क्या ’स्मृति-दीर्घा’ ब्लॉग को बंद कर दिया जाय? -सुशील कुमार


साथियों ,
गत दिनों हमने आपसे अनुरोध किया था कि "स्मृति-दीर्घा" पर एक दिन में एक ही पोस्ट हो तो उत्तम। एकाधिक पोस्टें पाठकों की गंभीरता को भंग करती हैं और पाठक उसे कम ही पढ़ पाते हैं जिससे रचना पर संभवत: टिप्पणियाँ भी कम ही मिल पाती हैं, जबकि हम जानते हैं कि टिप्पणियाँ लेखकों को बेहतर लेखन की प्रेरणा देती हैं। किन्तु बात बनी नहीं , विगत 19 अगस्त 2009 के बाद वहाँ किसी ने कोई रचना,यादें पोस्ट ही नहीं की ,जबकि लक्ष्य यह है कि यहाँ प्रतिदिन एक पोस्ट किया जाय। काजल कुमार जी ने अपना कार्टून तक पोस्ट नहीं किया।

लगता है लेखकों की रुचि भंग हो गयी है या उन्हें समय नहीं। अगर मेरी बातों का बुरा माना आपने तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। पर ऐसी कोई बात ही नहीं। अभी तक इतने (33) लेखकों/लेखिकाओं ने यहाँ लिखने के लिये योगदान किया है जो गुण और संख्या की दृष्टि से कतई कम नहीं। इसके अच्छे आसार नज़र आते हैं ,तब फिर उदासीनता का कारण समझ में नहीं आता।
सर्वश्री/श्रीमति/सुश्री-
समीर लाल ’समीर’
शेफाली पाण्डेय
सुरेश यादव
मोहन वशिष्‍ठ
राजीव रंजन प्रसाद
अजित वडनेरकर
हिमांशु
अजन्ता
शैलेश भारतवासी
अविनाश वाचस्पति
अजय कुमार झा
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
डा०आशुतोष शुक्ल
अरविन्द श्रीवास्तव
अरुण कुमार झा
हरि शर्मा
उमाशंकर मिश्र
रति सक्सेना
मुरारी परीक
आलोक शंकर
सिद्धार्थ जोशी
श्यामल सुमन
काजल कुमार
पवन *चंदन*
कमल शर्मा
राजीव तनेजा
शमा
कथाकार
राजेश उत्‍साही
सुशील कुमार सुभाष नीरव
अशोक सिंह
संगीता पुरी
आप सभी जन से अनुरोध है कि आप गंभीरता से विचार करें कि साझा-ब्लॉगिंग इस तरह कैसे चल सकता है, यदि वहाँ कभी-कभार ही रचनाएँ पोस्ट हों।

क्या ’स्मृति-दीर्घा’ ब्लॉग को बंद कर दिया जाय?

आपने लेखकों के संस्मरण के इस अभिनव यात्रा में साथ देने का निर्णय लिया है, तभी तो यहाँ योगदान भी किया है ताकि समय-समय पर आप अपने जीवनानुभव के विचिध पगों से, वहां घटित घटनाओं से हमें अवगत कराकर हमारा मार्गदर्शन करते रहें जिससे इस जीवन के टेढ़े-मेढ़े मार्ग पर हम आप से सीख ले सकें और अपनी ज्ञान-संपदा, अपने अनुभव को समृद्ध करते रहें। अत: मैं पुन: सभी जन से विनम्रता से आग्रह करता हूँ कि आप अपनी स्मृतियां और अनुभवलोक से हमें दीर्घा पर सदैव बाँटते रहें। मैं इस प्रार्थना के साथ आदरणीय वरिष्ठ कवि विजेन्द्र की एक नूतन कविता से विदा लेता हूँ कि-
तुम्हें कठोर जीवन जीते-जीते
वह सहज लगने लगा है
उठो और जागो,
मनुष्य जीवन सिर्फ़ दासता के लिये नहीं;
प्यार में करुणा ही नहीं
प्रतिरोध भी है
तुम कहो वे बातें
तुम्हारी स्मृति में सालों से जो पड़ी हैं
जिससे औरों को भी
मुक्त होने का साहस मिले
इतना कि
विस्मृति की चिर-निंद्रा में सोयी
चेतना के हंस उनके
फिर से जाग उठे
तुम्हारी ही तरह फिर औरों को
जगाने के लिये***
-सुशील कुमार

8 टिप्‍पणियां:

  1. अरे ये क्या ..शुशील भाई....जहां तक मेरी बात है तो ..संगीता जी की नुक्कड वाली पोस्ट के बाद यही सोच कर ..कलम रुक जाती है कि क्या पता आज किसने लिखने की सोची है...आप मुझे कोइ एक दिन , सप्ताह में, दे दें...उस दिन मेरी पोस्ट पक्का आयेगी...

    उत्तर देंहटाएं
  2. नहीं बंद मत कीजिए।
    किंतु मुद्दा ठीक उठाया आपने

    नियमित न लिख पाने की विवशता के ही चलते मैंने फिलहाल इसमें योगदान नहीं किया है। आने वाले दिनों में स्वयं ही उपस्थित हो जाऊँगा।

    उत्तर देंहटाएं
  3. मेरे पोस्‍ट से कोई अंतर नहीं आना चाहिए .. सभी लेखक अपनी पोस्‍टों को सेव तो कर सकते हैं .. उसे किसी समय प्रकाशित किया जा सकता है .. एक एक दिन करके !!

    उत्तर देंहटाएं
  4. मेरे अनुसार इसमें सप्‍ताह में या पखवाडे में एक पोस्‍ट का नियम रख सकते हैं। उस पर भी किसी पर बंधन न हो, संस्‍मरण इत्‍यादि तो स्‍वयं मन से उपजने चाहिए। जबरदस्‍ती मन से की गई पैदावार कितनी पौष्टिक होगी, इसमें संदेह है।
    वैसे मेरी राय है कि जब 15 दिन तक एक भी पोस्‍ट न लगे तो ब्‍लॉग बंद करने के स्‍थान पर ब्‍लॉगस्‍वामी का दायित्‍व हो जाता है कि वो अपनी एक उत्‍कृष्‍ट पोस्‍ट अवश्‍य लगायें।
    खुदखुशी से खुदकुशी का समय अगर ब्‍लॉग जगत में अभी से आ गया तो ... हानि तो हम सबकी ही होगी। पर जिम्‍मेदार तो ब्‍लॉगस्‍वामी ही होगा।
    इसे अन्‍यथा न लें।

    उत्तर देंहटाएं
  5. अब पोस्‍ट तो तभी ठेली जा सकती है जब कोई विचार पुख्‍ता हो जाए। अभी तक कुछ खास जुड़ा नहीं सो पोस्‍ट नहीं कर पाया।


    वैसे अविनाशजी की बात से सहमत हूं।

    उत्तर देंहटाएं
  6. प्रिय सुशील भाई, अच्‍छा हुआ कि आपने स्‍वयं ही यह सवाल उठा लिया। इसे बंद तो कतई नहीं करना चाहिए। पर मुझे लगता है कि इसे वास्‍तव में स्‍मृति दीर्घा बनाने की जरूरत है। अभी तक की जो पोस्‍ट मैंने देखीं,उनमें कई ऐसी थीं जो इस ब्‍लाग पर होनी ही नहीं चाहिए थीं। जिस मंशा से आपने ब्‍लाग शुरू किया था,वह मुझे उसमें पूरा होता नहीं दिखा। हमारे ब्‍लाग लेखकों को भी यह समझना चाहिए कि इस ब्‍लाग की जरूरत क्‍यों है। क्‍या हर स्‍मृति इस पर भेजी जा सकती है। या फिर आप ही विषयों की एक सूची बनाएं। या फिर जैसा अविनाश जी ने कहा,ऐसा कुछ करें कि सारी पोस्‍ट आपतक आएं,आप उन्‍हें एक बार देख लें,जो आपको उपयुक्‍त लगे वह उस पर लगाएं। इसमें समय का अंतराल भी निश्चित हो जाएगा। निश्चित ही इसमें आपका काम बढ़ जाएगा। पर एक बात तय है कि अगर स्‍मृति दीर्घा को कुछ अलग बनाना है तो हम सब को कुछ सोचना होगा। अन्‍यथा सुशील भाई ईमानदारी की बात तो वही है जो आप कह रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  7. आदरणीय भाई राजेश उत्साही जी, इधर कई रतजगी कर अपने इस स्मृति-दीर्घा ब्लॉग का सौंदर्यीकरण किया है ताकि जब कोई पाठक यहाँ भ्रमण करे तो उन्हें एक पूर्ण वेबसाईट का सुख मिले और लेखकों को भी लिखने में आनंद आये। जहाँ तक इस साईट के विषय-वस्तु (Content) का प्रश्न है तो मैंने इस संशय को साफ़ करने के लिये ब्लॉग के साईडबर में बायीं ओर ’स्मृति-दीर्घा’ लोगो (Logo) के पास ही एक स्क्रॉल-बार लगा रखा है कि इस पर कैसी सामग्री आनी चाहिये। अत: अब लेखक को खुद विचारना है कि क्या लिखें यहां। वैसे कार्टून तो एक ब्रेक की तरह है जहाँ पाठक का मनबहलाव भी होता है पर लेख -पोस्टिंग पर अगर अपनी ओर से कुछ कहूंगा तो बड़बोलापन ही होगा। वास्तव में आपकी चिंता स्तुत्य और सराहनीय है। आप भी ब्लॉग पर नियमित अपनी उपस्थिति बनाये रखें। आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुशील जी ..हम तो लिख ही बहुत कम पाते हैं ....लेकिन अब कोशिश करूंगी कि इसमें कुछ लिखूं ....

    उत्तर देंहटाएं

आपके आने के लिए धन्यवाद
लिखें सदा बेबाकी से है फरियाद

 
Copyright (c) 2009-2012. नुक्कड़ All Rights Reserved | Managed by: Shah Nawaz