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सोमवार, ९ नवम्बर २००९

टीआरपी का खेल पत्रकारिता नहीं - प्रभाष जोशी


मीडिया के बदलते स्वरुप और उसकी भूमिका पर स्व.‘प्रभाष जोशी’ से 2007में इंटरव्यू लिया था। मीडिया मंत्र का पहला इंटरव्यू। पहली मुलाकात में हमलोगों से ऐसे मिले जैसे वर्षों से जानते हैं। बड़ी आत्मीयता और सहजता से मिले। गंभीरता से हमारी बात सुनी। हमारी हिम्मत बढाई और पत्रिका के लिए शुभकामना दी। प्रभाष जोशी जी का जाना हम जैसे युवा पत्रकारों के लिए भी एक गहरा सदमा है. मेरे लिए बहुत खास थे. मेरी पत्रिका मीडिया मंत्र का विमोचन उनके ही शुभ हाथों से हुआ था. उनसे मुलाकात कम होती थी लेकिन हमेशा उन्हें अपने करीब महसूस करता था. मीडिया मंत्र को लेकर जब भी कोई बड़ा संकट पैदा होता था तो बरबस उनकी बात याद आ जाती थी कि जब तक रगड़ाई नहीं होती तबतक चमक नहीं आती. उनकी यह बात हमेशा संघर्ष के लिए प्रेरित करती रहती है।


सवाल : मीडिया क्या है?

जो भी कुछ संचार के लायक है, उसको लोगों तक पहुँचाना चाहिए। मीडिया की मूल प्रेरणा यही है। सूचना में तथ्यों की तरफ ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए बजाय दूसरी बातों के । जब आप तथ्य बता देंगे तो इसके आधार पर राय बनाई जा सकती है। "टी।आर.पी. के खेल को मैं पत्रकारिता नहीं मानता। जिसे जो दिखाना है वो दिखाए और हमें भी यह समझ लेना चाहिए कि वो मनोरंजन कर रहे हैं। यदि रास्ते में बैठकर कोई मदारी डमरू बजाते हुए बंदरिया नचा रहा तो उसको ये करने दीजिए, उसे ये हक है पर जिसे खबर देखनी होगी वह वहाँ नहीं जाएगा।" READ MORE....

1 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बढ़िया संस्मरण।

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