नोटों के बिस्‍तर पर सोना

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  • नोट तो आखिर नोट होते हैं चाहे वह स्विस बैंक की  तिजोरी से आयें या किसी मंदिर की गुल्लक से या शोभन सपनों की अशोभनीय खुदाई से। वे किसी मंत्रालय के मंत्री की फाइलों से भी आ सकते हैं। इनसे बिस्‍तर खरीदा जा सकता है, नोट चाहे सरकारी हो या करेंसी। आरामदेह बिस्‍तर पाने के लिए अधिक धन का व्‍यय या सत्‍ता की ताकत का इस्‍तेमाल किया जाता है पर आजकल धर्म के जरिए भी साधु अथवा संत बिस्‍तरी आराम पा रहे हैं और जब पकड़े जाने का भय सताने लगता है तो ‘भाग मिल्‍खा भाग’ की तरह दौड़ने की चेष्‍टाओं में मशगूल हो जाते हैं। आशा ही भविष्‍य में बलवती विश्‍वास के रूप में बदलती है। कई बार आशा ही जगाती है। आसा ही आशा है, यह शब्‍दों के साथ धोखाधड़ी का एक संत का विरलतम उदाहरण है। आसा जीवन की सकारात्‍मक रागात्‍मकता का उज्‍ज्‍वल पक्ष है। पर वह विश्‍वास बनेगा - यह निश्चित नहीं है। बिना आशा, विश्‍वास नहीं कायम हो सकता। विश्‍वास का मार्ग आशा से होकर ही गुजरता है। इसी प्रकार आशा की प्राप्ति के लिए मन की ताकत और नोटों का अंबार जरूरी है। विश्‍वास अनेक बार नोटों के बिना भी हासिल कर लिया जाता है। लोटे का इस्‍तेमाल कर हासिल  किया गया विश्‍वास सबसे अधिक सबल और बलप्रदायक होता है।

    यूं तो यह सब जानते हैं कि नोट गर्मी देते हैं। पर न होने से ठंड भी नहीं लगती है। नोटों के बिस्‍तर पर लेटकर लोटा भर गर्मी इकट्ठा करने की तमन्‍ना किसी को झुलसा भी सकती है, इसका इल्‍म न था पर अब विश्‍वास हो चला है कि कभी भी, कहीं भी, किसी के साथ भी, कुछ भी सकता है - सरकार भी इस तिलिस्‍म से चमत्‍कृत होने से बची नहीं है। नोट इतने मायावी होते हैं कि नकली करेंसी का रूप धरकर पड़ोसी मुल्क की बदनीयती के कारखानों में छपकर भी सीमा पार करके बलात् घुसे चले आते हैं।

    नोटों पर लेटकर अग्नि परीक्षा देने का न अब जमाना है, न पहले था।  दीपावली सामने है इसलिए रामायण की मिसाल ही लीजिए। अगर ऐसा होता तो सीता को नोटों पर लेटकर अग्नि परीक्षा से गुजरना होता। जैसे  कि आजकल नोटों पर लेटने के अलग तरह के निहितार्थ हैं तब भी वे अब से कतई भिन्‍न न होते, विभिन्‍न अवश्‍य होते। पवित्रता को जांचने के लिए करेंसी नोट गंगा के पानी और गीता पर हाथ रखकर वचन भरने से भी गए बीते हैं।

    अभी कई खोजें की जानी हैं कि क्‍या नोटों की ऊर्जा का उपयोग भी संभव है जैसा सूर्य की शक्ति का सोलर माध्‍यम से किया जाता है। क्‍या उससे चावल, सब्जियां उबाली जा सकती हैं। अगर ऐसा हो पाए तो गैस की खपत और बिजली के बिल में गिरावट आ सकती है।  ऐसे प्रयोग न करने देकर फिर उसमें बाधा डालकर सरकार ने उचित कदम नहीं उठाया है, वैसे भी सरकारें अनुचित कदम उठाने के लिए अधिक ख्‍याति पाती रही हैं। इसकी सबसे जीवंत मिसाल एक साधु के सपने को सच मानकर सोने के लालच में खुदाई किया जाना, क्‍या बुद्धिजीवियों के विचारों को खोद पाएगा या यूं ही चिरकुटई में दफन हो जाएगा।

    2 टिप्‍पणियां:

    1. एक नोटों का कम्बल हमारे लिये भी सिलवा देना आपके पास ज्यादा हो गये हों तो घर से ही दिलवा देना !

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      1. अवश्‍य सुशील भाई
        एक नोटों का गद्दा भी मिलेगा
        कूरियर ब्‍लूडार्ट नंबर 9873457873 से दरियाफ्त कर लीजि।

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