आम आदमी का स्वास्थ्य : एक अधूरा ख्वाब

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  • गुड्डा गुडिया
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  • विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष

    यह रोशनी हकीकत में एक छल लोगों

    जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगों

    प्रशांत कुमार दुबे

    प्रदेश ने विगत् पांच वर्षों में 6 लाखशिशुओं और 30000 गर्भवती महिलाओं की मौत की गवाही दी है। प्रदेश शिशु मृत्यु दर के मामले में पूरे देश में अव्वल है। प्रदेश सबसे ज्यादा कुपोषण (60 प्रतिशत ) के मामले में भी देशमें अव्वल है। बाल मृत्यु दर के मामले में प्रदेश (94 प्रति 1000) के साथ दूसरे नंबर पर है। मातृत्व मृत्यु के मामले में प्रदेश दूसरे नंबर पर है। दरअसल ये तमगे सरकार को एसे ही नहीं मिले हैं बल्कि यह बच्चों और महिलाओं के प्रति सरकार के असंवेदनषील रवैये का प्रतिफल है। होर्डिंगों से तरक्की और विकास दर्शाने वाली शिवराज सरकार का सही चेहरा तो यही है। सरकार एक और तो सहस्त्राब्दी लक्ष्यों को पाने का सुनहरा ख्वाब देख रही है लेकिन उसकी प्राथमिकतायें मेल नहीं खाती हैं । यानी सरकार ख्वाब तो देखना चाहती ह्रे लेकिन उसे हकीकत में बदलने के लिये उसके पास कोई भी ठोस योजना नहीं है। वह मृगमरीचिका की तरह नित नई योजनाओं के ख्याली पुलाव तो परोस रही है, लेकिन ठोस व समन्वित प्रयासों का अभाव हर स्तर पर दिखता है ।और यह भी तय है कि जब तक सरकार आज से बच्चों के स्वास्थ्य पर बात नहीं करेगी, प्रदेश का कल भी खराब होने वाला है

    मध्यप्रदेश में प्रतिवर्ष प्रत्येक बच्चे के स्वास्थ्य पर केव15रुपये ही खर्च किये जाते हैं जबकि उड़ीसा और उत्तरप्रदेश जैसे अन्य बीमारु राज्यों में भी यह खर्च क्रमष: 70 और 60 रुपये है। यह तब है जबकि प्रदेश, विगत् पांच वर्षों में 6 लाखशिशुओं की मौत की गवाही दे रहा है, प्रदेश शिशु मृत्यु दर के मामले में पूरे देश में अव्वल है। प्रदेश सबसे ज्यादा कुपोषण (60प्रतिशत ) के मामले में भी देश में अव्वल है। बाल मृत्यु दर के मामले में प्रदेश (94 प्रति 1000) के साथ दूसरे नंबर पर है। विगत् पांच वर्षों में हमने प्रसव के दौरान उत्पन्न जटिलताओं के कारण 30,000 से ज्यादा महिलाओं को खोया है और उनके बच्चे आज भी मां के दूध को तरस रहे हैं। दरअसल ये तमगे सरकार को एसे ही नहीं मिले हैं बल्कि यह बच्चों और महिलाओं के प्रति सरकार के असंवेदनशील रवैये का प्रतिफल है। होर्डिंगों से तरक्की और विकास दर्शाने वालीशिवराज सरकार का सही चेहरा तो यही है।

    प्रदेश के झाबुआ जिले के दो गांवों के दो माह में 43 आदिवासी बच्चे असमय काल के गाल में समा गये । स्वास्थ्य विभाग,महिला एवं बाल विकास विभाग पर दोषारोपण करता रहा और इसके विपरीत मबावि, स्वास्थ्य विभाग पर । विभागों की इस आपसी खींचतान में 43 मांओं की गोद सूनी हो गई। गौरतलब है कि इन मरने वाले बच्चों में अधिकाँश बच्चे आदिवासी हैं । हो भी क्यों ना ! क्योंकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के तृतीय चक्र की मानें तो प्रदेश में आदिवासी बच्चों में कुपोषणका प्रतिशत 71 प्रतिशत है। प्रदेश के 82 प्रतिशत आदिवासी बच्चों में खून की कमी भी पाई गई है ।बजाय इसके कि सरकार इसे स्वीकार करे, सरकार टालामटोल करती ही नजर आती है। झाबुआ प्रकरण में भी यही हुआ, सरकार ने माता-पिता की अज्ञानता और पलायन जैसी चीजों के कारण मौतों का होना बताया और अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।

    रीवा जिले में 30 सितंबर 09 को जवा विकासखंड़ के 22 गांवों के 36 कोल आदिवासी समुदाय के बच्चों को जवा के पोषण पुर्नवास केन्द्र में भर्ती करने के लिये लाया गया। लेकिन केवल10 बच्चों को ही पो.पु.के. में भर्ती कराया गया बाकी 26 बच्चों को वापस भिजा दिया गया। अब ये बच्चे मरें या बचें ! इसकी जिम्मेदारी सरकार ने नहीं ली। यानी बहुत सीधे अर्थों में इन बच्चों को मरने के लिए छोड़ दिया गया। प्रषासन ने यह भी उचित नहीं समझा कि इन्हें कहीं पर और रैफर कर दिया जाये। दरअसल सरकार कर ही नहीं सकती है सरकार ने व्यवस्था ही नहीं की है। पुन: रा.परि.स्वा. सर्वेक्षण की मानें तोप्रदेश में गंभीर कुपोषित बच्चों की संख्या 13 लाख के आसपास है और जिनके समुचित ईलाज के लिये सरकार के पास कुल202 पोपुके ही हैं, जिनमें से भी कई आंशिक संचालित हैं । यदि सरकार पूरी मंशा के साथ अपने को झोंक भी दे तो भी सरकार को कुपोषण से निपटने में 30 साल लगेंगें। प्रदेश मेंकुपोषण को लेकर कोई भी धीर गंभीर प्रयास नहीं दिखाई देते हैें, जहां पर भी कुपोषण से बच्चों की मौतें होती हैं वहां पर सरकार तत्काल तो कार्यवाही करती है लकिन बाद में वही ढाक के तीन पात । यह इससे भी पता चलता है कि सरकार ने 60प्रतिशत बच्चों के कुपोषित होने पर भी अभी तक ना तो पोशण नीति नहीं बनाई है और ना ही विभिन्न आयामों को देखते हुये समग्रता में इससे निपटने के प्रयास किये जा रहे हैं । पूरे राज्य में 134 शिशु रोग विशेषज्ञों के पद स्वीकृत हैं लेकिन उसमें से भी 17 पद रिक्त हैं । विडंबना यह भी है किप्रदेश के 30 जिलों को कोई भी शिशु रोग विशेषज्ञ नसीब नहीं हुआ।

    यदि संस्थान होंगे भी तो क्या समस्या सुलझ ही जायेगी ! ऐसा भी नहीं लगता है। सतना जिले में प्रदेश के सबसे बेहतर न्यूसिक बोर्नकेयर यूनिट में ही चार माहों में 122 नवजात शिशुओं की मौत इस बात की गवाही है। उदाहरण पोपुके का भी लें कि अभी हाल ही में भयानक कुपोषण के बावजूद भी छतरपुर,सतना, खंडवा और डिण्डौरी जिले के पोपुके में बच्चे भर्ती नहीं मिले। कारण जानने पर पता चला कि शायद कुपोषित बच्चें होंगे ही नहीं ! जबकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण चीख-चीख कर प्रदेश के हालात बयां कर रहा है। गौरतलब है कि यहां पर फिर दो विभागों के बीच समन्वय का अभाव है। ज्ञात हो कि बच्चों को पोपुके तक लाने की जिम्मेदारी महिला एवं बाल विकास विभाग की है और पोपुके के संचालन की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग की । यदि ज्यादा बच्चे भर्ती हुये तो यह सिध्द हो जायेगा कि कुपोषण है, इसलिये बेहतर रणनीति यही कि बच्चों को पोपुके ही ना लाया जाये और मरने के लिये छोड़ दिया जाये, क्योंकि यदि बच्चा पोपुके में मरेगा तो फिर सरकार यह नहीं कह सकेगी कि मौत कुपोषण से नहीं हुई है। तो यहां सवाल नजरिये और मंशा का है।

    सरकार की मंशा इस बात से भी साफ झलकती है कि इतने गंभीर स्वास्थ्य संकेतांकों के बाद भी प्रदेश की अपनी कोई स्वास्थ्य नीति नहीं है । वर्ष 2002 में डेनमार्क की संस्था डेनिड़ा द्वारा स्वास्थ्य नीति का प्रारुप बनाया गया, सरकार ने भी इसे जस का तस माना ओर आज भी यह अपनी प्रारुपावस्था में ही है। हां बच्चों की मौतों के नहीं लेकिन बाजार के दवाब को सरकार बखूबी ध्यान देती है, नतीजतन सरकार दवा नीति तो बना देती है । बाबा रामदेव के सानिध्य में योग नीति भी बन जाती है लेकिन आम आदमी का जो ध्यान रखे वैसी स्वास्थ्य नीति की जरुरत शायद सरकार की प्राथमिकता में ही नहीं है।

    राज्य का सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा भी कतई संतोषजनक नहीं है । मानव विकास प्रतिवेदन 2007 के अनुसार प्रदेश में 26प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों का अभाव है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र इस स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। यही नहीं प्रदेश में लगभग 898 उपस्वास्थ्य केन्द्र, 58सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों की भी कमी है। मानव संसाधन के रुप में देखें तो 867 विशेषज्ञों की और 1669 स्वास्थ्य अधिकारियों की कमी है। जमीनी अमले को देखें तो 498एएनएम और पुरुष स्वास्थ्य रक्षक के 298 पद रिक्त हैं । सरकार एक तो ना तो पदो को भर रही है दूसरी ओर समाज की कोख से उपजी दाई जैसी संरचनाओं को सरकार ने खत्म करने का काम किया है। ज्ञात हो कि प्रदेश के 52 हजार गांवों में 56 हजार दाईयां तैनात हैं । सरकार संस्थागत प्रसव कराकर तो अपनी पीठ ठोंकना चाहती है लेकिन वह यह जनता से छिपाना भी चाहती है कि उसने 1997 से एक भी नया पलंग सरकार ने सरकारी अस्पतालों के लिये नहीं खरीदा है । सरकार यह भी नहीं बताती कि स्त्री रोगविशेषज्ञों के 37 पद रिक्त हैं और जो भरे हुये हैं, उनमें से 70 फीसदी राजधानी के पास के7 मिजलों में पदस्थ हैं । जब यह स्थिति रहेगी तो हम सब यह कह नहीं सकते कि प्रदेश के हर व्यक्ति का स्वास्थ्य बेहतर होने वाला है।

    यह नजरिये का संकट इसलिये भी जान पड़ता है क्योंकि बच्चों और महिलाओं की इतनी गंभीर स्थिति के बावजूद प्रदेश में बच्चे कभी भी सरकार की पा्रथमिकता में नजर नहीं आते हैं।प्रदेश में बच्चों की 46 प्रतिशत जनंसख्या होने के बाद भीप्रदेश सरकार अपने कुल बजट का केवल 15.94 प्रतिशत ही बच्चों पर व्यय करता है। प्रदेश में बच्चों पर व्यय होने वाले कुल बजट का केवल 1 फीसदी हिस्सा ही केवल स्वास्थ्य पर खर्च होता है, जो कि उत्तरप्रदेश (4.52) तथा उडीसा (4.00)जैसे से भी बहुत कम है। बच्चों पर होने वाले कुल व्यय मेंप्रदेश का स्थान उन 7 राज्यों में से जहां पर बच्चों पर बजट का विष्लेशण किया गया है, 6वें नंबर पर है। सरकार ने बालअधिकार समझौतों पर तो हस्ताक्षर कर दिये लेकिन बाल अधिकारों के संरक्षण के लिये सरकार की कोई तैयारी नहीं दिखती है।

    राज्य का पूरा चरित्र राज्य की मंशा पर सवालिया निषान लगाता है। हर वर्ष विष्व स्वास्थ्य दिवस पर सरकारों के भव्य आयोजन होते हैं, नागर समाज की भूमिका भी सुनिष्चित की जाती है, लेकिन कभी भी इस विषय पर बहस नहीं होती है कि आखिर जिस स्वास्थ्य सरंक्षण के जिये जुमले गांठे जा रहे हैं,वास्तव में वह किस हद तक सुरक्षित हैं ? शायद कहीं भी नहीं, स्वास्थ्य दिवस पर सब कुछ होता है सिवाय इसके कि स्वास्थ्य पर बात हो । सरकार एक और तो सहस्त्राब्दी लक्ष्यों को पाने का सुनहरा ख्वाब देख रही है लेकिन उसका ये पूरा ख्वाब तब धरा का धरा रह जाता है जबकि सरकार की प्राथमिकतायें समझ आती हैं, चाहे वे बजटीय प्रावधान हों या स्वास्थ्य नीति । यानी सरकार ख्वाब तो देखना चाहती ह्रे लेकिन उसे हकीकत में बदलने के लिये उसके पास कोई भी ठोस योजना नहीं है। सरकार मृगमरीचिका की तरह नित नई योजनाओं के ख्याली पुलाव तो परोस रही है, लेकिन ठोस व समन्वित प्रयासों का अभाव हर स्तर पर दिखता है ।और यह भी तय है कि जब तक सरकार आज से बच्चों के स्वास्थ्य पर बात नहीं करेगी, प्रदेश का कल भी खराब होने वाला है। प्रदेशमें स्वास्थ्य के हालात पर दुष्यन्त कुमार की पंक्तियाँ मौजूं हैं ।

    यह रोशनी हकीकत में एक छल लोगों

    जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगों

    4 टिप्‍पणियां:

    1. नेताओं का बढ़िया रहे, विदेश में इलाज कराते रहें उनकी जरूरत देश को है, किसान-गरीब-मजदूर की जरूरत देश को थोड़े न है.

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    2. अच्छा रहा यह आलेख और आंकड़े पढ़ना.

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    3. शुक्रिया समीर भाई और वंदना जी

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    आपके आने के लिए धन्यवाद
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