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बी.जे.पी. की श्वासनली अवरूद्ध है


 भारत में राजनैति‍क पार्टि‍यां लीडरों के व्‍यक्‍ति‍गत charisma के कारण ही चलती आई हैं. जनता पार्टी, कॉंग्रेस के वि‍रूद्ध जन्‍मी पार्टी थी जो कालांतर में भारतीय जनता पार्टी में रूपांतरि‍त होकर अटल बि‍हारी बाजपेयी के नेतृत्‍व में स्‍थायि‍त्‍व ले पाई. लेकि‍न बाजपेयी की पारी के बाद अडवाणी वहीं से शुरू नहीं कर पाए. 

बहुतायत में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ से जुड़े लोगों के इस पार्टी में आने से, इसमें अपेक्षाकृत अनुशासन बना रहता था. कि‍न्‍तु पि‍छले कुछ समय से पार्टी के भीतर नेतृत्‍व के संघर्ष की ख़बरें आती ही रहती हैं. इन ख़बरों का खंडन भी नि‍यम से कि‍या ही जाता रहता है, पर मुश्‍कि‍ल लगता है इस बात पर भरोसा कर पाना कि‍ इस धुएं की बार बार उठने वाली ख़बर सही न हो.

भारतीय जनता पार्टी अब इस समय पहचान की जद्दोजहद से जूझ रही है. अगर 2014 में, कॉंग्रेस के विरूद्ध नकारात्‍मक वोट के कारण यह पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर भी आई तो भी वर्तमान परि‍पेक्ष्‍य में बड़ा मुश्‍कि‍ल लगता है इसका दूर तक चल पाना. इस समय, इसमें सर्वसम्‍मत नेतृत्‍व का अभाव है. येदुरप्‍पा जैसे नेताओं का पार्टी की बात न मानना इसका उदाहरण है. मोदी के वि‍रोध में बहुत से स्‍वर हैं. दूसरे नेताओं का कद इतना दि‍खाई नहीं देता कि‍ वे राष्‍ट्रीय स्‍तर पर स्‍वीकार्य माने जा सकते हों. राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ का प्रभाव भी इस पार्टी पर आज पहले सा नहीं दि‍खाई नहीं देता कि‍ वही अनुशासन बनाया रखा जा सके.

2014 के चुनावों से पहले, इतने कम समय में कि‍सी ऐसे नेता का उभर कर आना संभव नहीं है जो इस पार्टी को एकजुट दि‍खा सके. पि‍छले लोकसभा चुनाव में भी यही कारण था कि‍ कॉंग्रेस का कोई एक वि‍कल्‍प लोगों को दि‍खाई नहीं दि‍या. इसी के चलते क्षेत्रीय पार्टि‍यों का वि‍स्‍तार भी हो रहा है. क्षेत्रीय पार्टि‍यों का दृष्‍टीकोण भी क्षेत्रीय ही रहता है. क्षेत्रीय पार्टि‍यां केंद्र में रहते हुए भी राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सोचने की अपेक्षा अपने-अपने क्षेत्रों में वोट बैंक पक्‍का करने की जुगत में लगी रहती हैं.
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-काजल कुमार
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भारतीय पुलिस : और जन सामान्य

पुलिस के प्रति नकारात्मक भाव एक चिंताजनक स्थिति है इस पर ज़रुरत है खुले दिमाग से चिन्तन की भारतीय   पुलिस पर लगे आरोपों पर एक नज़र डालें
(एक ):-संदेह को सत्य समझ के न्यायाधीश बनने का ज्ञान का इंजेक्शन हमारी ."पुलिस " को भर्ती के दौरान ही लगा दिया जाता है न्यायाधीशों तक के अधिकारों अतिक्रमण का सफ़ाई से करने का हुनर केवल में है. ..  सामाजिक आचरण के अनुपालन कराने के लिए,पुलिस को न्यायाधीश के अधिकार तक पहुंचने की चाहत पर अंकुश लगाये..जाने आवश्यक हैं 
(दो) :-भारतीय पुलिस सबसे भ्रष्ट पुलिस है. भारतीय पुलिस का आदमी "संरक्षक " नहीं गुण्डा और लुटेरा होता है. उसमें सम्वेदनाएं नहीं होतीं.हीन नहीं. 
(तीन):- भारतीय पुलिस में   नैतिकता का अभाव है. (चार):-कानूनों का उल्लंघन करना उसकी मूल आदत  है .  
              इस तरह से पुलिस की नैगेटिव छवि का जन मानस में सामान्य रूप से अंकित है लोग उसे अपनी पुलिस नहीं मानते . यह स्थिति  के लिए देश के लिए चिंतनीय है , यहाँ मेरी राय है कि सामाजिक-मुद्दों के लिए बने कानूनों के अनुपालन के लिए पुलिस को न सौंपा जाए बल्कि पुलिस इन मामलों के निपटारे के लिए विशेष रूप से स्थापित संस्थाओं को सौंपा जाए । सामाजिक-मुद्दों के लिए बने कानूनों के अनुपालन के लिए पुलिस को न सौंपा जाए बल्कि पुलिस इन मामलों के निपटारे के लिए विशेष रूप से स्थापित संस्थाओं को सौंपा जाए केवल दुर्दांत एवं गंभीर किस्म के अपराधों / अपराधियों से  निपटने ,कानून व्यवस्था , आदि सहित उन विषयों तक पुलिस की भूमिका तय कर दी जावे जहाँ उस फ़ोर्स (ताक़त) की ज़रुरत हो . उन सामाजिक -मसलों पर जहाँ काउंसलिंग की ज़रुरत है  पुलिस का हस्तक्षेप न हो. पारिवारिक मसलों पर तो कदापि नहीं .
" इधर भी गौर करें " पुलिस को लेकर सामाजिक सोच नेगेटिव होने के कारण जग ज़ाहिर हैं
कभी आपने पुलिस वालो के जीवन पर गौर किया होगा तो आप पाया ही होगा व्यक्तिगत-पारिवारिक जीवन कितना कठिनाइयों भरा होता है . सोचिए जब बेटी के साथ ,मुस्कुराने का वक्त हो तब उनको वी आई पी ड्यूटी में लगे होना हो,पिता बीमार हैं और सिपाही बेटा नौकरी बजा रहा हो ,या होली,दीवाली,ईद,दीवाली,इन सब को दूर से देखने वाले पुलिस मेन की संवेदना हरण होना अवश्यम्भावी है. चलिए सिर्फ़ पुलिस की आलोचना करने के साथ साथ व्यवस्था में सुधार के लिए चर्चा कर उनको संवेदनशील, ईमानदार,ज़बावदार,बनाने सटीक सुझाव दें, कोई तो कभी तो सुनेगा ही । पुलिसवालों के व्यक्तिगत  जीवन के लिए मेरी सोच  पूर्वाग्रही नहीं है. उनकी स्थिति जो मैंने,उन दिनों देखी थी जब मैं लार्डगंज पुलिस-कालोनी में बच्चों को ट्यूशन पढाता था बहुत करीब से इनको देखा था तब आँखें भर आया करतीं थीं . आप भी इसे देख सकतें हैं आज भी कमोबेश दशा वही है आज भी ।
भाई समीर यादव की पोस्ट "शहीद पुलिस "से प्रेरित हुआ हूँ और संग साथ हैं बीते दिनों की यादें जिन दिनों बेरोज़गारी के दौर में ट्यूशन पढाता मैं लार्डगंज जबलपुर के वाशिंदे पुलिस वालों के बच्चों को जिनमें से अधिकाँश अच्छी नौकरियों में अब मिलते हैं कभी कभार मुझे  नमस्ते मामाजी के नज़दीकी संबोधन के साथ संबोधन सहित तब  मन अभीभूत हो जाता है
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