मैनेजिंग एडिटर और मैनेजिंग रिपोर्टर

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  • पुष्कर पुष्प
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  • आजकल अखबारों और टीवी चैनलों में एक नया दौर शुरू हो गया है। पहले संपादक और रिपोर्टर थे, अब प्रबंध संपादक और प्रबंध रिपोर्टर की फौज मैदान में है जिनका काम पत्रकारिता का पेशा कम मगर अपने अखबार या न्यूज चैनल के लिए कई सारी चीजें ‘मैनेज’ करना ज्यादा है। ज़ाहिर है कि जब प्रजातंत्र का चौथा खंभा उद्योग की शक्ल ले लेगा तो फिर उस उद्योग के साथ जुड़ी हुई कई ख़ूबियों और ख़राबियों का सम्मिश्रण भी सामने आएगा। एक तो वैसे भी इन अखबारों तथा टीवी चैनलों का काम पैसा कमाना ज्यादा और समाज सेवा कम है तो फिर ऐसे में लिखे पढ़े तथा विद्वान संपादकों की जगह छुटभइयों की फौज ने प्रबंध संपादक से लेकर प्रबंध रिपोर्टर तक का जिम्मा संभाल लिया है। ऐसे में लाजमी है कि सत्य और निष्ठा का तेल होगा और आंकड़ो और अटकलों का खेल होगा। क्योंकि पत्रकारिता एक आदरणीय और विश्वनीय पेशा नहीं बल्कि टीआरपी की रसोई होगी जिसमें हमेशा जुगाड़ की छोंक पड़ेगी।
    शायद इसीलिए किसी ने पत्रकारिता तथा पत्रकारों के बदले मापदंड और मानसिकता को देखकर कहा था कि –साहिल पे जितने आब-ग़ज़ीदा थे सब के सबदरिया का रुख बदला तो तैराक हो गए। पूरा लेख पढने के लिए यहाँ क्लिक करें।

    2 टिप्‍पणियां:

    1. अब दिन गए जब पत्रकारिता एक मिशन हुआ करती थी .हाँ मिशन तो है लेकिन उदेश्य कुछ और ही होता है.यानी ये भी एक धंधा है.अच्छे लोग कहाँ हैं.अपवाद की बात अलग है.

      और हाँ मैं तो बहुत पहले से ही कहता आ रहा हूँ कि अब जर्नलिस्ट की नहीं जर्नोक्रेट की ज़रुरत होती है!

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    2. आजकल तो पत्रकारिता में छँटे हुए लोग आ गये हैं!

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    आपके आने के लिए धन्यवाद
    लिखें सदा बेबाकी से है फरियाद

     
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