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| बिक गई तो फिर न मिलूंगी कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं |
पास हों या हों दूर
जो पास हों
वे और पास सरक आएं
जो दूर हैं
वे लैपटाप और डेस्कटाप
के पास चले जाएं
या ले आएं उन्हें
अपनी गोदी में।
गोद में आने से
मोद मिलता है
मन कमल खिलता है
विचारों का सागर
सुनामी बनता है
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| पढ़ लीजिए ध्यान से दोनों ओर न पलट पाएं तो नीचे उतर आएं |
जो होंगे हाजिर
उन्हें मोदक भी मिलें गे
और मादकता से परिपूर्ण
हिन्दी ब्लॉगिंग की पुस्तक
क्रय करने का मौका।
जो कह रहे हों
आपको फ्री दिलवायेंगे
उनके झांसे में न आएं
सस्ते में 30 अप्रैल 2011 को
सांय 6 बजे दिल्ली के
हिंदी भवन से ही ले जाएं।
मौका ये चला गया तो
फिर महंगी मिलेगी
हो सकता है
न मिलें महंगी भी
हमने छपवाई कम हैं
हमें नहीं मालूम था
लेने वाले इतने बेकल हैं।
दोबारा छपवायेंगे
तो भी सप्ताह भर तो लगेगा ही
इसलिए देर न करें
दूर न रहें
हिंदी भवन के
विचारों के वन में
नेह लगाएं
मन और मानस का
सुधारें पर्यावरण
पधारें
स्वागत है सबका
इस पर किसी एक का
नहीं है कब्जा
स्वागत पर अधिकार
नेक का ही होता है
वही विचारों का
सच्चा सोता होता है।
अन्नाभाई आ रहे हैं
अन्न भी मिलेगा
मन को रखने का प्रसन्न
नुस्खा भी बंटेगा
उसका कोई मोल नहीं लगेगा
अनमोल हैं सारे नुस्खे।
इंतजार कर रहा हूं
आना चाहें तो
अब भी आएं
हिंदी भवन में
इंतजार कर रहा हूं।
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| तीस अप्रैल के बाद मुझे कोई नहीं पूछेगा |





