शेयर बाजार की पहली हिन्दी बेवसाइट मोलतोलडॉटइन पर प्रकाशित व्यंग्य डॉक्टरी के धंधे का नहीं कोई जोड़ पर प्राप्त प्रतिक्रिया पोस्ट के रूप में दिए जाने की शुरूआत है यह। अवश्य बतलायें कि यह प्रयास आपको कैसा लगा, हमें आपके सुझावों का इंतजार रहेगा और हम उन पर अमल भी करेंगे, ऐसा हमारा वायदा है.
अविनाश वाचस्पति जी का यह व्यंग्यालेख देशी फर्जी डॉक्टरों की करतूत पर मुख्यत: केन्द्रित है। हमारे देश में इनकी बहुतायत है। गली,मुहल्ले-टोले और गॉव-गिरॉव से लेकर कोर्ट-कचहरी और जिले समाहरणालयों के परिसर तक यत्र-तत्र कुकुरमुत्ते की तरह ये नीम-हकी़म मिल जाते हैं। पर ऐसा क्यों है? यह विचारने की जरुरत है। बेरोजगारी की अपने देश में आज इतनी मार है कि सही है अविनाश जी का कथन कि "वो थोड़ा बहुत मोल-तोल करके डॉक्टरी के धंधे में घुस जाता है और खूब नोट कमाता है।" गरीबी का ही आलम यह है कि लोग सस्ते में इलाज चाहते हैं और झोलाछापों की चंगुल में फँस जाते हैं। यह आलेख एक ओर जहाँ अपने देश में महामारी की तरह फैल रही बेकारी और दीनता का बखूबी चित्रण करता है वहीं दूसरी ओर सरकार की अपने दायित्त्वों के प्रति अन्यमस्कता की ओर भी प्रच्छन्न संकेत करता है कि सरकार की नाक के नीचे इन फर्जी डिग्रियों का धंधा फल-फूल रहा है और निरीह-लाचारजन प्राय: हर रोज़ नीम-हकी़मों की ठगी के शिकार हो रहे हैं। ....और यह अपने देश में आज़ादी के बदल रहे अभिप्राय की विडम्बना भी है कि कोई कुछ भी करे यहाँ, आज़दी सबको है। यानि व्यंग्यकार यह कहना चाहते हैं कि यहाँ घोडे़ और घास को एक जैसी छूट मिली हुई है। सचमुच अविनाश जी के शब्दों में दमदार तथ्य यह है कि "धंधा कोई भी करे, कैसा भी करे और टैक्स भी न भरे- इतनी आजादी क्या कम है ?" पर कितनी चिंता जनक बात है यह!
व्यंग्य के बहाने लेख में असली डॉक्टरों के पेशे की भी कलई खोली गयी है। "डॉक्टर भी कौन सा सारी कमाई का टैक्स भर रहे हैं, वे सरकार को चूना लगा रहे हैं,ये (यानि झोलाछाप)डॉक्टर को चूना लगा रहे है। सब चूना लगाने में व्यस्त हैं।" यह बिलकुल आज का, अभी का सच है। अभी हाल में ही मेरे छोटे भाई का पैर की हड्डी का ऑपरेशन हुआ। डॉक्टर ने फीस लेकर ऑपरेशन तो ठीक-ठाक किया पर फीस की पूरी रसीद देने से साफ़ मुकर गये। क्यों मुकर गये,कोई भी समझ सकता है।
इस व्यंग्यालेख में विचार सिर्फ़ मनोरंजन के लिये ही प्रस्तुत नहीं हुए है वरन् हमें भारतीय चिकित्सा के क्षेत्र में फैल रही बूराई और उससे समाज को हो रही अपूरणीय क्षति की ओर भी सोचने को मजबूर करता है। भारतीय समाज में पनप रहे इस कोढ़ से निपटने के लिये जहाँ एक ओर समाज के निचले तबके में जागृति की जरुरत है वहीं सरकार को टैक्सचोर डॉक्टरों और झोलाछापों से निपेटने की भी बड़ी आवश्यकता है। सिर्फ़ कानून बनाने से नहीं होगा क्योंकि यह नैतिकता से जुड़ा सवाल भी है।
जो हो,इस कुकर्म पर अंकुश लगना ही चाहिए। जनता की ऑख खोलने वाला इस बहुपठनीय और विचारपूर्ण आलेख के लिये अविनाश वाचस्पति जी का आभारी हूँ।
-सुशील कुमार( sk.dumka@gmailcom)
मेरी झूठी जिंदगी की सच्चाई...
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Respected papa,
मेल लिखते हुए अच्छा तो नहीं लग रहा पर मेरे लिए जरूरी था... आपको भी मालूम है
मैं अपनी कोई भी बात आज तक सीधे तरीके से नहीं कह पाया बस यही तरी...
2 घंटे पहले





1 टिप्पणियाँ:
बिलकुल सही फरमाया आपन॑....इस धंदे का सचमुच ही कोई जोड-तोड नहीं है....लोगों को बेवकूफ बनाते रहो, वे बेचारे बनते रहते है.
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