रुत बदल दे !

पार कर दे हर सरहद जो दिलों में ला रही दूरियाँ ,
इन्सानसे इंसान तक़सीम हो ,खुदाने कब चाहा ?
लौट के आयेंगी बहारें ,जायेगी ये खिज़ा,
रुत बदल के देख, गर, चाहती है फूलना!
मुश्किल है बड़ा,नही काम ये आसाँ,
दूर सही,जानिबे मंजिल, क़दम तो बढ़ा!

१५ अगस्त के पर्व पे एक अदना-सी रचना पाठकों को समर्पित है..चंद पाठकों ने पढी होगी...पुनरावृत्ती की माफी चाहती हूँ!

12 टिप्‍पणियां:

  1. शमाजी आपकी वसुधैव कुटुम्बकं की अवधारणा वाली उपरोक्त कविता की पंक्तियाँ ,
    "पार कर दे हर सरहद जो दिलों में ला रही दूरियाँ ,
    इन्सान से इंसान तक़सीम हो ,खुदाने कब चाहा ?"
    दिल को छू गयी. शमाजी आपको मेरा सलाम ! जय हिंद

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  2. मुश्किल है बड़ा,नही काम ये आसाँ,
    दूर सही,जानिबे मंजिल, क़दम तो बढ़ा!
    वाह कितना सही कहा है. प्रथम कदम ही मंजिल की आधी दूरी हर लेती है.

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  3. शमाजी आपकी इस रचना के लिये आपको सलाम।

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  4. दूर सही,जानिबे मंजिल, क़दम तो बढ़ा!
    sahi baat kadam badhana hoga,sunder rachana.

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  5. ऐसे भावों के
    पूरा होने का
    अभाव है पर
    इन्‍हीं का पड़ता
    प्रभाव है।

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  6. अविनाश जी ,
    आपकी तहे दिलसे शुक्र गुज़ार हूँ..आपने जो हौसला अफ़्ज़ायी की..ज़र्रानवाज़ी की..!
    किसी अन्य मुल्क की सरहद कहाँ पार करनी है?..ये तो दिलों के बीछ खिंची हुई लकीरें हैं ..! जो आँगन से आँगन जुदा कर रही हैं !

    http://shamasansmaran.blogspot.com

    http://kavitasbyshama.blogspot.com

    http://lalitlekh.blogspot.com

    http://shama-baagwaanee.blogspot.com

    http://shama-kahanee.blogspot.com

    'sarhad' parse ek badaa hee rhiday draawak qissaa yaad aa gaya..kabhi likhungee..isi blog pe..

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  7. Apko swatantrata ki badhai de raha hoon. Bachchon ko dher sara pyar. Nukkad ko awad karne ke liye apko sadhubad. meri taraf se Apke shahar ke nanhen pankhon ko dher sara pyar.

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  8. दोबारा है तो क्या हुआ, सुंदर रचना है.

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  9. बुलंद हौसलों के साथ लिखी रचना का आशय अच्छा है.
    बधाई
    - विजय

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  10. राह मुश्किल हो तो भी कुछ कदम तो चलें...कारवां बन ही जायेगा ..!!
    बधाई ..!!

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