मलुवा या हलुवा

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  • सुशील कुमार जोशी
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  • सामरिक महत्व की
    सड़क कहलाती है
    सर्पीले पथों से होते
    हुवे किसी तरह
    तिब्बत की सीमा
    को कहीं दूर से
    देख पाती है
    छू नहीं पाती है
    एक वर्ष से ज्यादा
    बीता जा रहा है
    प्राकृतिक आपदा
    का प्रभाव जैसा था
    वैसा ही है हर
    गुजरने वाला राही
    ये ही अब तक
    बता रहा है
    पहाड़ कच्चा हो चुका है
    मलुवा गिरता जा रहा है
    मलुवा सुनते ही अधिकारी
    मूँछ के कोने से मुस्कुराये
    बिल्कुल भी नहीं झेंपे
    बगल वाले के कान में
    हौले से फुसफुसाये
    कैसे बेवकूफ हैं
    मलुवा बोले जा रहे हैं
    इन्हें कहां पता कि
    इन्ही मलुवों का हम
    रोज एक हलुवा
    बना रहे हैं
    बस एक बार उपर
    वाले ने गिराना चाहिये
    अगली बार से हम
    गिराते रहेंगे
    इसी तरह ये मलुवे
    हलुवे बन हम पर
    पैसे बरसाते रहेंगे
    चीन ने चार लेन
    सड़क अपनी सीमा
    तक बना भी ली
    तो भी पछताते रहेंगे
    हम सीमा तक जाने
    वाली हर सड़क को
    मलुवा बनाते रहेंगे
    अपनी सड़कों से चीन
    हमला करने अगर
    आ भी जायेगा
    तब भी सिर के बाल
    नोचेगा और खिसियाऎगा
    कहाँ जा पायेगा
    हमारे देश के अंदर
    आकर टूटी सड़कों
    की श्रंखला में
    फंस कर रह जायेगा
    हमारी सोच और
    मलुवे के हलुवे की
    तकनीक से मात
    खा ही जायेगा ।

    1 टिप्पणी:

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