भड़ौवाकार बेनीभट्ट ‘बंदीजन’

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  • डॉ० डंडा लखनवी
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  •      भड़ौवाकार  बेनीभट्ट ‘बंदीजन’    
                 (सन् 1788-सन् 1836)                                                        
                        - डॉ० गिरीश कुमार वर्मा
     
    हिन्दी साहित्य के रीतिकालीन युग में अवध के शासकों के संरक्षण में उनकी कला-विलासिता तथा सौन्दर्य-प्रियता की भावना को तुष्ट करने के लिए अनेक विशेषज्ञ कलाकार लखनऊ में आ जुटे थे। उनकी कलाओं में आलंकारिता, सूक्ष्मता, दक्षता तथा उत्कृष्टता थी। समकालीन राजनैतिक, सामाजिक परिस्थितियों का स्पष्ट प्रभाव तत्कालीन साहित्य में भी दृष्टिगत होता है। उर्दू साहित्य का तो लखनऊ केन्द्र ही बन गया था। दिल्ली के उजड़ने के पश्चात् वहाँ के अनेक श्रेष्ठ कवि यहाँ आ बसे और अवध के नवाबों का आश्रय पा कर अदब के स्तर पर लखनऊ की संमृद्धि में सहायक बने। यहाँ की तत्कालीन स्थितियों पर डा0 ब्रजकिशोर मिश्र का अभिमत है-“तत्कालीन समाज की प्रमुख वृत्ति आलंकारिक कही जा सकती है। प्रत्येक क्षेत्र में प्रसाधन का प्रयत्न बहुत स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होता है। वास्तुकला में विशेष सूक्ष्मतायुक्त कला के दर्शन होते हैं। साहित्य भी इसी प्रवृत्ति से प्रभावित है। सर्वप्रथम मुक्तक शैली ही इस बात को लक्षित करती है कि कवियों में चमत्कारपूर्ण कलात्मक रचना करने की विशेष रुचि उत्पन्न हो गयी थी। चित्रण तथा अभिनय की वृत्ति को भी इसी मुक्तक रचना में चरितार्थ करने का प्रयत्न किया गया है।” कविवर बेनी भट्ट उसी परंपरा का पोषक माना जा सकता है। 


    उनके काव्य का एक पक्ष हास्य का भी है। इस पक्ष पर डा0 ब्रज किशोर मिश्र की सम्मति है-“हास्य-वृत्ति का मुक्त वर्णन इन कवियों में कम मिलता है, किन्तु सरस्वती की गुप्तधारा के समान उसकी ख्याति प्रायः सभी स्थलों पर विद्यमान है। शृंगार का तो वह प्रधान सहायक बनकर आया है। अन्य स्थलों पर कहीं वाक्चातुरी के रूप में कहीं व्यंग्य, उपालम्भ के रूप में, कहीं केवल भाषागत चमत्कार प्रदर्शन में उसकी अभिव्यक्ति हुई है। सामाजिक व्यंग्य के रूप में प्रस्तुत हास्य रचना सबसे अधिक प्रत्यक्ष हुई है-‘भड़ौआ’ के रूप में अनेक कवियों ने इस प्रकार की रचना की।” हास्य-वृत्ति के आधार पर कविवर बेनी भट्ट द्वारा की गई साहित्य-सर्जना का अपना अलग महत्त्व है, यद्यपि उनके दो और ग्रन्थ “रस-विलास” एवं “टिकयतराय प्रकाश” भी हैं किन्तु तीसरे ग्रन्थ ‘‘भड़ौवा-संग्रह’’ को विशेष ख्याति मिली। मिश्र बन्धुओं के अनुसार-‘‘बेनी की सबसे उत्कृष्ट रचनाएं ‘‘भड़ौवा-संग्रह’’ में ही पायी जाती हैं। ऐसे भड़कीले भड़ौवे किसी ने नहीं बनाये।’’ कविवर बेनी के जीवनवृत्त पर प्रकाश डालते हुए डा0 सूर्यप्रसाद दीक्षित ने लिखा है-“लखनऊ के नवाब आसफुद्दौला के अर्थमंत्री राजा टिकयतराय के दरबारी कवि बेनी इस नगर के गौरव रहे हैं। इनका जन्म तो बेंती (रायबरेली) में हुआ था, लेकिन निवास तो बहुत अर्से तक लखनऊ में रहा है।’’ उनके जीवनवृत पर “हिन्दी विश्वकोश” में उल्लेख मिलता है-“इनका जन्म सं0 1844 में हुआ था। ये लखनऊ के नवाब के दीवान टिकयतराय के यहाँ रहते थे। सं0 1892 में ये परलोक सिधारे।’’ 


    इनके संबंध में एक तथ्य उल्लेखनीय है कि लखनऊ में बेनीदीन बाजपेयी नाम के एक अन्य रचनाकार उनके समकालीन थे। उन्होंने भी ‘बेनी’ नाम से काव्य रचना करना आरम्भ किया था परन्तु बेनीभट्ट के परामर्श पर बेनीदीन बाजपेयी ने ‘बेनी प्रवीन’ उपनाम से काव्य-रचनाएं कीं और साहित्य जगत् में विख्यात् हुए। कविवर बेनीभट्ट की पर्यवेक्षण-शक्ति बहुत व्यापक है। आम बोल-चाल की भाषा का प्रयोग उन्होंने अपनी रचनाओं में किया है। सड़कों पर फैले कीचड़ के कारण राहगीरों की कठिनाइयों पर प्रकाश डालते हुए बडे़ सजीव शब्दचित्र गढ़े हैं। वर्षा ऋतु का वर्णन करते हुए एक छंद में उन्होंने लखनऊ की गलियों का व्यंग्योक्तिपूर्ण उल्लेख किया है-“मीच तो कबूल पै न कीच लखनऊ की।” एक अन्य छंद में नागरिक सुविधाओं का चित्रण कर कवि ने प्रबंधनकारों की प्रच्छन्न निंदा बड़ी चतुराई से की है। उनकी वाक्चातुरी का परिचय निम्नलिखित छंद में प्राप्त होता है- 



                "एकै बिछलत, पिछलत तिन्हैं  लसे एकै, 
     एकै   परे कीच में विधाता को बकत है।
      ठौर - ठौर नदी उमड़ी है नापदानन की,
    हाथीवान हूलैं, हाथी जाय न सकत है।।
    बरसत  मेह  ऐसी  दशा  लखनऊ बीच,
    बरनत  शेष  हूँ  के  आनन  थकत है।
    देवता  मनाये पुन्य पिछिली सहाय डेरे,
      पहुँचत जाख ताके पूर  न  बखत  है।।” 

    झूठी शान-शौकत का दिखावा करने वाले कुछ लोग चादर के बाहर अपने पाँव पसार लेते हैं। ऐसे लोगों की जब पोल-पट्टी खुलती है तो वे सामाजिक रूप से उपहास के पात्र बन जाते हैं। अपनी सूक्ष्मदर्शी दृष्टि से बेनी ने एक छन्द में एक ऐसे ही व्यक्ति का उपहास किया है। तत्कालीन परम्परा के अनुसार पगड़ी, जूता, चूड़ीदार पायजामा इत्यादि परिधान धारण करना तथा मशालची रखना संपन्नता की निशानी थी। रात्रि के समय मशाल लेकर आगे-आगे पैदल चलते हुए अपने मालिक का पथ-प्रदर्शन करना मशालची का काम होता था। सामान्य जनों के लिए माँग कर वस्त्र जुटा लेना तो आसान था परन्तु मशालची की व्यवस्था करना अत्यन्त कठिन था। कुछ लोग फिर भी छद्म-वैभव प्रदर्शन करने में अपनी शान समझते थे। बेनी कवि ने झूठा दिखावा करने वालों की बड़ी कुशलता से बखिया उधेड़ी है-

    "तुर्रा पगरी पर केराया के करी पर सू,
    आजु या घरी पर चले हैं सजि मेले को।
    हंसि मुख  फेरत हैं, इत   उत हेरत हैं,
    बार - बार टेरत  हैं आदमी अकेले को।।
    चूड़ीदार जामा घिरा एक हू न सामा और,
    फेरि कुम्हिलाय गये जैहो पात केले को,
    याही हेत भागे आगे-आगे सब लोगन के,
    रात समै साथ ना मसालची उजेले को।।”

    डा0 बरसानेलाल चतुर्वेदी ने उक्त भड़ौओं की प्रशंसा में लिखा है-“बेनी के भड़ौवे (सटायर) हिन्दी में अपने ढंग की एक मात्र वस्तु हैं। ‘भड़ौवे’ में उपहास पूर्ण निन्दा रहती है।‘’ अति कृपण व्यक्ति समाज में आदर की दृष्टि से नहीं देखे जाते हैं। उनके ऊपर संसार की उपेक्षा का कोई प्रभाव भी नहीं पड़ता है। ऐसे व्यक्तियों की बेनी ने अपने भड़ौवा छंदों में खूब ख़बर ली है। एक कृपण व्यक्ति ने अपने पिता के श्राद्ध के अवसर पर बेनी को कुछ दुर्गंधित पेड़े दिये थे। नीरस पेड़े उन्हें पसन्द नहीं आये। अतः उन्होंने पेड़ों के दानकर्ता को संलक्षित कर उसका उपहास प्रस्तुत छन्द में किया है। उनके उक्ति चमत्कार एवं वाग्वैद्ग्ध्यता का परिचय प्रस्तुत पंक्तियों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है-

    “चींटी न  चाटत, मूसे न सूंघत,
    माछी  न बास ते  आवत  नेरे।
    आनि  धरे  जब  ते  घर  में,
    तब ते रहै हैजा परोसिन  घेरे।।
    मटिहुँ में कछु स्वाद,मिलै इन्हें,
    खात  सो  ढ़ूंढ़त  हर्रे - बहेरे।
    चैंकि  पर्यो  पितु लोक में बाप,
    सुपूत के  देखि सराध के पेरे।।”

    हास्य-उपहास के उद्वेग में आलम्बन की असंगतियों की प्रधानता रहती है। आलम्बन की उक्त असंगतियाँ शारीरिक, मानसिक, घटना, कार्यकलाप, रहन-सहन, शब्दावली आदि किसी भी स्तर पर हो सकती हैं। अंगुली कटा कर शहीदों में नाम लिखाने की उक्ति को चरितार्थ करते हुए थोड़ा सा दान देकर महादानी कहलाने की आकांक्षा रखने वालों की उस युग में भी कमी न थी। कहा जाता है कि ‘राय जी’ नाम के एक दानदाता बेनी भट्ट को एक हल्की-फुल्की रजाई दे कर के सस्ते में ख्याति प्राप्त करना चाहते थे, परन्तु चारणराय कवि को इतने सस्ते में मना पाना आसान न था। दानकर्ता की चाल को समाज के सम्मुख खोल कर उन्होंने उसे उपहास के कटघरे में खड़ा कर दिया-



    "कारीगर कोऊ  करामात करि लायो लीन्ही,
    मोलन  की  थोरी  जानि बनी  सुधरई है।
    राय जी को राय जी राजाई दई राजी ह्वै कै,
    सब  ठौर  सहर  मैं  सोहरत  भई  है।।
    ‘बेनी’ कवि  पाय के अघाय रहे  घरी द्वैक,
    कहत   बनै  न   कछु ऐसी गति भई है।
    सांस लेत उड़िगो उपल्ला औ भितल्ला सबै,
    दिन  द्वैक  बातिन  को  रुई रह गई है।।”

    बेनी के जीवन प्रसंग से जुड़ी इसी प्रकार की एक और घटना है। ऐसा कहा जाता है कि दयाराम नाम के किसी व्यक्ति ने बेनी को कुछ आम भेंट किए जो उन्हें रास नहीं आए। अतः उन्होंने वक्रोक्ति के माध्यम से दानदाता की ख़बर ले कर हास्य की सृष्टि की है-


    "चीटीं की चलावे को,मसा के मुँह आए जाए,
    स्वास   की   पवन लगै  कोसन भगत है।
    ऐनक  लगाय  मरु - मरु  के निहार जात,
    अनु - परमानु  की  समानता  स्वगत है।।
    बेनी कवि  कहैं, और कहाँ लौ बखान करौं,
    मेरे जान   ब्रह्म  को  विचारबो  सुगत है।
    ऐसे आम दीन्हें ‘दयाराम’ मन  मोद करि,
    जाके  आगे  सरसों  सुमेर  सी लगत है।।"

    उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि ‘बेनी’ ने लखनऊ में भड़ौवों के माध्यम से हास्य की ज्योति जगाने में विशेष कार्य किया। वाग्वैदग्ध्य एवं उक्ति चमत्कार के साथ इनकी रचनाओं में मुहावरों का सुन्दर प्रयोग हुआ है। भाषा के व्यावहारिक स्वरूप की व्याप्ति उनकी रचनाओं की विशेषता है। आलंकारिकता और मादकता का सन्निवेश रीतिकाल की देन रही है, जो दरबारी संस्कृति और उसमें छिपे फ़ारसी प्रभाव का प्रतिफल है। बिम्बों और प्रतीकों की नवीनता कवि की रचनाओं की विशेषता है जो युगबोध का दिग्दर्शन कराने में सहायक सिद्ध होते हैं। छंदानुशासन में निबद्ध लयात्मकता और अलंकारों की स्वाभाविक उपस्थिति काव्य-सौन्दर्य की वृद्धि एवं हास्य प्रवणता में सहायक है। कविवर बेनी का हिन्दी हास्य-व्यंग्य परंपरा के विकास में किया गया योगदान काव्य-शास्त्रीय एवं समाज-शास्त्रीय दोनों ही दृष्टियों से मूल्यवान है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता।

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