मजहब के चलते अंतर क्‍यूं धरती के संतान में

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  • संगीता पुरी
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  • कई वर्ष पहले ‘नवनीत’ पत्रिका में यह रचना पढी थी , पसंद आने पर इसे डायरी में नोट कर लिया था , आज आप सबों के लिए इसे ब्‍लाग पर डाल रही हूं , यह भी जानने की इच्‍छा है कि इसके रचयिता कौन हैं , यदि आपमें से किसी को मालूम हो तो अवश्‍य बताएं ....

    नहीं लिखा है , अगर कहीं भी गीता और कुरआन में ,
    मजहब के चलते अंतर क्‍यूं धरती के संतान में ।

    हिन्‍दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई , ईश्‍वर की संतान हैं ,
    धर्म भले हों अलग अलग पर , पहले सब इंसान हैं।
    उपरवाले से हम सबको , सबकुछ सदा समान मिला ,
    कुछ को गीता , गुरूग्रंथ , तो कुछ को कुरआन मिला।

    ग्रंथ भले ही अलग अलग हों, न अंतर, मनुज बने इंसान में ,
    मजहब के चलते अंतर क्‍यूं , धरती की संतान में।

    धूप , पवन और जल सबको हैं , संग साथ ही मिलते ,
    सबके उपवन में मौसम पर फूल संग ही खिलते।
    नहीं धूप ने कहा कभी , मैं केवल मंदिर जाउं ,
    नहीं पवन ने कहा कभी , क्‍यों मस्जिद में इठलाउं।

    निर्माता ने किया नहीं , जब फर्क कहीं निर्माण में ,
    मजहब के चलते अंतर क्‍यूं धरती की संतान में।

    अमर हो गयी मीरा जग में , कृष्‍ण भजन गा गाकर,
    मानुष हो तो कहैं रसखान , बसौं ब्रजगोकुल जाकर।
    नहीं कोई रसखान सरीखा , गोकुल बसनेवाला ,
    नहीं पिया कोई मीरा जैसा कृष्‍ण भक्ति का प्‍याला।

    कहां कृष्‍ण ने अंतर समझा , मीरा और रसखान में ,
    मजहब के चलते अंतर क्‍यों धरती की संतान में ।

    यह तो राजनीति का चक्‍कर , जो लोगों को बांट रही ,
    राम रहीम ईसा का खेमा , बना बनाकर बांट रही ।
    सावधान होकर सोंचे , पर मत आए बहकावे में ,
    मानवता ही मात्र धर्म है , भूले नहीं छलावे में।

    स्‍नेह प्‍यार की खुश्‍बू बांटे , देवतुल्‍य इंसान में ,
    मजहब के चलते अंतर क्‍यूं , धरती की संतान में।

    9 टिप्‍पणियां:

    1. सुन्दर रचना संगीता जी भावप्रधान

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    2. अच्छी भावपूर्ण कविता पढ़वाने का आभार।

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    3. बहुत सुन्दर रचना...

      ... काश ये बात यहाँ फैले 'दो-चार लोग' और समझ जाएँ...

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    आपके आने के लिए धन्यवाद
    लिखें सदा बेबाकी से है फरियाद

     
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