छंदमुक्त बनाम छंदयुक्त: सच्चाईयाँ और दलीलें।- सुशील कुमार

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  • आदरणीय श्री रूपसिंह चंदेल जी, आप कविता-प्रदेश के नागरिक कब से हो गये? जब आपने अपनी ब्लॉग पर मेरी कविता को तहस-नहस कर छापी थी तो मैंने न सिर्फ़ आपसे इसकी शिकायत की थी बल्कि इससे संबंधित परिवाद-पत्र की प्रतिलिपि भी आदरणीय सुभाष नीरव भाई जी को भी भेजी थी। तब आपने यह कहकर कन्नी काट लिया कि आपको कविता की अच्छी जानकारी नहीं है। इसलिये मैं चुप हो गया। अब जबकि कविता पर सवाल और आपकी राय सामने है, मैं आपसे और सुभाष भाई से यह पूछना चाहूंगा कि जब आप लोग अपने साईट पर छंदमुक्त कविताओं को छंदयुक्त कविता की तुलना में अधिक छापते हैं तो फिर काव्य के छंद-प्रवृति पर आपकी पक्षधरता कितनी जायज है। संस्कृत की कई पुरातन पुस्तकें छंद में हैं पर वे कविता-साहित्य की कोटि में क्यों नहीं आती? सिर्फ़ छंद ही कविता को कविता थोड़े बनाती है! आप लय की बात क्यों नहीं करते जो छंदमुक्त के साथ-साथ छंद वाली कविता की भी प्राण है?। आप अरुण कमल की एक रचना को लेकर चल रहे। उनकी अन्य रचानायें भी पढि़ये। अगर आप छंद पर अरुण कमल जी विचार ही जानना चाहते हैं तो उनका भी कहना यही है कि “जिसने छंद नहीं सीखा,जिसने छंद को उन कार्यों के लिये इस्तेमाल नहीं किया,जिस तरह वह निचाट गद्य को करता है,उसका कवि जीवन अधूरा है।”आप उनको फोनकर इस बात भी सत्यापन कर लें। ...और अगर छंदमुक्त कविता का उदाहरण ही देना है तो मैं वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की एक कविता यहाँ रख रहा हूं, अगर इसे देखकर आप छंदमुक्त कविता का भविष्य तय करें तो जरा समझ में भी आये -
    धारदार चित्कारें
    --------------
    सुनता हूँ अग्नि की अनुगूँज तरंगमालाओं में
    ज्वालाओं की लय
    थिरकन कणों उपकरणों की
    भीतर सोये ज्वालामुखी पता नहीं
    कब जागें
    मुझे अन्न चाहिये
    छत और छाया भी
    पथरीले मौन को भेदने वाला लोहा
    मुझे दो
    मेरा युग अंधा नहीं
    मैंने ही आँखों पर पट्टियाँ बाँधी हैं
    देखने से पहले रोएँ पहचानते हैं
    ऋतुओं का बदलना
    शब्दों की रगों में बहते ख़ून की आवाज़ सुनो
    कुल्हाड़ी की तेज धार में दमकते हैं
    भूख के चेहरे-
    ब्रह्म का एक नाम अन्न भी है
    ओ मेरे धातुक समय
    मुझे सुनने दे
    ज़मीन में दबे लोगों की उबलती चित्कारें-
    ओह, कटीले तारों में मुझे कसता समय
    इस्पात ढालते हाथों की मरोड़ों में
    उभरते भविष्य के आयताकार मेहराब देखता हूँ
    आसमान में जो अबाबिल गा रहा है
    उसमें छिपा है धरती का त्रास भी
    देखता हूँ इसी ऋतु में
    गोरैया को घोंसला बनाते
    पहाड़ों को तोड़कर ही
    उधर जाना है
    जिधर दीख रहे हैं घास के हरे तिनके
    ओ टूटते नक्षत्र
    बुझते राख होते उल्कापिंड
    तुम धरती की मर्म पीड़ा से बेखबर हो
    मनुष्य-हृदय
    अब उन चट्टानों सा कठोर हो चुका है
    जिन पर समुद्री लहरें
    सदियों से सिर पटक रही हैं
    ज़िन्दा वृक्ष गिराये जा रहे हैं
    ओ मेरे कवि-
    समय की रगों में बहकर
    आदमी की पीड़ा को जान
    सुनता हूँ सड़क पर खड़े बच्चे का रुदन
    उसके हाथ में बासी रोटी का टुकड़ा है
    आँखों से झरते आँसू
    बच्चे, मेरे प्यारे बच्चे
    रोओ मत
    फिलहाल बादल ने सूर्य ढक लिया है
    वह उसे फाड़कर
    कल फिर उदय होगा
    इस शहर की बाँहों में लपेटे अरावली की
    श्रृखलायें भी
    सूर्योदय को रोक नहीं पाती
    यह अँधेरा क्षणिक है
    पूर्व को हर रोज़
    इसी उम्मीद से देखता हूँ
    यह थोड़ा और उगे
    तुम भी देखना-
    उस पूर्व पर भरोसा करो
    जहाँ से वह उगता है हर रोज़।
    - [कवि विजेन्द्र]

    11 टिप्‍पणियां:

    1. सुशील भाई
      ये मुख्यधारा से धकियाये हुए लोग है अब कुन्ठा मे बकबका रहे है बकबकाने दीजिये।
      वैसे जनमत के साईट पर जाके मुक्तिबोध की अन्धेरे मे का पाठ सुन के कलेजा जला (या ठन्ढा)कर सकते है भाई लोग्।
      अरुन कमल जी की
      सारा लोहा उन लोगो का
      अपनी केवल धार
      पढना हो तो मै भेज दूँ ?

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    2. बहुत बढ़या

      ---आपका हार्दिक स्वागत है
      चाँद, बादल और शाम

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    3. भाई सुशील जी,
      कविता या साहित्य की कोई भी विधा किसी की बपौती नहीं है। जिस कविता प्रदेश की नागरिकता की आप बात कर रहे हैं, उसके लिए किसी की अनुमति या प्रमाणपत्र लेने की आवश्यकता नहीं है। इस पोस्ट में आपकी कुंठा उभर कर सामने आ रही है। आपकी कविताएं मैंने अपने ब्लॉग में प्रकाशित की थीं जिनकी प्रस्तुति किसी तकनीकी समस्या के चलते बिगड़ गई थी और वे गद्य का रूप जैसी लगने लगी थीं। मैंने आपकी कविताओं के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की थी । अत: उन्हें तहस-नहस करने का आपका आरोप निराधार है। बहुत प्रयत्न करने के बाद भी उनकी प्रस्तुति सही नही हो पा रही थी जिसके बारे में मैंने आपको अवगत करा दिया था। आपने जब अनुरोध किया कि मैं उस पोस्ट को हटा दूँ तो मैंने उसे डिलीट कर दिया था। आप इससे इतना आहत हुए कि दूसरे को कविता प्रदेश की नागरिकता लेने का पाठ पढ़ाने लगे। मुझे लगता है कि यह एक व्यक्तिगत कुंठा है जिसे आप यहाँ निकाल रहे हैं। और रही छंदयुक्त कविता और छंदमुक्त कविता की बात, मैंने या सुभाष जी ने इसका विरोध कहाँ किया है ? लय की बात को कहाँ नकारा गया है? यही नहीं, मैंने या सुभाष ने अरुण कमल की अन्य कविताओं को कहाँ खराब या गलत कहा है? बस, “भाग्य फल” कविता की बात की है जो किसी भी तरह से कविता नहीं लगती। और किसी रचना के बारे में, जब वह प्रकाशित होकर सार्वजनिक हो जाती है, अपनी बात रखने का हर पाठक को हक है। अगर आपको यह कविता लगती है, तो लगे। ऐसा करके आपको अरूण कमल जी से कोई अप्रत्यक्ष लाभ मिलता है, तो आप को कौन रोक सकता हैं। “नुक्कड़” पर साहित्य को लेकर सार्थक बहस करें, तो अच्छा होगा, बजाय व्यक्तिगत कुंठाओं को उजागर करने के।

      और अशोक कुमार पांडेय जी, आप किस मुख्यधारा की बात कर रहे है और अपने को उसमें शामिल कर गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं ? जब कोई इस तथाकथित मुख्यधारा के लिए लालायित ही नहीं, उसे किसी के द्वारा धकियाने का प्रश्न कहाँ उठता है? यह “नुक्कड़” साहित्य और शब्द से जुड़े लोगों का हैं, यहाँ बात साहित्यिक शालीनता में ही करनी चाहिए।
      -रूप सिंह चंदेल

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    4. आगे मैं और कुंठित न हो जाऊं इसी डर से आपको अपनी कविता डिलीट करने का आग्रह किया था। वैसे भाई रूप जी,उस घटना के पहले या बाद से अब तक आपको किसी अन्य की कविता पोस्ट करने में कोई तकनीकी दिक्कतें आयी हो तो बताईगा। या भविष्य में आये तो बता दीजियेगा। दीगर है कि ब्लाग पर जब कोई पोस्टिग होती है वह तो व्यक्तिगत नहीं रहती। उसे सब पढ़ते हैं।
      दूसरी बात यह कि ,चलिये कम से कम अब आप अरुण कमल की अन्य कविताओं को कविता तो मान रहे हैं! तीसरी बात जब बहस में भाग ले रहे हैं तो आप गुस्साते क्यों हैं? सुभाष नीरव जी को देखिये,कितने धीर पुरुष हैं! तिलमिलाते ही नहीं। धर्य से सबकी बात सुनते हैं और अपनी बात रखते हैं।-सुशील कुमार।

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    5. मुझे ऐसा क्‍यों लग रहा है
      कि मैं नींद में हूं और एक
      सपना देख रहा हूं पर जिस
      तरह अमेरिका में ओबामा का
      आना और छाना एक सच्‍चाई
      है, उसी तरह कविता पर इस
      तरह की लिखचीत भी एक
      कड़वी सच्‍चाई है।
      यदि मेरी बात अरुण कमल जी
      तक पहुंच रही हो तो वे स्‍वयं
      ही पधारें और अपनी कविता पर
      अपना पक्ष स्‍वयं रखें, यकीन
      मानिए सबको अच्‍छा लगेगा,
      नुक्‍कड़ पर आपका आना,
      लिखियाना।
      तब ही जागूंगा मैं नींद से
      पर सच्‍चाई से नहीं भागूंगा।

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    6. "AAP KAVITA-PRADESH KE NAAGRIK KAB SE HO GAYE
      HAIN" YAA "YE MUKHYA DHAARAA KE DHAKIYAAYE LOG
      HAIN AB KUNTHAA MEIN BAKBAKS RAHEH HAIN,BAKBKANE
      DO" JAESEE PANKTIAN LIKHNA AAPNE AAPKO JANVAADEE
      KAHNE WAALE SHRI SHUSHEEL KUMAAR AUR SHRI ASHOK
      KUMAR PANDEY KO SHOBHAA NAHIN DETAA HAI.VE KAM SE
      KAM "AADARNIY" SHABD KE PRAYOG KAA HEE KHYAAL
      KARTE.MAIN KABHEE-KABHEE SOCHTA HOON KI JAESA
      BURAA HAAL FILMEE GEETON KAA HUAA HAI KAHIN VAESA
      HAAL KAVITAAON KAA BHEE N HO.

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    7. टिप्पणी करने से पहले तो यह तय कर लेना बहुत जरूरी है कि प्रस्तुत बहस अरुण कमल पर है, उनके कविता-कर्म पर है या मात्र उस कविता पर जिसे सुभाष नीरव ने उद्धृत किया है। यह बात मैं विशेष रूप से अशोक कुमार पाण्डेय के वक्तव्य के संदर्भ में कह रहा हूँ जिन्होंने दूसरी-दूसरी कविताओं का जिक्र करके यह जाहिर कर दिया है कि यह बहस उनकी समझ के दायरे से काफी अलग और बाहर है। एकदम यही बात मैं भाई सुशील कुमार से भी कहना चाहूँगा। इस बहस को अरुण कमल की संदर्भित कविता से हटने न दें। मुद्दा यह नहीं है कि चंदेलजी ने आपकी कविताओं के प्रकाशन पर क्या रुख अपनाया। मुद्दा छंदमुक्त या छंदयुक्त का भी नहीं है। यहाँ मैं यह निवेदन भी करना चाहूँगा कि 'वह तोड़ती पत्थर…'का उदाहरण देने मात्र से निरालाजी अपनी सम्पूर्णता में कोट नहीं होते। उन्हें कोट करते समय हमें यह भी ज्ञात होना चाहिए कि उन्होंने मुक्तछंद भी बहुतायत में अपनाया है। मुद्दा अरुण कमल की सिर्फ और सिर्फ 'भाग्यफल' शीर्षक कविता है। दरअसल, प्रस्तुत कविता(?) बिल्कुल ऐसी है जैसे कि मंच पर पहुँचकर अरुण कमल जी ने धोबी को भेजे गए कपड़ों की सूची पढ़ डालने की तर्ज पर (किसी ज्योतिषी द्वारा उन्हें याद करने को दिया गया) राशियों के अक्षरों वाला पर्चा अपनी कविताओं के साथ गलती से भाई हरिनारायण को भेज दिया हो और उन्होंने उनके प्रभा(व)मण्डल से चौंधियाकर उसे भी जस का तस 'कथादेश' में छाप दिया हो। मुझे लगता है कि मुद्दा अरुण कमल कम, संपादक के तौर 'भाग्यफल' को छापने वाले भाई हरिनारायण का विवशताभरा कृत्य अधिक है।

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    8. बहस का ऐसा स्वरूप डराता है.
      राग की निःसारता हो तो द्वेष हो न हो, हम जैसे लोगों को विरक्ति हो जाती है. नुक्कड़ पर अगर झोंटा-पकड़ होने लगी तो कौन आयेगा?

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    9. जब खून्टा गाड लिया गया हो तो बहस का कोई अर्थ नही रहता।
      जिस कविता का ज़िक्र किया गया था उसके बारे मे मैने साफ़ कहा था कि इसकी व्यन्जना यही है कि भाग्यफल उतना ही निरर्थक है जितना यह शब्द सन्योजन्। ये शब्द धोबी की सूची के नही पन्डित की पोथी के है।
      मैने किसी कविता का जिक्र नही किया, बस ये पूछ रहा था कि कीचड उछालने वाले लोग कभी अन्य कविताओ पर बात क्यो नही करते।
      प्राण जी…आप तो ग़ज़ल की दुनिया के बाशिन्दे हैं …हमारे जावेद साहब का शेर पढा ही होगा…अच्छी बातें , भली सूरत … तो जब निरर्थक तरीके से केवल हमारे वाद से जुडे कविओ ऑर बातो पर हमला किया जाता है तो ग़ुस्सा आता ही है।
      अरे आप लिखिये ना प्यारा प्यारा , समझ मे आने वाला ऑर बेचिये अपनी 25-50 हज़ार क़िताबे तब हम मानेन्गे आपका तर्क सही।
      हा,मुख्यधारा वह है जिसके कविओ के छपने पर आपके सीने पर साप लोट जाता है…कभी सुना है हमारे किसी आलोचक को आप लोगो के शेरो पर टिप्पणी करते।आप अपना काम करिये हमे अपना काम करने दीजिये…जो बेहतर होगा ज़िन्दा रहेगा।

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    10. जिस रास्ते जाना न हो उसके मोड पर बहस नही करते।
      मुझे है गर्व इस धारा का हिस्सा होने पर्।
      आप इसमे आने को लालायित नही तो इसके कविओ की चिन्ता मे दुबले मत होइये…बल्कि खुद कालजयी रचना रचिये।
      हम आपकी चिन्ता नही करते…आप हमारी ना करे।
      कविता समझने के लिये जो बोध चाहिये वह बाज़ार मे नही मिलता।

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