बेटा!!… मेडल जुगाड़ से जीते जाते हैं ….समझे?

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  • Padm Singh
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  • चौथी क्लास की कोई दोपहर रही होगी … लेकिन जेहन में अभी भी उतनी उजली है…
    रघुनाथ मुंशी जी ने पूरे क्लास को संबोधित किया … गाना वाना आवत है कौनो
    को ? सरकारी प्राइमरी और कान्वेंट की नर्सरी में फर्क के नाम पर बहुत कुछ
    होता है… कहना ही क्या … फ़िलहाल … जाने कैसे और क्यों मुझे खड़ा किया गया
    और “कौनो गाना सुनाव बेटा" का आदेश मिला… उस समय अकल कम ही होती थी मेरे
    पास… अपने आप को देश भक्त समझा करता था(शायद आज भी)… इसीलिए बहुत सारे
    देश भक्ति के गाने याद रहा करते थे … मुंशी जी का आदेश था … महुवे के पेड़
    के नीचे (जहाँ अब ग्राम सभा का खडंजा बिछ गया है वहीँ) काँपती टांगों पर
    खड़े हो कर लगभग बेसुध सा अपने जीवन का पहला सार्वजनिक गीत गाया था …
    जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती हैं बसेरा .. वो भारत देश है मेरा …
    वो भारत देश है मेरा …

    बाद में पता चला मेरा चयन रेडक्रास की स्कूल टीम के लिए किया गया था… मै
    अपनी क्लास में सबसे छोटा दीखता था( शायद था भी) क्योकि उस समय के जी और
    नर्सरी नहीं होती थी … “पहली”, फिर “बड़ी” और फिर सीधे दुसरे क्लास में …
    मैंने दूसरा क्लास नहीं पढ़ा .. सीधे पहले से तीसरे में.. इस लिए सब से
    छोटा था. टीम की तैयारियां पूरे जोरों पर होतीं… ग्रुप में आठ लड़के …कुछ
    तो ढपोंगे थे … रेडक्रोंस के लिए तैयार नाटक के डायलोग याद करते,
    डिप्थीरिया, काली खाँसी और टिटनेस का टीका “DPT” सीखते… बैसिलस कालवेटिव
    ज्युरिल(BCG) के टीके याद करते … चेचक के समय क्या क्या सावधानियां होनी
    चाहिए… इमरजेंसी में मुंह से सांस देना, फिर एक दो तीन .. तीन बार सीने
    पर दबाव देना फिर एक…दो.. तीन … सांस देना … मतलब कि बहुत कुछ… जनपद
    स्तर, मंडल स्तर और राज्य स्तर या नेशनल… जहाँ भी गयी टीम प्रथम स्थान ही
    लेकर आई …

    एक थे राम नारायण पंडिज्जी ( पंडिज्जी माने गुरु जी)….. जिसने लोटपोट
    कोमिक्स पढ़ी हो वो डाक्टर झटका को हुबहू याद कर लें… ऐसे ही थे पंडिज्जी
    … “ब्बता रहा हूँ जो है…समझे? " उनका तकिया कलाम होता … ब्बता रहा हूँ जो
    है ऐसा ..समझे?? … ब्बता रहा हूँ जो है वैसा …समझे??…. वैसे तो पंडिज्जी
    क्राफ्ट के मास्टर थे लेकिन काम था टीम बनाना और लड़वाना.. रेडक्रोस,
    सेंटजान एम्बुलेंस,मेकेंजी, और स्काउटिंग आदि कोई भी कम्पटीशन हो … पंडित
    जी हर विधा में निपुण… साम दाम दंड भेद सारे के सारे उनकी उंगलियों
    पर…रघुनाथ मुंशी जी उनके सहयोगी हुआ करते…क्राफ्ट के मास्टर होने के कारण
    खूबसूरत डायरियां बनाते जिनमे हम रेडक्रास के कैडेट्स द्वारा किये गए
    स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यों और जागरूकता अभियानों का ब्यौरा होता…

    हम पूरे मनोयोग से जीतने के लिए ही निकलते थे … हम जहाँ भी जाते पूरा लाव
    लश्कर साथ चलता … मै छोटा था … मुश्किल से अपनी अटैची उठा पाता.. बेडिंग
    कोई सहपाठी या पंडित जी ही उठाते … ट्रेन में, बस में, होटल में जहाँ भी
    जाते खूब धमाल मचाते…. गाते हुए, हँसते हुए खूब मज़े करते … (Smile)

    जो भी मेडल हम जीतते वे हमें नहीं मिलते थे बल्कि स्कूल में अनुदान के
    रूप में ले लिए जाते …. अगले साल आने वाली प्रतियोगिताओं के बच्चे उन्हें
    लगा कर परेड में भाग लेते थे … इस तरह सब से ज्यादा मेडल हमारी टीम के
    होते थे.

    ये सब यूँ लिखा मैंने …. कि पंडिज्जी को सारी कलाएं आती थीं… टीम के
    बच्चों को खूब खिलाते पिलाते…खूब सिखाते भी …जिस होटल पर टोली पहुँचती
    होटल वाला खुश…छह सात दिनों के लिए ढेर सारे ग्राहक मिल जाते लेकिन वो
    बात अलग, कि टीम की वापसी के समय पंडिज्जी के पास तीन चार दर्जन गिलास और
    कुछ इससे ज्यादा ही दर्जन चम्मचादि हुआ करते … Winking smile होता यह था
    कि जिस होटल वाले ने परेशान किया,अच्छा खाना नहीं दिया या शोषण किया
    उसका बदला पंडिज्जी ऐसे ही लेते थे…

    अगले दिन आगरा में कम्पटीशन का फाइनल था… रेडक्रास और सेंटजान
    एम्बुलेंस का… हम सब कल होने वाले वाइवा और प्ले की तैयारियों में व्यस्त
    थे…देर रात पंडिज्जी लगभग बीस पच्चीस सर्टिफिकेट, जिन्हें कल विजेताओं को
    वितरित किया जाना था लिए हुए कमरे में घुसे ….सभी सर्टिफिकेट्स पर तीन या
    चार अधिकारिकों के हस्ताक्षर पहले से थे… सिर्फ नाम भरा जाना था … सुन्दर
    सुन्दर हर्फों में सब टीम मेम्बर्स के नाम लिखे गए…प्रथम स्थान की घोषणा
    भी लिखी गयी …. और कमाल देखिये … कल आने वाले दिन में हम प्रथम घोषित
    किये गए और अपने हाथों से लिखे सर्टिफिकेट भी प्राप्त किये …

    हमसे रहा नहीं गया तो पूछ बैठे … पंडिज्जी ! सर्टिफिकेट पर आपने कल ही
    प्रथम स्थान प्राप्त किया" लिख दिया था … ये कैसे हुआ… पंडिज्जी ने पान
    खाया हुआ मुंह थोड़ा ऊपर उठाया और अत्यंत रहस्यमयी मुस्कान बिखेरते हुए
    बोले….

    ब्बता रहा हूँ जो है……बेटा….!!! मेडल जुगाड़ से जीते जाते हैं …समझे?

    (हुआ यह था कि किसी स्कूल वालों ने पंडित जी को चैलेन्ज दे दिया था.. इस
    बार कम्पटीशन जीत के दिखाओ)

    पिछले दिनों गाँव गया तो अचानक पंडिज्जी से मुलाक़ात हो गयी…पंडिज्जी
    पणाम! …बहुत खुश हुए अपने पुराने “टोली नायक” से मिल कर … पंडिज्जी की
    उमर ढल चुकी है…रिटायर हो चुके हैं … अपने पुत्र धौताली के साथस्कूल खोला
    है … हाई स्कूल और इंटरमीडियेट में गारंटीड सफलता के लिए सारे जुगाड़
    युक्त स्कूल… Smile

    1 टिप्पणी:

    1. इस उपयोगी पोस्ट की चर्चा
      आज के चर्चा मंच पर भी है!
      http://charchamanch.blogspot.com/2010/11/337.html

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