वक़्त की धूप में बेरंग होता ये मन...

पिछली 'सिवकासी' वाली पोस्ट पर बड़ी इमोशनल प्रतिक्रियाएँ मिलीं. सुखद अनुभूति हुई,जानकर कि इतने लोग हमखयाल हैं. मेरे बेटे को सबने बहुत आर्शीवाद और शुभकामनाएं दीं....सबका शुक्रिया. पर सारे बच्चे ऐसे ही होते हैं--निश्छल,निष्पाप, दूसरों के दुःख में दुखी हो जानेवाले,अपनी धुन के पक्के. कई लोगों ने अपने अनुभव बांटे.ममता ने बताया,उनका बेटा भी वायु प्रदूषण,ध्वनि प्रदूषण का ख्याल कर पटाखे नहीं चलाता. राज़ी के बेटे ने इस बार,बिजली के रंगीन बल्ब और झालर लगाने से मना कर दिया और बोला--'इतनी बिजली बर्बाद करने से क्या फायदा,हम दिए जलाएंगे'. कई लोगों ने अपनी टिप्पणियों में भी बताया कि उनके बच्चों ने भी पटाखों का बहिष्कार किया है.ख़ुशी होती है ये देख कि आज के बच्चे इतने जागरूक हैं और देश का भविष्य सुरक्षित हाथों में है.ये बच्चे पाठ्य-पुस्तकों में पढ़कर सब भूल नहीं जाते बल्कि आत्मसात करते हैं और उसे व्यवहार में लाने की भी कोशिश करते हैं

मेरी एक डॉक्टर सहेली थकी मांदी क्लिनिक से आती है पर उसकी बेटी 'ग्लोबल वार्मिंग' की सोच उसे ए.सी. नहीं चलाने देती.मेरा छोटा बेटा भी,भीषण गर्मी में भी मुझे ए.सी.चलाने से रोकता है और मुझे समझाता है,"अगर हमने अभी से पर्यावरण की रक्षा का ख़याल नहीं किया तो तुम्हारी उम्र तक, जब मैं पहुंचूंगा तब तक टेम्परेचर ५० डिग्री तक पहुँच जायेगा.मैं ऑफिस से पसीने से लथपथ घर आऊंगा" जैसे भविष्य की भयावह तस्वीर उसके सामने खींच जाती है.

हम बच्चों में बढती अनुशासनहीनता,भौतिकपरस्तता और स्वार्थीपन की शिकायत करते हैं पर कभी कभी ये बच्चे सहजता से इतनी बड़ी बात कह जाते हैं कि हमें चकित कर देते है.एक बार मैं पड़ोस में रहने वाली अपनी सहेली से बात कर रही थी तभी उसका दस वर्षीय बेटा आया और बोला --'ममी,कमलेश खेलने के लिए बुला रहा है,मैं नीचे जाऊं??"(कमलेश पास की दुकान में डिलीवरी बॉय का काम करता है,जब कभी काम से फुरसत मिलती है,बिल्डिंग में बच्चों के साथ खेलने आ जाया करता है)
सहेली ने पूछा--"और भी कोई आया है खेलने?"
"ना, और कोई नहीं...बस मैं और कमलेश हैं"
"बाद में जाना, जब सब आ जाएँ"....सहेली का आभिजात्य मन अपने बेटे को एक डिलीवरी बॉय के साथ अकेले खेलने देना गवारा नहीं कर रहा था. बेटे ने आँखे चढाकर,संदेह से पूछा--"क्यूँ?..क्यूंकि वह एक दुकान में काम करता है,इसलिए??...तुमलोग इतना भेदभाव करती हो इसलिए,इंडिया इतना पिछड़ा हुआ है...मुझे जाने दो,ना."..सहेली ने उसकी बातों से बचने को, जाने की इजाज़त दे दी...और वह दस साल का बच्चा हमें भाईचारा का पाठ पढ़ा,चला गया. ऐसे ही एक बार मैं बाहर से लौटी तो पाया घर में बिल्डिंग के बच्चे जमा होकर 'पकिस्तान' और 'साउथ अफ्रीका' के बीच चल रहा मैच देख रहें हैं.मैंने यूँ ही पूछ लिया,"तुमलोग किसे सपोर्ट कर रहें हो?..और सबने समवेत स्वर में कहा--"ऑफ कोर्स! पाकिस्तान को...आखिर वो हमारा भाई है"....जब हम ना खेल रहें हो तो पाकिस्तान को कई लोग सपोर्ट करते हैं..पर भाई का दर्जा कितने लोग देते हैं?....इसी दीवाली में सात साल की अपूर्वा अपनी मम्मी से घर के सामने रंगोली बनाने की जिद कर रही थी,उसकी मम्मी ने कहा, जाओ सीढियों पर कुछ फिगर्स बना कर उसमे रंग भर दो....आप आश्चर्य करेंगे जानकर,उस बच्ची ने हर स्टेप पर एक दीपक,एक स्वस्तिक और चाँद तारे बनाए...और खुश खुश हमें दिखाया,"मैंने पाकिस्तान के फ्लैग का मार्क भी बनाया".

इन बच्चों का मन इतना कोमल होता है,दूसरो का जरा सा दुःख देख व्याकुल हो जाते हैं,कोई भी त्याग करने से जरा भी नहीं हिचकिचाते.मेरी सहेली वैशाली की बेटी स्कूल की तरफ से एक अनाथालय में एक स्किट पेश करने गयी.घर आकर दो दिन उसने ठीक से खाना नहीं खाया और उदास रही कि वे बच्चे अपने मम्मी पापा के बिना कैसे रह पाते हैं? मैं भी जब बच्चों के छोटे कपड़े अनाथालय में देने जाती हूँ तो मेरा छोटा बेटा कहता है, "तुम्हे इसके साथ कुछ नए कपड़े भी देने चाहिए"...मैं तर्क देती हूँ," सिर्फ एक दो बार की पहनी हुई है,और छोटी हो गयी है,बिलकुल नयी जैसी है." वह कुछ रोष से कहता है ."पर नयी तो नहीं है"

२६ जुलाई के महाप्रलय में जब सारा मुंबई डूबा हुआ था... कुछ ऊँचाई पर होने की वजह से हमारे इलाके में पानी नहीं भरा और बिजली भी नहीं गयी....बिल्डिंग के बच्चों ने जब टी.वी.पर देखा, कई इलाकों में तीन दिन से बिजली नहीं है, तो जैसे अपराधबोध से भर गए. उन्हें आपस में बाते करते देखा--"ये लोग एक दिन के लिए हमारी बिजली काटकर उन्हें क्यूँ नहीं दे देते?"..उन्हें अँधेरे में रहना...टी.वी.नहीं देखना गवारा था पर दूसरो की तकलीफ वे नहीं देख पा रहें थे.

इन बच्चों कि बातें सुन ,मुझे लगा....क्या हम भी बचपन में ऐसे नहीं थे?...फिर ऐसा क्या हुआ कि हम संवेदनाशून्य होते चले गए.वक़्त ने ऐसा असर किया हमपर कि हम इतने बदल गए.बचपन का एक वाक़या याद आता है...मेरी माँ बाहर गयीं थी तभी एक भिखारी आया और बोला...वह बहुत भूखा है.मैंने उसे ढेर सारे कच्चे चावल दे दिए. मैं चावल दे ही रही थी कि मेरा छोटा भाई आ गया.मुझे डर लगा ,अब ये मेरी शिकायत करेगा कि दीदी ने इतने सारे चावल दे दिए.मैंने सफाई दी...दरअसल वह बहुत भूखा था.मेरे भाई ने तुंरत कहा, "तुमने उसे फिर थोड़े दाल और आलू भी क्यूँ नहीं दिए,केवल चावल वो कैसे खायेगा?"..... ऐसे होते हैं हम सब बचपन में......फिर धीरे धीरे आगे बढ़ने की जद्दोजहद, इस दुनिया में सर्वाइव करने की कशमकश हमारी सारी कोमल भावनाएं सोख लेती है.कर्तव्यों,जिम्मेवारियों के बोझ तले ये दूसरों के लिए सोचने का जज्बा दम तोड़ देता है.हम अपनी सुविधाएं,असुविधाएं देखने लगते हैं...अपना हित सर्वोपरि रखते हैं.

दो तीन साल पहले मैंने एक संस्था "हमारा फुटपाथ" ज्वाइन की थी. यह संस्था सड़क पर रहने वाले बच्चों के लिए काम करती है.पर जब मुझे पता चला कि बाकी सारे सदस्य शाम ७ बजे इकट्ठे होते हैं क्यूंकि बाकी सारे लोग ऑफिस वाले थे और बच्चे भी सिग्नल पर फूल,गुब्बारे,खिलौने,किताबें...बेचने के बाद ही आ सकते हैं.मैं नहीं जा सकी क्यूंकि ७ बजे मेरे बच्चे भी खेलकर घर वापस आते थे ,उनकी पढाई,उनका खाना पीना देखना था.फिर दूरी के कारण आने जाने में भी २ घंटे लग जाते. मैंने कहाँ सोचा कि मेरे बच्चों के पास तो सुख सुविधा से पूर्ण आरामदायक घर है,उन बच्चों के पास तो माँ..बाप..सर पे छत...किसी का सहारा नहीं.यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं कि हम कुछ अच्छे काम करना भी चाहते हैं तो अपने फालतू बचे समय में.

हर बच्चे के दिल में एक 'मदर टेरेसा' और 'बाबा आमटे' का ह्रदय होता है पर जैसे जैसे उम्र बढती है यह छवि धूमिल पड़ती जाती है और एक समय ऐसा आता है जब ये छवि बिलकुल गायब हो जाती है.तभी तो आज इनके बाद ऐसी निस्स्वार्थ सेवा करने वाला कोई तीसरा नाम नहीं सूझ रहा.

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर लगा आप का लेख, ओर बाते ओर भी सुंदर,
    धन्यवाद

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  2. बच्चों के कोमल ह्रदय को जोड़ते हुए समाज सेवा की और इंगित करती रचना लाजवाब है ...सचुमच बच्चे निष्कपट निष्पाप होते है ...ये हम अभिभाव ही हैं जो उन पर तमाम बंदिशें थोप कर उनकी स्वाभाविकता को नष्ट करते हैं ...
    मगर बदलते सामाजिक दौर में अभिभावकों की भी अपनी मजबूरियां है ...!!

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  3. काश कि सभी लोगों में मदर टेरेसा की आत्मा प्रवेश कर जाये।

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  4. पहली बात तो समय में से ही समय निकलता है
    और जो निकलता है वह फालतू नहीं होता।
    हां, ऐसे समय का सदुपयोग करके मनुश्य
    समाज ऋण से उऋण जरूर हो जाता है।
    जरूरत तो सामाजिक ऋण को समझने मात्र की है।
    लोगों को नौकरी के बाद शेयर खरीदना और
    मुनाफा उद्देश्य पालना हमें जिस ओर ले जा रहा है
    वह हमारे बीच पनप रही पूंजीवादी सोच है।
    आप जैसे भी समझें यह आप पर निर्भर है।
    क्या फुटपाथ पर भेजने वालों के किए कोई
    नियम हैर्षोर्षो
    क्या ये बच्चे हम में किसी के आश्रय को स्वीकार
    करने को तैयार हैंर्षोर्षो
    यदि करते भी हैं तो परिवार के सदस्य की तरह
    किए गए काम को यह संज्ञा मिलती है कि
    स्वार्थ सिद्ध किया जा रहा और मुफत में वाह-वाह
    लूटने के लिए यह संवाग रचा जा रहा है।
    कोई तन से, कोई मन से और कोई धन से
    आज के युवा सेवा तो करना चाहते हैं परन्तु
    उसके लिए सामने से भी कुछ संवेदना पनपनी
    चाहिए।
    विशय मार्मिक है और इसके लिए तर्क व्यर्थ है।
    हम सब जो समझते हैं प्रयास करते रहें बस इस
    उम्मीद के साथ की लोग जुड़ते जांऐगे और एक
    दिन यह काफिला बन जाएगा।
    जरूरत है हम सब के आपस में सम्पर्क बनाए रखने
    की। एक दूसरे से जुड़ कर विचार मंथन की।

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  5. हमेशा ही बच्चों को गैरज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. उनमें संवेदन शीलता हमसे ज़्यादा है शायद.शानदार आलेख.

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  6. bachchon ki komal bhanayen khub badhiya darshaya aapne..sach hai bachche man ke sachche..

    badhiya prsang..

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  7. bhut si sukhd baten pdhne ko mili prntu pakistan kb se bhi ho gya yh smjh nhi aaya ttha kya dkshin afrika hmara dushmhai kya yhi manviyta hai yhi aapke hrdy ki vishlta hai pakistan ajtk to koi bhaichra nibhaya nhi hai or aage bhi nhi nibhayega lakho hindustaniyon ko aatnkvad ka shikar bnva kr bhi aap bhaichara nibhyen aap ko mubark kya aap ko pta hai ki vhan ke skolon me bhart ke vishy me kya pdhaya ja rha hai aatnk ko kon prayojit kr rha hai bhrt ko nirbl krne ka yh shdyntr pta nhi kis ke ishare pr ho rha hai kshmir smsya ke pichhe kon hai spsht roop se aap ka bhai paakistan hai yh antrrashtiry str pr sb swikar kr chuke hain pakistan ki bhn asliyt se hm kyon aakh moond rhe hain
    dr. ved vyathit

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  8. bahut badhiya aalekh... baton baton mein aapne humare liye bahut kuchh keh dala !

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  9. @वेद्व्यथित जी....दरअसल मैंने पोस्ट लम्बी हो जाने की वजह से कुछ पंक्तियाँ एडिट कर दीं, मुझे लगा हमारे पाठक इतने समझदार हैं उन्हें अलग से समझाने की जरूरत नहीं पर मुझे लगता है आप जैसे पाठकों के लिए (माफ़ करें,मैं आपको नासमझ नहीं कह रही, पर दृष्टिकोण हमेशा विशाल होना चाहिए )...वो पंक्तियाँ रहने देनी चाहिए थीं...खैर
    ये रही वो पंक्तियाँ
    "ये बच्चे कारगिल भूले नहीं हैं....आज भी लक्ष्य,बॉर्डर,LOC इनकी फेवरेट फिल्में हैं....लेकिन जंग और खेल में फर्क करना इन्हें आता है"
    मेरा व्यक्तिगत विचार है...पकिस्तान की आम जनता बुरी नहीं है...हमारे और आपके जैसी ही है ...ये सिर्फ राजनीतिज्ञ ही हैं जो अपना उल्लू सीधा करने के लिए ये वैमनस्य फैलाते हैं.

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  10. aapne meri bat pdhi aabhar aap ka pathk smjhdar hai pr mre jaisa anpdh itna kaise smjhe ki lakhon kshmiri pandit aaj bhi beghr hain kya un ka drd praya hai sare dosh netaon pr mdhne ki hm logon ki aadt pdgi hai pakistn men kon se andoln aatnkvad ke khilf huyen hai bhart ke khilf sb jihad ka smrthn kr rhe hain bhrt ne aaj tk pakistan ke khilf ek bhi bat nhi ki hai aur vh sth salon se baj nhi aa rha hai aahkir yh dhairy or kb tk aap bnaye rkhna chahti hain is ki koi sima bhi to hogi mumbi jaisi or kitni ghtnayen aap dekhna chahti hain kb tk hmare bhai bhn or mrte rhenge jvan kb tk shhid hote rhenge un ki vidhvayen kb tk aasoo bhayengi dil men drd jb hota hai jb koi apna mrta hai nhi to bde dil ki baton me khob mja aata hai
    aap ke khule dimg ke vicharon ka hmesha swagt hai
    ved vyathit

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