"हिन्दी-व्याकरण" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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  • रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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  • बहुत समय से हिन्दी व्याकरण पर कुछ लिखने का मन बना रहा था। परन्तु सोच रहा था कि लेख प्रारम्भ कहाँ से करूँ।
    आज इस लेख की शुभारम्भ हिन्दी वर्ण-माला से ही करता हूँ।
    मुझे खटीमा (उत्तराखण्ड) में छोटे बच्चों का विद्यालय चलाते हुए 25 वर्षों से अधिक का समय हो गया है।
    शिशु कक्षा से ही हिन्दी वर्णमाला पढ़ाई जाती है।
    हिन्दी स्वर हैं-
    अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ

    ऐ ओ औ अं अः।
    यहाँ तक तो सब ठीक-ठाक ही लगता है।
    लेकिन जब व्यञ्जन की बात आती है तो इसमें मुझे कुछ कमियाँ दिखाई देती हैं।
    शुरू-शुरू में-
    क ख ग घ ड.।
    च छ ज झ ञ।
    ट ठ ड ढ ण।
    त थ द ध न।
    प फ ब भ म।
    य र ल व।
    श ष स ह।
    क्ष त्र ज्ञ।
    पढ़ाया जाता है। जो आज भी सभी विद्यालयों में पढ़ाया जाता है।
    उन दिनों एक दिन कक्षा-प्रथम के एक बालक ने मुझसे एक प्रश्न किया कि और तो ठीक है परन्तु गुरू जी!
    यह और
    कहाँ से आ गया? कल तक तो पढ़ाया नही गया था।
    प्रश्न विचारणीय था।
    अतः अब 20 वर्षों से-
    ट ठ ड ड़ ढ ढ़ ण।
    मैं अपने विद्यालय में पढ़वा रहा हूँ।
    आज तक हिन्दी के किसी विद्वान ने इसमें सुधार करने का प्रयास नही किया।
    आजकल एक नई परिपाटी एन0सी0ई0आर0टी0 ने निकाली है। इसके पुस्तक रचयिताओं ने आधा अक्षर हटा कर केवल बिन्दी से ही काम चलाना शुरू कर दिया है। यानि व्याकरण का सत्यानाश कर दिया है।
    हिन्दी व्यंजनों में-
    कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग, अन्तस्थ और ऊष्म का तो ज्ञान ही नही कराया जाता है। फिर आधे अक्षर का प्रयोग करना कहाँ से आयेगा?
    हम तो बताते-बताते, लिखते-लिखते थक गये हैं परन्तु कहीं कोई सुनवाई नही है।
    इसीलिए हिन्दुस्तानियों की हिन्दी सबसे खराब है।
    बिन्दु की जगह यदि आधा अक्षर प्रयोग में लाया जाये तभी तो नियमों का भी ज्ञान होगा। अन्यथा आधे अक्षर का प्रयोग करना तो आयेगा ही नही।
    सत्य पूछा जाये तो अधिकांश हिन्दी की मास्टर डिग्री लिए हुए लोग भी आधे अक्षर के प्रयोग को नही जानते हैं।
    नियम बड़ा सीधा और सरल सा है-
    किसी भी परिवार में अपने कुल के बालक को ही चड्ढी लिया जाता है यानि पीठ पर बैठाया जाता है। अतः यदि आधे अक्षर को प्रयोग में लाना है तो जिस कुल या वर्ग का अक्षर बिन्दी के अन्त में आता है उसी कुल या वर्ग व्यंजन का अन्त का यानि पंचमाक्षर आधे अक्षर के रूप में प्रयोग करना चाहिए।
    उदाहरण के लिए -
    झण्डा लिखते हैं तो इसमें का आधा अक्षर की पीठ पर बैठा है। अर्थात टवर्ग का ही अक्षर है। इसलिए आधे अक्षर के रूप में इसी वर्ग का का आधा अक्षर प्रयोग में लाना सही होगा। परन्तु आजकल तो बिन्दी से ही झंडा लिखकर काम चला लेते है। फिर व्याकरण का ज्ञान कैसे होगा?
    इसी तरह मन्द लिखना है तो इसे अगर मंद लिखेंगे तो यह तो व्याकरण की दृष्टि से गलत हो जायेगा।
    अब बात आती है संयुक्ताक्षर की-
    जैसा कि नाम से ही ज्ञात हो रहा है कि ये अक्षर तो दो वर्णो को मिला कर बने हैं। इसलिए इन्हें वर्णमाला में किसी भी दृष्टि से सम्मिलित करना उचित नही है।
    समय मिला तो अगली बार कई मित्रों की माँग पर हिन्दी में कविता लिखने वाले अपने मित्रों के लिए गणों की चर्चा अवश्य करूँगा।

    9 टिप्‍पणियां:

    1. शुद्ध हिन्दी लेखन में मददगार आलेख।

      सादर
      श्यामल सुमन
      09955373288
      www.manoramsuman.blogspot.com
      shyamalsuman@gmail.com

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    2. हिन्दी के उन्नयन के लिये आपके लेखों और आपके प्रयासों की जरुरत है।

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    3. kya khoob lekh likha hai........sach hindi ka vyakarniya gyan bahut jaroori hai.

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    4. शास्त्री जी, ये तो आपने बहुत ही उपयोगी जानकारी प्रदान की। सच कहूँ तो व्याकरण में हमसे भी कभी कभार ऎसी त्रुटियाँ हो ही जाती हैं।
      धन्यवाद्!

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    5. Sir ,
      thanks for choosing such a use full topic . Kindly continue .
      हमारी हिन्दी और सुधरेगी , निखरेगी !

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    6. डॉक्टर साहब आपका धन्यवाद । धन्यवाद इसलिये कि मैं उन लोगों में शामिल हूँ जिन्हें हिन्दी में लिखना तो आता (यह मेरी राय है) है मगर हिन्दी नहीं आती, व्याकरण का कोई ज्ञान नहीं । मातृभाषा की टांग तोड़ के रख दी है मुझ जैसे लोगों ने । आपका बड़ा एहसान होगा अगर समय निकाल कर मेरे ब्लॉग पर आयें और मेरी गलतीयाँ बताऎं । मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि मैं कहाँ से हिन्दी सीख सकता हूँ ? कृपया मार्गदर्शन करें ।
      साभार
      http://rainbowisgrey.wordpress.com

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    7. achchha aalekh hai jis aur kisi ka dhyan nahi jata usi aur aapne dhyan aakrist kiya hai

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    आपके आने के लिए धन्यवाद
    लिखें सदा बेबाकी से है फरियाद

     
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