर्ग ही अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में ही पढ़ायेगा क्योंकि उनको हिंदी मेंबोलने तो उन्हें शर्म आती है. अरे हम अपनी मानसिक गुलामी से तो मुक्त हों तब हिंदी को अंग्रेजी के चंगुल से मुक्त कराने की सोचें. पहली इकाई तो घर ही हैं न, फिर कम से कम हिंदी भाषी प्रदेश तो यह काम शासन के स्तर पर कर ही सकते हैं. मगर चिंता किसको है? अच्छी खासी हिंदी बोलने वाला अंग्रेजी में भोंकने लगता है तो शर्म से सिर झुक जाता है अरे भाई हिंदी कोई शर्मिंदा करने वाली भाषा नहीं है.
      ये बहुत बड़ी गलतफहमी है की बगैर अंग्रेजी माध्यम के बच्चे प्रगति नहीं कर सकते . अगर छोटे मुंह बड़ी बात न समझी जाए तो मेरी बेटियां हिंदी माध्यम की ही पढ़ी हुईं है और सफलता पूर्वक अमेरिका में रह कर भी काम कर रही हैं. अपनी संस्कृति से अलग हम अपनी पहचान ही खोदेंगे.

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    20. सामायिक समस्याओं को चिन्हांकित करती सामग्री कोई दिशा नहीं दिखाती. सिर्फ सवाल उठाने की जगह कुछ जवाब भी होते तो बेहतर होता.

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    21. अब पढने को और बाकि क्या रह गया?हिंदी की दुर्दशा किसी और ने नहीं...हमने खुद की है!जब आज पूरे विश्व में हिंदी को पसंद किया जा रहा है,तो हमारे यहाँ अंग्रेजी को बढ़ावा दिया जा रहा है.. !अंग्रेजी भले ही बोलिए,लेकिन हिंदी की कीमत पर नही...

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    22. jab hindi ko rastra bhasha ka darja nahi mila hai to phir english ki bat kaha se aa rahi hai. sanvidhan me hindi ko rajbhsha kaha gaya hai n ki rastra bhasha.
      itna jarur hai ki neta log jarur use vah bana rahe hai jise english mang rahi hai.

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    23. सरकार से उम्मीद करना बेमानी है कि वह हिन्दी के लिए कुछ करेगी

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    24. अंग्रेजी ही बन रही है राष्ट्र भाषा ...लग तो यही रहा है ...
      हिंदी तो सिर्फ हिंदी दिवस मनाने की काम आने वाली है ...
      बस इस हिंदी ब्लोगिंग से ही थोड़ी उम्मीद थी ...यहाँ भी मारकाट मची हुई है ....!!

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    25. हिन्दी भाषा की जिस तरह से अवगणना हो रही है यह देखकर इस चर्चा से कोइ ठोस हल निकले तो अच्छा, मगर संभावना कम दिखती है | अगर आप इन्कमटेक्स और सेल्सटेक्स को कायदे से लागू कर सकतें है तो व्यापार-उद्योगों में हिन्दी क्यूं नहीं? जिस देस में सांसद अनपढ़ हो, जो अपनी मातृभाषा भी ठीक से नहीं बोल पातें वह भला हिन्दी भाषा के लिएँ संसद में प्रस्ताव कैसे पारित करेंगे? देश के हित में कुछ मुद्दों पर सर्वदलीय सहमती होनी चाहिए | कुछ ऐसे भी राज्य है, अपनी भाषा या अंग्रेजी को महत्त्व देतें है | बेंको या सरकारी दफतरों में बोर्ड जता है की हिन्दी का प्रयोग करें, मगर उसके कर्मचारी ही अंग्रेजी में व्यवहार करतें है.. इस देश में होता है, चलता है की आदत पडी है लोगों को और कायदे से अमल करवाने में खुद किसी भी दल की सरकार को रूचि नहीं है |
      - पंकज त्रिवेदी

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    26. मुझे लगता है कि चिन्तन का विषय ही यह होना चाहिये कि हिन्दी को कैसे विस्तार दें.

      हिन्दी कहाँ है, किस हालत में है, राष्ट्र भाषा है कि राज भाषा है आदि आदि -यह सभी को ज्ञात है- कुछ कम, कुछ ज्यादा.

      जरुरत है उत्साह से, आत्म विश्वास के साथ इसके प्रचार प्रसार के प्रयासों की जो कि हिन्दी ब्लॉगिंग निश्चित ही सकारात्मक एवं सार्थक रुप से कर रही है, इसमें दो मत नहीं.

      पुनः हिन्दी दिवस का उद्देश्य अवलोकनार्थ ही रहे तो बेहतर, हिन्दी की सेवा, मातृ और पितृ दिवस की तरह ही इस आयोजन से अलग माँ बाप की नित सेवा की तरह, नित का विषय है, कोई अहसान नहीं दायित्व है, सतत है और हर स्तर पर जारी रहना चाहिये.

      हिन्दी ही हमारी पहचान है. अपनी पहचान को सम्मान दिलाना हमारा कर्तव्य है.

      सरकार तो हमारी चुनी है, हमारी पसंद है, उससे क्या उम्मीद करेंगे जब हम खुद चूके रहेंगे.

      सरकार पर दोषारोपण कर हम सिर्फ मन का फुसला सकते हैं कि हम क्या करें मगर यह इति नहीं है और न ही कोई समाधान.

      हिन्दी के प्रचार प्रसार में सभी को अपना यथोचित भरसक योगदान करना होगा.

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    27. उड़नतश्‍तरी यानी हर दिल अजीज समीर लालजी के चिंतन की सार्थकता से सहमत। जो रास्‍ते सुझाये हैं हिन्‍दी के प्रचार-प्रसार के, बिना यह सोचे कि कौन क्‍या कर रहा है, दोषारोपण करने के बजाय हिन्‍दी के प्रचार-प्रसार में जुटे रहें।
      मेरा भी यही मानना है कि हम जो हो रहा है उसके रोने और फिर मुंह धोने में समय बरबाद न करके, अपनी ऊर्जा को हिन्‍दी की बेहतरी के लिए प्रयोग करें तो हिन्‍दी हित में यह सर्वोत्‍तम योग होगा।

      इस योगदान से हिन्‍दी चाहे राष्‍ट्रभाषा, राजभाषा न बने पर गारंटिड है कि विश्‍वभाषा जरूर बनेगी। आज से ही सभी ब्‍लॉगर, चाहे वे विवाद करते हैं अथवा संवाद, प्रण ले लें कि प्रत्‍येक सप्‍ताह में कम से कम एक और अधिक से अधिक की तो कोई सीमा ही नहीं है, हिन्‍दी ब्‍लॉग बनवायेंगे और उसे सक्रिय रखने में जुटे रहेंगे।
      जैसे हम पीते हैं चाय उसी प्रकार पोस्‍टें लगायें और जितने और जो रखते हैं मोबाइल, उतने ब्‍लॉग बनायेंगे - फिर किसकी मजाल कि हिन्‍दी को विश्‍वभाषा बनने से रोक सके।
      ओंकारेश्‍वर पांडेय जी के इस आमुख कथा के विमर्श में यही सबक लें सब और समर्पित हो जायें अभी से। फिर कुछ बाद ही आप देखेंगे कि हमारी प्‍यारी हिन्‍दी विश्‍वभाषा की प्रतिष्‍ठा पा चुकी है।

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    28. मेरा कटु सत्य और अनुभव यह है कि इनमें छपे अधिकतर लोग जो हिन्दी की पहल करने की बात करते हैं, वह एक दम ढोंगी हैं। क्योंकि इनकी कथनी और करनी में अन्तर है। यहां ब्लॉग और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी की बात करते हैं और अपने बच्चों को अमेरिका-आस्ट्रेलिया पढ़ने भेजते है और घर पर हिन्दी को खूंटी पर टांग कर अंग्रेजी की ही पहल करते हैं। हिन्दी की बाते तो सिर्फ़ प्रकाश में आने और छपने के लिए करते हैं। विदेशों में हिन्दी सम्मेलनों का आयोजन सिर्फ़ मौज और मस्ती के लिए करते हैं और इन सब मंचों का उपयोग भी वह खुद के विकास के लिए करते हैं न की हिन्दी के विकास के लिए। सब ढोंगी हैं। फ़िल्म हिन्दी की बनाते है और उसे सफ़ल भी हिन्दी भाषी ही करते हैं लेकिन अभिनेता टेलिविजन पर उसी हिन्दी फ़िल्म की सफ़लता के बारे में हिन्दी में नहीं अंग्रेजी में बोलते हैं। सब के सब ढोंगी है। वास्तव में जो हिन्दी सेवी लोग हैं वह तो आपके ब्लॉग, पत्र-पत्रिकाओं मीडिया से काफ़ी दूर हैं। क्योंकि वह एक आम आदमी है आप लोगों की तरह खास नहीं है।

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