धर्म का चश्मा

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  • पुष्कर पुष्प
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  • चश्मा बड़ी गजब चीज़ है। आंखों में काला चश्मा लगाकर आप दुनिया को छुपी नजरों से देख लेते हैं और दुनिया की नजरें आपको नहीं देख पाती। लोग पता नहीं लगा पाते की आप असल में क्या और किधर देख रहे थे? आप छुपा क्या रहे है ? क्या आपको डर है आंखे कहीं सच न बोल दें? क्या नाक पर काला चश्मा चढ़ा कर हम आंखों को सच बयां करने से रोकते हैं ?

    चश्मा चढ़ा कर आप समाज में सीना तानकर चल सकते हैं और पूरा मुंह छुपाने की जरूरत नहीं पड़ती। बस आंखे में दृश्य या अदृश्य चश्मा चढ़ा रहे। और जब धर्म का चश्मा चढ़ जाए तो फिर बात ही क्या है? धर्म के चश्मे पर बात करने से पहले क्यों न धर्म को थोड़ा बहुत समझ लिया जाए?
    धर्म किसी एक या अधिक परलौकिक शक्ति में विश्वास और इसके साथ-साथ उसके साथ जुड़ी रिति, रिवाज़, परम्परा, पूजा-पद्धति और दर्शन का समूह है। य: धारति सह धर्म:, अर्थात जिंदगी में जो धारण किया जाए वही धर्म है। नैतिक मूल्यों का आचरण ही धर्म है। धर्म वह पवित्र अनुष्ठान है जिससे चेतना का शुद्धिकरण होता। पूरा लेख

    1 टिप्पणी:

    1. भारतीय जीवन-दर्शन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष नामक चार पुरुषार्थ की परिकल्पना की गई है । धर्म के अंतर्गत मनुष्य के भीतर पलने वाले मनोविकरों को साधना अर्थात उन पर विजय पाने का अभ्यास किया जाता है । फलत: व्यक्ति का आचरण निर्मल हो जाता है । जीवन विनम्रता, धैर्य, व्यवहार कुशलता, अनुशासन, सहानुभूति, उदारता, स्वावलंबन, परिश्रम आदि से भूषित हो कर कांतिमय बना रहता था । देश, समाज और परिवार में सुख-शान्ति भी बनी रहती थी। एक धर्म को साध लेने से अर्थ, काम और मोक्ष नामक पुरुषार्थ भी सध जाते थे। दिखावटी आडंबरों से सच्चे धर्म कोई वास्ता नहीं। चश्मा एक पाखंड है। पाखंड मुक्त वह परंपरा अब विलुप्त सी हो गई है। आज दार्शनिक चिंतन करने, आचरण को सुधारने का अपनी दिनचर्या में कोई स्थान नहीं रह गया है । फलस्वरूप थोडे़ दिनों में ही वैवाहिक जीवन से सुख और शान्ति का सोता सूख जाता है। सावधान! जीवन में सुख-शान्ति अच्छे आचरण से उत्पन्न आती है .....कानून से नहीं।

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