एक पत्र मदिरा रानी के नाम

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  • SUMIT PRATAP SINGH
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  • प्यारी मदिरा रानी

    सादर टुल्लस्ते!

         चुनावी बिगुल बजते ही तुम्हारी तो बल्ले-बल्ले हो गई. बल्ले-बल्ले हो भी क्यों न चुनाव और तुम एक दूसरे के पर्याय जो ठहरे. बहुत दिनों के बाद एक बार फिर तुम्हारा रूप निखर उठेगा. राजनीतिक दलों द्वारा तुम्हारे यौवन की मुँह माँगी कीमत तुम्हें दी जायेगी. अरे तुम उनका ब्रह्मास्त्र जो ठहरी. तुम्हें चलाकर ही तो चुनावी महाभारत को जीता जायेगा, सो अगर तुम थोड़े बहुत नखरे भी दिखाओगी. न नुकुर करोगी तो भी राजनीतिक दलों द्वारा तुम्हें सिर आँखों पर बिठा लिया जायेगा. वोटर भी तो तुम्हारे रूप यौवन के दीवाने हैं. जब तुम अंगूरी स्वाद में विदेशी बार गर्ल बन या फिर गन्ने के स्वाद में देशी तवायफ बन कर गाँव-गाँव जाकर वोटरों के सामने कभी कैबरे डांस तथा कभी मुजरा करती हो तो वोटर तो तुममें ही खो जाते है. तुम्हें प्यार से सुरा नाम से सुशोभित किया जाता है...

     
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