विश्‍व पुस्‍तक मेले में ज्‍योतिपर्व प्रकाशन ने इतिहास बना दिया : 'व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल' सिर्फ 3 दिन में 'आउट ऑफ स्‍टॉक' हो गई है : बेस्‍ट सेलर बुक का खिताब जल्‍द ही प्रकाशक को दिए जाने की घोषणा

हिन्‍दी की बेस्‍ट सेलर पुस्‍तक का खिताब  व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल के नाम
अब आप या तो करते रहिए इंतजार
या खोजिए अपने मित्रों को ले गए हैं
जो खरीद कर 40 चालीस या 50 पचास
प्रतियां एक बार में ही
उनसे उधार लेकर पढ़ लीजिए
परंतु समीक्षा करने के लिए
प्रति मिलने की प्रतीक्षा मत कीजिए।

वैसे प्रकाशक महोदय का कहना है
कि उन्‍होंने लोकार्पण के समय ही
सभी मीडिया समूहों को प्रतियां
दे दी थीं
प्रमाण के लिए नवभारत टाइम्‍स में
3 मार्च को पेज 4 पर प्रकाशित खबर
आप पढ़ सकते हैं।

ब्‍लैक में भी नहीं मिल रही है
प्रकाशक की लिखित टिप्‍पणी
व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल आउट ऑफ स्‍टाक हो गई है
की इमेज संलग्‍न है
आप पढ़ सकते हैं
मायूस मत हों
द्वितीय संस्‍करण की करें प्रतीक्षा
या पुनर्मुद्रित होने की
तभी मिल सकेगी
लेकिन उससे पहले
प्रकाशकीय अनुबंध संबंधी
औपचारिकताएं होनी हैं ।

आप या आपके कोई प्रकाशक बंधु
इस पुस्‍तक का द्वितीय संस्‍करण
प्रकाशित करने का विचार
रखते हों तो संपर्क कर सकते हैं।
nukkadh@gmail.com पर। 

8 टिप्‍पणियां:

  1. बधाई हो,आखिर लेखक और प्रकाशक झगड़ लें तो बिक्री बढ़ ही जाती है !
    ..कहीं यह दोनों की मिली-भगत तो नहीं थी ?

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    1. मतलब भगत (चेतन) बनने के लिए मिलना जरूरी है संतोष भाई

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  2. अविनाश
    ये बेफिजूल की पोस्ट लगती हैं क्युकी इस मे कहीं भी आप ने ये नहीं बताया की आप ने सहयोग की राशि कितनी दी थी पुस्तक छपाने के लिये प्रकाशक और उसके बदले कितनी प्रतियां आप को मिलनी थी .
    बेस्ट सेलर शब्द का मतलब कुछ होता हैं ??
    और बेस्ट सेलर किताबे रोयल्टी पर छपती हैं कॉपी राईट के साथ ना की सहयोग राशि के साथ

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    उत्तर
    1. रचना जी

      मैंने एक पैसा भी बतौर सहयोग राशि नहीं दिया है। इसलिए जो प्रतियां मिलनी चाहिए थीं, वह प्रकाशक के आपसी विश्‍वास पर थीं, जो कि उन्‍होंने नहीं देनी चाहीं। वह लेखक को लेखकीय प्रतियां देने के लिए राजी नहीं हैं और न ही मीडिया के लिए। मुझे भी वे रुपये 90/- प्रति पुस्‍तक की दर से प्रतियां दे रहे थे,जबकि मैंने उन्‍हें कहा था कि मुझे लागत मूल्‍य पर 100 प्रतियां दे दीजिए ताकि मैं अपने मित्रों और मीडिया में वितरित कर सकूं। इसके लिए सहमत न होते हुए उन्‍होंने पुस्‍तक की आउट आफ स्‍टाक की घोषणा कर दी और कल भी उनके स्‍टाल पर 'व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल' की प्रति न तो प्रदर्शित की गई और न उपलब्‍ध ही थी। मेरे साथ ज्‍योतिपर्व प्रकाशन के स्‍टाल एस-1/3 हाल नंबर 11 पर प्रो. हरीश अरोड़ा, रवीन्‍द्र प्रभात, राजीव रंजन प्रसाद इत्‍यादि साथी गए थे। इसलिए अगर 500 प्रतियां भी मात्र चार दिन में बिक जाती हैं तो हिंदी के लिए यह बहुत बड़ी बात है, बतलाइए कि इसे क्‍यों न बेस्‍टसेलर मानना चाहिए।
      बाकी तो रचना जी अपना अपना नजरिया होता है किसी को उपयोगिता में भी व्‍यर्थता का अहसास होता है और खोजने वाले व्‍यर्थता में भी उपयोगिता का अनुभव कर लेते हैं। नजरिया सदैव सकारात्‍मक होना चाहिए। लेकिन अगर सब ही सकारात्‍मक दृष्टिकोण रखने लगें तो फिर ऐसे व्‍यक्तियों की भी महत्‍ता कम हो जाएगी। इसलिए समाज में नकारात्‍मक नजरिए वालों की भी जरूरत सदैव बनी रहेगी। वैसे तर्क वितर्क कुतर्क और सतर्क सब सकारात्‍मक और नकारात्‍मक प्रवृत्तियों के मेल हैं, इन्‍हें ई अथवा फी मेल मत समझ लीजिएगा।

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    2. kyaa aapne prakashak kae saath koi agreement sign kiyaa thaa
      prakashan sae pehlae ??

      agar nahin to kyun nahin aur haan to aap ko kanun kaa rastaa kyun nahin dikh rhaan haen

      hindi kae laekhak hamesha itni bichargi liyae huae kyun haen
      agar aap kae saath dhoka hua haen to aap kuchh kartae kyun nahin

      हटाएं
    3. जो भी जरूरी कार्रवाई की जानी है, उसके लिए ढिंढोरा न पीटकर, उसकी आप सबके सहयोग से चुपचाप रचना की जाएगी। आपकी जिज्ञासु प्रवृत्ति के लिए आभारी हूं। हिंदी के लेखक इसलिए बेचारे हो जाते हैं क्‍योंकि उनके पाठक भी उनकी नीयत पर सवाल उठा देते हैं। यह सब पाठकों की कमजोरी है जो हिंदी के लेखक को बेचारा बनाती है। अनुबंध मन के बंध से कभी ऊपर नहीं हो सकते हैं। यह सब उस विश्‍वास की बात है जिसे धन के बंधन में बंधकर कतिपय दुर्जन सुगंध समझकर दुर्गंध की सृष्टि रचते हैं। मालूम नहीं कि आपको इससे संतोष हुआ होगा अथवा नहीं, लेकिन मैं संतोष के साथ हूं।

      हटाएं
  3. आभार ।।

    दिनेश की टिप्पणी : आपका लिंक

    dineshkidillagi.blogspot.com


    होली है होलो हुलस, हुल्लड़ हुन हुल्लास।
    कामयाब काया किलक, होय पूर्ण सब आस ।।

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