महिलाओं की सेहत ही ना रहे........तो सशक्तिकरण कैसा ...?

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  • डॉ. मोनिका शर्मा
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  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वास्थ्य का अर्थ मात्र रोगों का अभाव नहीं बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की स्वस्थता की सकारात्मक अवस्था है। यदि इस परिभाषा को आधार बनाया जाए तो हमारे समाज में महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के हालात काफी चिंताजनक है। समाज की इस आधी आबादी को शारीरिक बीमारियां तो हैं ही महिलाओं में मानसिक व्याधियों वाले मरीजों के आंकङे भी चौंकानें वाले हैं। घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारी उठा रहीं महिलाएं भावनात्मक और मानसिक स्तर पर भी कमजोर होती जा रहीं हैं। पूरी पोस्ट कृपया यहाँ पढ़ें....!

    1 टिप्पणी:

    1. नारी अपनी हेल्थ मैनेज करना सीखे

      दरअसल नारी स्वास्थ्य का मसला बहु आयामी समस्या है.पहले यह इमोशनल मुद्दा रहा . आपने मुझपर या मैंने आपके स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया. अब व्यावहारिक तथ्य यह है की अपनी हेल्थ खुद मैनेज करनी होती है. आप डाक्टर है. डाक- पेशंट बांडिंग को खूब समझती होंगी . प्रोफेशनलिज्म ने इसकी धज्जियाँ उड़ाकर रख दी. आजकल कुछ डाक्टर मुन्ना भाई एमबी बीएस के उस डायलोग से भी प्रभावित हैं जिसमे कहा गया है," मै मरीज से प्यार नहीं करता" ( क्या सिर्फ लूटने के लिए हो?)नई जीवन शैली के तनाव अनेक हैं . दारु की दुकाने, पिज्जा हट, पब, डिस्को अनेक मिल जाएँगे. स्वास्थ्य मसले पर कौंसिलरों की संख्या बेहद कम और अवेयरनेस भी नहीं. इस इशू पर एनजीओ पैसा हजम करने में रुचि ज्यादा लेते है और कागजी शेर बने बैठे है. आई एम् ए भी सरोकारों से दूर है. नारी स्वास्थ्य की बात है तो नारी संगठन महज कास्मेटिक नहीं वरन गंभीरता से काम करें खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में समस्याओं का अम्बार लगा है. बेहतर है कई बार घर - बाहर की दोहरी जिम्मेदारी सम्हालने वाली महिलाए घरू पुरुषो को उनकी जिम्मेदारी का एहसास दिलाकर अपनी ब्यूटी के साथ हेल्थ के प्रति कुछ ज्यादा सचेत हो जाएँ.

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