हिंदी माँ हमें माफ करना.......

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  • उपदेश सक्सेना
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  • (उपदेश सक्सेना)
    हिंदी भाषा को हमारी मातृभाषा का दर्ज़ा तो प्राप्त है, मगर इसे राष्ट्रभाषा या राजभाषा कहने का कोई संवैधानिक हक हमें नहीं दिया गया है. यानि माँ तो हमारी है मगर शायद सौतेली! सौतेली शब्द से कई लोगों को पीड़ा हो सकती है, क्योंकि इतिहास में इस शब्द को कभी सकारात्मक ढंग से पेश नहीं किया गया है. हिंदी की दुर्दशा पर प्रेस विज्ञप्तियों के ज़रिये अपनी पीड़ा जताने वालों को भी इस बात का मलाल होगा कि इस समृद्ध भाषा को वह सम्मानजनक स्थान अब तक नहीं मिला, जिसकी वह हक़दार है. मैं मध्यप्रदेश के उस मालवा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता हूँ जहां की मीठी बोली में कई बार किसी की बे-इज्ज़ती होने पर उसे उलाहना दिया जाता है कि “....तेरी हिंदी हो गई”. अ से अमिताभ और ब से बच्चन तो हमारे देश में वर्षों पहले से पढ़ा जाने लगा है.जब हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा नहीं मिल सका है, तो यह बात विचारणीय है कि ऐसी स्थिति में राष्ट्रभाषा प्रचार समितियों जैसी संस्थानों का क्या औचित्य है?
    यह जानकार दुःख भी होता है और प्रसन्नता भी, कि हिंदी भाषा के कुल शब्दों की संख्या अंग्रेजी के मुकाबले महज़ दस फ़ीसदी ही है, दुःख इस बात का है कि यह संख्या काफी नगण्य है, प्रसन्नता इस बात की है कि हमारी भाषा में कम शब्दों में भी अभिव्यक्ति दी जा सकती है, कम शब्दों में अपनी बात दूसरों तक पहुंचाने वाले को ही समझदार माना जाता है, हालांकि यह प्रसन्नता केवल दिल को समझाने के लिए ही है. चीरहरण चाहे किसी स्त्री का हो या मातृभाषा का, वह सदैव से असहनीय रहा है. अंग्रेजीदां लोगों ने नयी भाषा हिंगलिश तैयार कर जले पर नमक छिडकने का काम किया है. मोबाइल के आने के बाद एसएमएस की वर्णमाला किसी को भी हतप्रभ करने में सक्षम है, खुले आम हिंदी के चीरहरण पर भी मौन रहने वाला “हिंदी पुत्र” नहीं हो सकता. आज़ादी चाहे किसी की गुलामी से हो या विचारों से, हमेशा सुखकर होती है. देश की आज़ादी के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग देने वालों की तर्ज़ पर हिंदी को भी उसका सम्मान दिलवाने-उसे अंग्रेजी से आज़ाद करने भगत सिंह, सुखदेव,राजगुरु जैसे दीवानों की एक बार फिर ज़रूरत महसूस हो रही है. वैश्विक भाषाओं पर नज़र रखने वाली एक संस्थान की रिपोर्ट पर नज़र डालें तो शायद सभी की आँखें खुल सकती हैं इस रिपोर्ट के अनुसार हाल ही में अंग्रेजी भाषा में शब्दों का भंडार 10 लाख की गिनती को पार कर गया है जबकि हिंदी में अभी तक मात्र 1 लाख 20 हज़ार शब्द ही हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार अंग्रेजी भाषा दस लाख शब्दों के साथ सबसे समृद्ध है जबकि कुल आठ भाषाओं की इस सूची में हिंदी महज़ एक लाख बीस हज़ार शब्दों के साथ सातवें क्रम पर है पूरी सूची इस प्रकार है-(१) अंग्रेजी- १0,00,000,(२)चीनी-500,000,(३)जापानी-232,000,(४)स्पेनिश-225,000,(५)रूसी-195,000,(६)जर्मन- 185,000,(७)हिंदी-120,000,(८)फ्रेंच-100,000. इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि अंग्रेजी में उन सभी भाषाओं के शब्द शामिल कर लिए जाते हैं जो उनकी आम बोलचाल में आ जाते हैं, लेकिन हिंदी में ऐसा नहीं किया जाता। आँखें खोलें, .....”जग अभी जीता नहीं है, हम अभी हारे नहीं हैं.”

    2 टिप्‍पणियां:

    1. जब हम हिंदी को लेकर अपने ही देश में जद्दोजहद कर रहे हैं की उसे राष्ट्र भाषा होने का प्रमाण देना पड़ रहा है, ( इससे सम्बंधित पोस्ट मैं १५ अप्रैल को www .मेरासरोकर.ब्लागस्पाट.कॉम पर डाली थी.) फिर हमें शर्म क्यों आ रही है? हिंदी को शर्मसार करने वाले हमारे अपने ही हैं न. हिंदी को हमें वो स्थान दिलाना है जो उसका है, इस संकल्प के लिए कम से कम हम सभी ब्लॉगर जन तो तैयार हैं ही.

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    2. गुलामी का असर जल्द नही जाता फ़िर हम ने तो दॊ जुते खाये है इन अग्रेज साहब लोगो के, अब हम उन्ही की भाषा बोल कर उन का स्थान ले रहे है, यह सिर्फ़ भारत की ही पीडा नही सभी उन गुलाम देशो की पीडा है जो इन अग्रेजो के गुलाम रह चुके है, वो चाहे बंगाला देश हो या अफ़्रिकान देश या फ़िर महान भारत आज हम दिमागी तोर पर गुलाम है... ओर रहेगे

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